बाबा हरदेव सिंह जी के जीवन में दिखी दूसरों की भावनाओं की क़द्र अर्थात संवेदनशीलता की पराकाष्ठा

        सत्गुरु सतगुरु की आँखें तो शेष लोगों के समान ही होती हैं लेकिन दृष्टि विलक्षण होती है |यह निष्कर्ष मुझे एक प्रसंग से मिला जो आदरणीय मित्र विवेक शौक़ जी के माध्यम से मुझे सुनने को मिला |

        सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी मितभाषी थे लेकिन मंच पर आसीन होकर जब शिष्यों पर कृपा दृष्टि डालते थे तो शब्दों में इतना बल होता था कि किसी भी प्रकार का कोई भ्रम टिक नहीं सकता था |

         उत्तराखंड की बात है,बाबा जी एक गांव में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि दूर दूर से संगतें उनके दर्शनों के लिए पहंची हुई थीं |उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके आने की खबर मिली तो लोग ऐसे उमड़ पड़े जैसे बरसात के मौसम में बादल उमड़ते हैं और रहमत की ऐसी बरसात हुई कि जैसे कबीर साहब ने कहा था-

बरसा बादल प्रेम का भीजि गया सब अंग......

यह स्थान उत्तराखंड में कहीं था |उस स्थान तक पहुँचने के लिए कई पहाड़ पार करने पड़ते थे |उन्हें सत्संग स्थल तक पहुँचने के लिए तीन दिनों का समय लग जाता था |उनकी तपस्या को देखकर हम हैरान थे |

        सबने उनके सेवा भाव और गुरुभक्ति के इस उद्यम की भूरि भूरि प्रशंसा की लेकिन बाबा जी की दृष्टि हम सबसे गहरी थी ,विवेक जी ने बताया कि बाबा जी ने कहा कि -

        जरा उन सन्देश वाहकों के बारे में सोचिये जो उस गॉँव तक सत्संग आयोजित होने का सन्देश पहुँचाने के लिए गये |

         उन्हें तीन दिन उस गाँव तक पहुँचने में लगे और तीन दिन सत्संग स्थल तक वापस आने में |

बाबा जी की दृष्टि की विराटता को देखकर हम सब हैरान थे लेकिन यह विराटता तो उनके व्यक्तित्व में स्थायी प्रभाव रखती थी इसलिए यह हैरानी किसी एक दिन की बात नहीं थी |

        विवेक जी ने बताया कि बाबा जी जहाँ जाते वहाँ से एक- दो tissue पेपर्स उठाकर अपनी जेब में रख लेते थे |

        हम जितने सेवादार बाबा जी के साथ चलते थे तो हम सबकी जेबों में टिश्यू पेपर्स की अच्छी-खासी मात्रा होती थी |इसके बावजूद बाबा जी tissues अपनी जेब में रख लेते थे |यह हमारे लिए एक रहस्य था क्योंकि बाबा जी संग्रहवृत्ति बिलकुल नहीं थी |

       फिर बाबा जी टिश्यू पेपर्स क्यों लेते थे यही प्रश्न था लेकिन यह भी एक गहरा रहस्य था |

जब हम कोठी में वापस आये और बाबा के वस्त्रों को धोने के लिए देने लगे तो उनमें बहुत सारे tissues भी निकले ,उन पर बहुत सारे खून के निशान थे |

          यह देखकर हमें स्वाभाविक ही बहुत दुःख हुआ लेकिन यह खून आया कहाँ से ?

बाबा जी ने बताया कि सुबह जिस घर में नाश्ता करने गए थे ,वहाँ के सोफे में से एक कील  उभरी हुई थी |

       वह कील बाबा जी की उंगली में चुभी और खून निकल आया ,खून की बात घर केकिसी भी सदस्य को पता न लगे इसलिए बाबा जी ने अपने जेब से टिश्यू निकाला और इस्तेमाल करके फिर जेब में ही ढाल लिया |

        बाबा जी को मालूम था कि अगर कोई सदस्य देख्नेगा कि उसकी वजह से बाबा जी की ऊँगली से खून निकला है तो वह अपने आपको कभी माफ़ नहीं कर पायेगा इसीलिए बाबा जी tissue पेपर्स को अपनी जेब में रख लेते थे |वे उसकी भावनाओं का इतना ज्यादा खयाल करते थे कि ऐसे संवेदनशील गुरु को अपने बीच पाकर हमें एक अनूठे गौरव की अनुभूति होती थी |

   मैं इस भाव को बाबा जी की संवेदनशीलता की पराकाष्ठा ही कहूंगा जो कि  शिष्यों की श्रद्धा भावना की इतनी ज्यादा क़द्र करते थे |इसे आप क्या कहेंगे ?      

रामकुमार 'सेवक'