प्रभु के ज्ञान को प्राप्त करके उसे जीवन में उतारने से ही देवभूमि के भाव की सार्थकता - निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी
सितम्बर 2009 में बुराड़ी रोड दिल्ली स्थित सन्त निरंकारी अध्यात्मिक परिसर (मैदान न.8)पर आयोजित एक विशाल सत्संग समारोह को सम्बोधित करते हुए निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी ने मनुष्य को जीवन जीने की सच्ची राह बताई |

उन्होंने अनेक प्रसंगों का भी उल्लेख किया जिनमें जिज्ञासुओं में ब्रह्म के प्रति सहज जिज्ञासा और उसके सहज समाधान के लिए निरंकारी मिशन के अभियान की सार्थकता प्रकट की गयी थी |

बाबा जी ने उत्तराखंड की अपनी यात्राओं का उल्लेख करते हुए उसे देवभूमि कहलाने की सार्थकता सिद्ध करने के लिए भी लोगों को अपने ढंग से प्रेरित किया |

उनका मूल आशय यही था कि मानव जीवन का मूल ध्येय है-ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति |ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के अभाव में बड़ी -बड़ी सांसारिक उपलब्धियां भी निरर्थक सिद्ध होती हैं |

उन्होंने कहा कि -

भक्त में बहुत लगन होती है |अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए वह किसी बाधा की परवाह नहीं करता |वह अपने कदमो को रुकने नहीं देता है |इस प्रकार न धूप की,न गर्मी की,न बरसात की,न सर्दी की परवाह करता है |

भक्त परवाह करते हैं तो भक्ति को निभाने की |

कहते भी हैं -

भिज्जो सिज्जो कंबली ,अल्लोह बरसे मेह 

जाये मिला तिन सज्जना टुट्टे नाही नेह |

ये शब्द भक्त की उस लगन को प्रमाणित करते हैं जो उसके मन में गुरु के प्रति होती है |ऐसे ही लगन के प्रमाण स्थान-स्थान पर देखने को मिलते हैं |जो ब्रह्मज्ञान की दात मिली है,उसके प्रति अनूठा एहसास है |जो प्राप्ति हुई है उसके लिए कृतज्ञता का भाव है |उस एहसास से युक्त होकर भक्त अपना आप न्योछावर किये हुए रहते हैं |ऐसे भक्त परोपकार में भी योगदान दे रहे हैं |

परोपकार में योगदान 

भक्तों की सेवा की लगन होती है |उसके कदम सत्संग करने के लिए लगातार बढ़ते हैं |उनके मन में चाहत होती है कि ऐसे अवसर बनें कि हम पहुंचकर सत्संग का लाभ उठायें |महापुरुषों के दर्शन करने का अवसर मिले |ऐसे मधुर अमोलक वचन सुनने को मिलें |

यह भक्तों की लगन हमेशा से रहती है |उसी के अंतर्गत महापुरुष स्थान-स्थान पर ऐसा भाव लिये हुए विचरण करते हैं |

एक निराकार प्रभु के नगमे गा गा कर ये थकते नहीं हैं |बार -बार इसी का जिक्र और वर्णन करते हैं |इसी का आधार लेकर वे जीवन के सफर को तय करते हैं |इसके नगमे गा गा कर जहाँ खुद आनंदित होते हैं वहीं ऐसे भाव रखकर जिज्ञासुओं को भी आनंद प्रदान करते हैं |

वक्ता और श्रोता दोनों का आनंद कैसे ?

कहने वाले और सुनने वाले,दोनों ही आनंद प्राप्त कर रहे थे क्यूंकि जो इस भाव से युक्त होते हैं,वे भक्ति का आनंद प्राप्त करते हैं,जब निराकार का जिक्र होता है ,मानवता का जिक्र होता है,गुरसिखी की चर्चा होती है |

जब प्रेम का जिक्र होता है |ऐसे भावों का जिक्र जब होता है,गीत ,कविता व्याख्यान के रूप में तो भक्त आनंद महसूस करता है |दुनिया में जो भक्ति को कोई अहमियत नहीं दी जाती |ऐसे लोगों को ये भाव न कहना पसंद है ना सुनना पसंद है इसलिए उनको मनमुख कहा जाता है,उनकी साकत प्रवृत्ति कही जाती हैक्यूंकि |उनको अमृत प्रिय नहीं होता है |

लगन के दो रूप 

संसार में जो लिप्त रहते हैं उनको भी लगन होती है |

भक्तों को सेवा-सुमिरन -सत्संग पसंद है इसके विपरीत जिनकी सोच साकत प्रवृत्ति के अंतर्गत होती है उनकी लगन होती है,धन-दौलत की कमियों को दूर करने के लिए |

वे सोचते हैं कि दूसरे को कैसे पछाड़ना है |खुद सबसे आगे निकलना है |दूसरों का दमन करके कैसे बहुत कुछ हासिल करना है |

उनको भी लगन लगी रहती है-सुबह आँखें खुलती हैं तो बस यही विचार-उसी के अनुसार सोच शुरू हो जाती है |उसी तरफ दिमाग चलने शुरू हो जाते हैं कि आज कौन सा षड़यंत्र किया जाये | किस प्रकार उसे कार्यरूप दिया जाये |किस किस को उसमें शामिल किया जाये |शामिल करके दूसरों को नुक्सान पहुंचाए जाएँ |

उनको भी लगन होती है |सोने से पहले भी यही सोचते हैं |आँखें खुलते ही, जागते ही फिर वही सोच शुरू हो जाती है |और दूसरी तरफ महात्माओं की सोच होती है,भक्तों की लगन रचनात्मक होती है |उसकी पॉजिटिव सोच होती है-कुछ बनाने के लिए,कुछ संवारने के लिए |रचना का उपयोग होना है कल्याण के लिए |वह उठते ही पहले निराकार का ध्यान करता है,एहसास करता है,प्रार्थना करता है कि शुकर है,एक और दिन आपने दिया है |निद्रा दी और अभी आँखें खुली हैं |जितना भी समय मालिक तूने बख्शा है ,यह दिन बिताने को दिया है |कृपा करना,मुझे अवश्य महापुरुषों के दर्शन करवाना |मुझे सेवा के मौके प्रदान करना |

यह सच्चाई का सन्देश मैं आगे पहुंचाऊं ,भले ही वे एक-दो ही क्यों न हों |मैं मिशन के उसूलों से उन्हें परिचित करवा दूँ |

मिलने को तो अनेकों मिलते हैं और बार -बार मिलते हैं लेकिन पूरा महीना बीत जाता है |कितने कितने महीने बीत जाते हैं और किसी एक से भी मैं इस मिशन का जिक्र तक नहीं करता |इसलिए यह अरदास करते हैं भक्त कि दातार ऐसी कृपा कर कि आज का दिन ऐसे ही न चला जाये |ज्यादा से ज्यादा लोगों तक,जो मेरे करीब आएं,मैं मिशन की आवाज़ पहुंचाऊं |

  कई बार चौबीस घंटे बीत जाते हैं और अनेक लोग मुझे लगातार मिलते हैं लेकिन किसी से भी मैं मिशन का जिक्र तक नहीं करता | 

मैं गुरु की महिमा सुनाऊँ ,यह बताऊँ कि इंसानियत ही सच्चा धर्म है |

धर्म ने दुनिया को क्या देन दी है ?

सोचने की बात यह है कि दुनिया में जितने भी धर्म हैं ,उन्होंने दुनिया को देन क्या दी है ?मानवता ,इंसानियत ,जो सच्चा धर्म है,मिशन इसके ऊपर हमें दृढ कर रहा है,तो आप भी जानें कि सच्चे धर्म की परिभाषा क्या है |मानवता में स्थित होकर जीवन जीने वाले ही सच्चे धर्मी होते हैं |

मिशन के अनुयाइयों का दृष्टिकोण 

वाकई वे यही बता रहे थे कि उत्तरांचल में चले जाएँ या हिमाचल प्रदेश में चले जाएँ |जब भी इन इलाकों में जाते हैं तो यही सुनने को मिलता है कि यह देवभूमि है |यह देवताओं की भूमि है |और इस प्रकार अनेकों प्रकार की मान्यताओं से युक्त लोग वहां परस्तिश करते हैं या अपनी भक्ति को निभाते हैं |

अनेकों प्रकार की क्रियाएं हैं,अनेकों प्रकार के कर्मकांड किये जाते हैं |अनेकों मान्यताओं से युक्त होकर विचरण किया जाता है तो महापुरुष यही सन्देश दे रहे थे कि हम भी आपकी तरह ही ,इन्हीं पहाड़ियों की वादियों में रहने वाले ,हम भी वही करते आ रहे थे जो आप करते आ रहे हैं |निश्चय ही भक्ति भावना मन में है कि प्रभु है,प्रभु का अस्तित्व है |प्रभु की अनेकों शक्तियां हैं |

मानवता का धर्म और प्रभु की शक्तियां 

उन शक्तियों को कहीं सूरज को भी देवता कह दिया |हवाओं को भी देवता कह दिया |कहीं पर जो energies की qualities हैं,उन्हें भी हमने देवताओं के नाम दे दिए |हमने आकृतियां बनायीं और उन्हें भी देवता कह दिया |लाखों क्या करोड़ों देवता -इस प्रकार की हिंदुस्तान में मान्यताएं हैं |

भक्तजन-महापुरुष मोड़ते हैं इस निराकार की तरफ कि यही है,तमाम शक्तियों का स्रोत |

इसी से उपजा है सब कुछ | तमाम energies इसी में बसी हुई हैं |ऐसे निराकार ऐसे परमात्मा की लखता कर लो |

वेदों -शास्त्रों को पढ़ा तो खूब जा रहा है |

धर्मग्रंथों का पठन- पाठन भी किया जा रहा है |

गीता का उपदेश भी पढ़ा-सुना जा रहा है |लगन के साथ रामचरिमानस का भी पठन-पाठन हो रहा है लेकिन जिस रमे हुए राम का जिक्र है,जिस विराट का जिक्र भगवान कृष्ण कर रहे हैं,इस परमसत्ता को जान भी लो |

श्रीकृष्ण के सन्देश को आचरण में लाने से ही लाभ 

क्या तराने गाने में ही समय निकाल दोगे ? क्या सिर्फ पठन-पाठन तक ही सीमित रह जाओगे ?क्या वो Realization, Awareness अपने जीवन में लानी नहीं है ?क्या आत्मा को बोध कराना नहीं है ?क्यूंकि ये निष्कर्ष भी उन्हीं धर्मग्रंथों के हैं जिन्हें पढ़ते-सुनते हैं |जिनके प्रति श्रद्धा -आस्था रखते हैं |अगर गौर से पढ़ो तो उन्हीं में ये पंक्तियाँ पढ़ने को मिल जाएँगी कि जिनमें लिखा हुआ है कि जब तक आत्मा को अपने मूल (परमतत्व )का बोध नहीं होता ,तब तक आत्मा के भ्रम मिटते नहीं हैं |अगर भ्रम नहीं मिटेंगे तो आत्मा का बंधन समाप्त नहीं होगा |

आत्मा का बंधन ?

आत्मा को और क्या बंधन है ?

आत्मा इसी बंधन में है कि  इसको मोक्ष और मुक्ति नहीं मिलती |और यह आवागमन के बंधन में पडी रहती है |शरीर धारण करती है और कहीं सूक्ष्म रूप में विचरण करती है |इस प्रकार उसके हिस्से में भटकन ही आती है |उसके हिस्से में बंधन ही आते हैं |

उन्हीं धर्मग्रंथों में ये पंक्तियाँ दर्ज़ हैं कि जब तक आत्मा इस परमतत्व का बोध नहीं करती ,यह बंधनो में ही रहेगी |इसलिए इन बंधनो से निजात पानी है |

यह इंसानी जन्म अर्थात सुनहरा अवसर मिलना इसे इसी सन्दर्भ में देखा गया है |इसी context में कहा जाता है कि हीरे जैसा जन्म है |वर्ना यह इंसानी जीवन जो लोग जी रहे हैं,इससे बेहतर दर्ज़ा तो पशुओं को दे दिया जाता है |अगर इंसान ने यह सुनहरा अवसर पाकर भी परमात्मा का बोध नहीं किया,विभिन्न भ्रमो से निजात न पायी,मंज़िले-मक़सूद को प्राप्त नहीं क्या तो इंसान बाकी जितने कर्म करता है ,जिस प्रकार से उसकी चाल होती है,जिन तक सीमित रहकर इंसान विचरण करते हैं तो इंसानो और पशुओं की प्रवृत्तियों में बहुत बड़ा फर्क नहीं रह जाता |

पशुवृत्ति और मनुष्यों की प्रवृत्ति -एक विश्लेषण 

पशुवृत्ति वाले कई इंसानो में भी विचरण करते हैं |क्यूंकि इंसान जिस प्रकार की करतूतें कर रहा है,इस करण इसे  जानवर कहा जा रहा है|

Why are you behaving like an animal ? 

उससे पूछा जा रहा है कि तू जानवरों जैसा व्यवहार क्यों कर रहा है ?ऐसा इसलिए पूछा जा रहा है क्यूंकि उसकी करतूतें ऐसी हैं |लेकिन अगर instings की बात करते हैं तो जानवरों और इंसानो में वो एकसमान होती हैं |उनमें कोई बड़ा अंतर नहीं है |

दास अक्सर कहता है कि जब स्कूल में पढ़ते थे तो एक subject होता था CIVICS ,और फिर political  Science उसमें इंसान को परिभाषित करते हुए कहा जाता था कि-Man is a social animal . कि इंसान social animal  है|Social हो गया क्यूंकि पशुओं की तरह नहीं रहता |संगठित रूप से परिवारों में है लेकिन है तो animal .  Man  is a social animal .जब हम social  शब्द सुनते हैं -जब संसार के इंसानो के हालात देखते हैं तो ऐसा महसूस होता है social शब्द भी इंसान पर पूरी तरह लागु नहीं हो रहा |

Social होकर भी यह कितना uncivilized way में यह विचरण कर रहा है |किस तरह जीवन मूल्यों की यह धज्जियाँ उड़ा रहा है |फिर यह काहे का social है |जब जीवन मूल्यों की इसे कदर ही नहीं है |फिर तो यह animal ही है |इसलिए महापुरुष-सन्तजन यही बार बार बताते आ रहे हैं |इस प्रकार हमने सत्य का बोध हासिल करके इंसानी जीवन का पूरी तरह मोल डालना है |

 यह जो समय हमारे हाथ में आया है .इसका हमें पूरी तरह उपयोग करना है |इस सत्य की लखता करके ,जिस प्रभु-परमात्मा -निराकार का जिक्र किया जा रहा है,जिसकी महिमा गाई जा रही है,इबादत की जा रही है,जिन धर्मग्रंथों के प्रति आस्थावान हैं ,ऐसे परमसत्य पारब्रह्म परमात्मा का बोध हासिल कर लें |यही सन्देश महापुरुष दे रहे हैं |जहाँ ये सन्देश दे रहे हैं वहाँ,अपनी भक्ति भी निभा रहे हैं |जो यह ब्रह्मज्ञान की दात मिली है,इस दात की पूरी क़द्र करते हुए जीवन जिया जा रहा है |

इसे संसार के सन्दर्भ में देखने पर यह महसूस होता है कि वहां तो दुर्लभ मानव जीवन की भी क़द्र नहीं की जा रही इस जन्म की ही क़द्र नहीं की जा रही |और भक्त अपने ऊपर केंद्रित होते हैं,आत्मनिरीक्षण करते हैं |अपने ऊपर केंद्रित होकर ये यह कह रहे हैं कि हमें मानव जन्म मिला और उसके बाद ऐसी कृपा हुई कि हमें ब्रह्मज्ञानी मिल गए |अब वो हमारे हिस्से में आ गया जो पहले नहीं आया था |उसे पाकर वह कार्य पूरा हो गया जिसके कारण मानव जीवन की प्राप्ति भाग्य की बात मानी जा रही है |अब ऐसा प्रभु हमारे जीवन में आ गया |अब भक्त संसार को भूलकर अपने ऊपर केंद्रित हो गया ,जिसके कारण उसके जीवन का रुतबा ऊंचा हो गया |उपकार करने के लिए आवाज़ दी गयी तो एक भक्त उस कतार से बाहर निकल आया,जिसमें पहले खड़ा था |

खुद भी उस श्रेणी में था जहाँ ईश्वर का कुछ पता न था |इस सत्य का बोध नहीं था |केवल धर्मग्रंथों को पढता था ,सुनता-सुनाता था |लेकिन अब जो घटना घटित हुई तो जो जीवन में आया उसके ऊपर केंद्रित हो गया |यह महसूस हो गया कि जो दात मुझे मिली |जो हर किसी के हिस्से में नहीं आती |मैं भी अगर बेकदरा हो गया तो फिर मेरा बनेगा क्या इसलिए वह इस प्रभु के ज्ञान की हमेशा क़द्र करता है |