और इस प्रकार बेटियों के विवाह करने आसान हो गए

 -रामकुमार सेवक 

         1973 की मसूरी कॉन्फ्रेंस में अनेक ऐतिहासिक फैसले हुए थे जो निरंकारी मिशन के प्रचार-प्रसार को नया मोड़ देने वाले थे |

       वरिंदर विक्की जी ने बताया कि मेरी माता प्रेम कौर जी को बाबा अवतार सिंह जी के कार्यकाल से ही उनकी दृढ़तापूर्ण ऐतिहासिक भूमिकाओं के लिए याद किया किया जाता है |उनकी भक्तिपूर्ण निष्ठां चट्टान की भाँति अविचल थी | 

       बात दरअसल इस प्रकार है कि मेरे चाचा जी की शादी तय हुई थी |यह 1973 के बाद की बात रही होगी शायद |क्यूंकि हमारे घर के पच्चीस-तीस लोग बारात में जाने की तैयारी कर रहे थे |घर में पुत्र का विवाह हो रहा था तो स्वाभाविक ही परिवार में बहुत उत्साह था लेकिन सत्गुरु का आदेश इस उत्साह को कम करने वाला था |

           यद्यपि निरंकारी बाबा जी इस प्रकार के घरेलू आयोजनों में कोई दखल नहीं देते क्यूंकि निरंकारी अनुयाई अपने आयोजनों के प्रति पूर्णतः स्वतंत्र हैं लेकिन मिशन के अमुयाईयों में सादगी ,सहजता और सरलता रखने का आदेश था कि बारात में जाने वालों की संख्या पंद्रह से ज्यादा नहीं होगी |

          अब सवाल यह खड़ा हुआ कि बारात में जाने के इच्छुक लोगों की संख्या निर्धारित आदेश में सम्मिलित संख्या से अधिक थी तो प्रश्न यह खड़ा हो गया कि किसे अनुमति दी जाये और किसे नहीं और सत्गुरु के आदेश का उल्लंघन तो चाहकर भी नहीं कर सकते थे |

          आखिर निष्कर्ष यह निकला और मेरी माता जी ने यह व्यवस्था दी कि बारात में तो पंद्रह से ज्यादा व्यक्ति जा सकेंगे लेकिन इस संख्या से अधिक जो संख्या होगी उसे वहां भोजन करने की अनुमति नहीं होगी अर्थात बारातियों की संख्या पंद्रह ही रहेगी बाकी लोग अपने -अपने घरों में लौटकर भोजन करेंगे |

          इस प्रकार बारातियों के लिए एक मर्यादा स्थापित हुई |इस व्यवस्था के दूरगामी परिणाम हुए ,स्पष्ट हो गया कि निरंकारी अनुयाई अपने गुरु के आदेश को सर्वोपरि रखते हैं |

            इसका परिणाम यह भी हुआ कि विवाह के खर्चे कम हो गए और कन्या पक्ष के लिए कन्या का विवाह करना कुछ सरल हो गया | 

            मेरा विवाह सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी के कार्यकाल में वर्ष 1993  में हुआ था |संयोग की बात उस वर्ष होली के त्योहार पर जो सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन जो निरंकारी कॉलोनी के युवा किया करते थे ,उसमें शादियों को सरल रखने का सन्देश निहित था |मेरी माता प्रेम जी का कहना था कि सतगुरु का आदेश सिर्फ नाटक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए नहीं होता बल्कि व्यवहार में उतारने के लिए होता है |


            माता जी ने आदेश दिया कि उस रविवार की संगत के पूरे लंगर की व्यवस्था हमारे परिवार की ओर से कर दी जाये |इस प्रकार मेरे विवाह में रविवार के साप्ताहिक सत्संग के पूरे संगत परिवार के लंगर की व्यवस्था हमारे परिवार की ओर से हुई |हमारी आर्थिक स्थिति भी संतोषजनक थी और ज़माना भी बदल चुका था | 

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