धर्मी होना कब पाप हो जाता है |

धर्म को हम जीवन मानते हैं चूंकि रामचरितमानस में महात्मा कहते हैं-

दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान 

तुलसी दया न छोड़िये , जब लग घट में प्रान |

इस परिपेक्ष्य में धर्म को देखते हैं तो धर्म जीवन लगता है लेकिन पिछले दिनों हरिद्वार में एक धर्म संसद हुई ,उसकी वीडिओज़ को देखने का अवसर मिला |जो कुछ देखा उसे देखकर हृदय पीड़ा से भर गया | 

वहां कहा गया कि-

किताब - कॉपियां एक तरफ रख दो और हथियार उठा लो |

दूसरी तरफ ये कथन भी मेरे कानो में गूँज रहे हैं  -   

यह पहला सबक है किताब-ए-हिदा का,

कि मखलूक सारी है,कुनबा खुदा का |

साथ ही यह भी-

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

 उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ 

वसुधैव कुटुंबकम का यह सन्देश उपनिषद से लिया गया है जो कि मेरी दृष्टि में हिंदुत्व का आधार है |यह वाक्य भारतीय संसद भवन के प्रवेश द्वार पर भी अंकित है |जो ईश्वर- अल्लाह को एक ही परमेश्वर के नाम स्वीकार करता है उसे उपर्युक्त दोनों अर्थों में कोई भिन्नता नहीं लगेगी लेकिन जो हिंसक हैं उनके लिए इन सिद्धांतों का कोई महत्व नहीं है |

पिछले दिनों एक चैनल पर चर्चा हो रही थी और उसमें आचार्य प्रमोद कृष्ण कह रहे थे कि चपरासी तक की नौकरी के लिए पुलिस जाँच होती है |शैक्षणिक योग्यता भी देखी जाती है लेकिन ये जो तथाकथित स्वामी और सन्त हैं उनकी शैक्षणिक योग्यता तथा पृष्ठभूमि के बारे में कोई नहीं पूछता |     

अफ़सोस की बात तो यह है कि कोई सैद्धांतिक दृढ़ता न होने के बावजूद ये अपने आपको मजबूत बताते हैं और इन अर्थों में मजबूत होते भी हैं क्यूंकि किसी पर भी वे आक्रमण कर सकते हैं और कोई गवाही भी नहीं दे पायेगा |

सभ्य और सज्जन व्यक्ति जो जियो और जीने दो तथा शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के सिद्धांत को पूर्णतः सत्य और पूर्णतः व्यवहारिक मानते हैं वे उनकी आक्रामकता से आशंकित रहते हैं |


पिछले दिनों मुरादाबाद से खबर आयी कि एक जूस की दुकान,जिस पर साईं जूस सेंटर लिखा था ,इन लोगों द्वारा बंद करवा दी गयी ,चूंकि इनका कहना था कि साईं उनके देवता हैं इसलिए किसी विधर्मी को कोई अधिकार नहीं कि उनके देवता के नाम पर अपनी दुकान का नाम रखे |

उसने प्रार्थना की यह कि दुकान तो पंद्रह साल से चली आ रही है लेकिन जिन्होंने उसे अपराधी घोषित करना था ,उन्होंने घोषित कर दिया और प्रशासन ने भी कहा कि अपनी दुकान का नाम बदल लो |यह कार्यवाही करने वालों को धर्मांध कहते हैं या मदांध निर्णय करना कठिन है |

धर्मान्धता एक खतरनाक चीज है |खतरनाक इसलिए है चूंकि यह वास्तविकता को देखने-समझने नहीं  देती |सिद्धांतों के अनुसार धर्म जीवन देने वाला है चूंकि यह कहता है-

सन्तन के मन रहत है,सबके हित की बात

घट -घट देखें अलख को पूछे जात न पांत |

यह लिखते -लिखते मुझे स्वामी विवेकानंद का एक कथन याद आ गया |स्वामी विवेकानंद से किसी ने पूछा-अन्धविश्वास भी क्या किसी का कल्याण कर सकता है,स्वामी जी ने कहा कि हाँ,उस स्थिति में अन्धविश्वास  कल्याणकारी हो सकता है,बशर्ते जिस इंसान पर अन्धविश्वास किया जा रहा हो ,वह अन्धा न हो |

ऊपर जो सन्तों की विशेषता बताई गयी है,उसके अनुसार सन्तों के मन में सबके हित की बात होती है चूंकि वे हर घट में प्रभु को ही विराजमान देखते हैं ,किसी की जात- पांत नहीं पूछते |

हरिद्वार में जो धर्म संसद हुई ,उसमें जिनका जमावड़ा था ,वे भी साधु -सन्त ही कहलाते हैं लेकिन उस वीडियो में जो बातें सुनी गयीं उनके अनुसार ये वैसे सन्त न थे |

ये तो मदांध थे ,जो बहुसंख्यकों के अविवेक को अपनी ताक़त मानते हैं |वे अपने धर्म के लोगों की संख्या बढ़ाने और दूसरे धर्म के लोगों के लिए सफाई अभियान (सामूहिक हत्या )चलाने की बात  कह रहे थे |

भारत में जो संविधान अस्तित्व में है ,वह किसी को भी अशांति फ़ैलाने और खुलेआम ऐसी बातें करने की अनुमति नहीं देता लेकिन वहां उपस्थित लोगों ने इस विचार का रत्ती भर भी विरोध नहीं किया बल्कि उनकी बातें सुनकर करतल ध्वनि का गगनभेदी उद्घोष यह घोषित कर रहा था कि यह अहिंसा और महात्मा गाँधी का भारत नहीं है |

यद्यपि गाँधी जी अपने आपको हिन्दू ही मानते थे और अन्त समय में भी उनके मुँह से हे राम ही निकला लेकिन ये तथाकथित सन्त उन्हें रामभक्त नहीं मानते |चूंकि वे हिंसक अथवा किसी अन्य धर्म से सम्बंधित धर्मस्थल के भंजक नहीं हो सकते थे |

ऐसा नहीं था कि वे कमजोर शरीर के थे इसलिए अहिंसक थे बल्कि उन्हें अपने मन पर ज्यादा काबू था इसीलिए अहिंसा को अपनी शक्ति मानते थे |

अहिंसा को अपनी शक्ति के रूप में इसके लिए उन्होंने सत्य के साथ प्रयोग किये तथा अपनी मानवीय कमजोरियों को भी छिपाने की कोशिश नहीं की |अपनी कमजोरियों को सहजता से स्वीकार करना सबसे बड़ी वीरता है |

धर्म संसद में यही वीरता दिखाई नहीं पडी |वहां एकत्रित जिन लोगों को सन्त कहा जा रहा था ,वे माइक पर निरंतर आग उगल रहे थे |वे सिर्फ विधर्मियों के प्रति ही नहीं बल्कि भारतीय संविधान के प्रति भी असम्मानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे थे, जिसके निर्माण में जिनका योगदान था,उनमें अधिकांश हिन्दू थे |

यह संविधान 26  जनवरी   1950 से लागु हुआ और पूरे राष्ट्र ने इसे हर्षोल्लास से स्वीकार किया |तब से लेकर अब तक इस संविधान से कोई समस्या महसूस नहीं की गयी |बीच में जिन संशोधनों की ज़रुरत महसूस की गयी वे संशोधन संविधान प्रदत्त उपायों से कर दिए गए |भारत में आज तक यह संविधान लागू है |जितने भी चुनाव अभी तक हुए हैं इसी की व्यवस्थाओं के अनुसार हुए और देश ने जो भी विकास किया उसका आधार यही संविधान रहा |

संविधान दिवस का उत्सव दो  वर्ष पहले (26 /11 /2019 को ) केंद्र सरकार के कार्यालयों में भी आयोजित किया गया था |इसमें केंद्र सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़ी और इसके आदर्शों के प्रति समर्पण का दायित्व प्रकट किया |

इस सम्मान की अभिव्यक्ति के बावजूद हरिद्वार की इस धर्म संसद में भारतीय संविधान को भी आक्रोश माध्यम बनाया गया और शासन ने इसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की |

किसी भी देश का संविधान रेल की उन पटरियों की भाँति हैं जो रेल की सुरक्षा की रूपरेखा हैं | भारत का संविधान भी इस महान राष्ट्र के अस्तित्व को मजबूत बनाता है इसलिए  भारतीय संविधान का सम्मान का सम्मान सुनिश्चित करना भारत सरकार का महत्वपूर्ण दायित्व है |

भारत का संविधान मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखकर हर नागरिक को कुछ कर्तव्यों और अधिकारों से युक्त करके आदर्श नागरिक का निर्माण करता है इसलिए जब कोई धर्म देश के संविधान को भी आक्रोश का माध्यम बना ले तो किसी भी व्यक्ति का धार्मिक होना पाप हो जाता है |   

- आर.के.प्रिय