हमारे पास निर्मल हृदय के शुद्ध भाव हैं या केवल खोखले शब्द ?

 रामकुमार सेवक 

गुरु अनाथों का नाथ है ,इसे मैं सबका नाथ इसीलिए कह रहा हूँ क्यूंकि इसके दिल में सबके लिए जगह है |सबके लिए जगह है इसीलिए यह सबसे बड़ा है |

एक इंसान खुदा के बारे में प्रवचन कर रहा था जिसे सुनकर एक अनाथ बच्चे को परमात्मा से बहुत मोह हो गया ,उसे लगा कि कथा वाचक ,जो काफी विद्वान थे ,खुदा के बारे में कह रहे थे कि खुदा का कोई माईबाप नहीं है और मेरा भी कोई माईबाप नहीं है इसलिए उसे लगने लगा कि खुदा तो मेरा भाई है |

वह बच्चा बहुत गरीब था तो उसके भीतर एक किस्म का अपनत्व पैदा हो गया कि मेरा कोई माता -पिता नहीं है ,खुदा का भी कोई माता-पिता नहीं है |

खुदा के बारे में कोहतूर पर प्रार्थना करते समय मूसा कुछ ऐसा ही कहते थे -कि खुदा का कोई बहन-भाई नहीं है |खुदा अकेला है ,उसका कोई घर नहीं है |

वह बच्चा भी बिना घर दर था |उसकी तीस-चालीस भेड़ें थीं जिनको वह चराया करता था |उनका वह पालन-पोषण करता था |

      उसने खुदा को अपना भाई मानकर कहा- हे खुदा ,मैं भेड़ों का दूध दूहकर तुमको पिला सकता हूँ |अगर तेरे बालों में कभी जूं पड़ जाएँ तो मैं तेरा सिर साफ़ कर सकता हूँ | 

       अगर शरीर में कभी दर्द हो जाए तो तेरी मालिश कर सकता हूँ |इसी प्रकार परमात्मा से उसकी निकटता पैदा हो गयी |

       मूसा ने जब इस बच्चे की बातें सुनी तो उसे बहुत क्रोध आया |और उसने इस बच्चे के मुँह पर थप्पड़ जड़ दिए |बच्चा रो पड़ा |

        लेकिन खुदा से उसका सच्चा संवाद था क्यूंकि खुदा को सच्चाई पसंद है |उस बच्चे के संवाद में झूठ और फरेब का नाम तक न था |

        जहाँ सहजता होती है वहां मेरे और खुदा के बीच जरा भी कठिनाई नहीं होती |

निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे -

परमात्मा जटिलता (complications) को कभी पसंद नहीं करता |बाबा जी कहा करते थे-हरजी को अहंकार न भावै |

       अहंकार सरल चीजों को भी जटिल बना देता है |वह बच्चा बिलकुल सरल था इसलिए उसमें जरा भी अहंकार न था |अहंकार नहीं था तो जटिलता भी नहीं थी |इसलिए परमात्मा से सीधा संवाद था |

         मुरादनगर (उत्तर प्रदेश का एक क़स्बा )में हमारे एक महात्मा थे ,जिनका नाम रतन लाल था लेकिन हम उन्हें भगत जी कहते थे |सत्संग में जब बोलते थे तो उनकी बातें ज्यादा समझ भी नहीं आती थीं और बोलते बोलते अक्सर उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे और वे रोने लगते थे |

         उनकी बातें ज्यादातर लोगों के सिरों के ऊपर से निकल जाती थीं |


रामकृष्ण परमहंस स्वामी विवेकानंद जी के गुरु थे |अक्सर वे बोलते-बोलते समाधिस्थ हो जाते थे |

वे दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुजारी थे |जब वे माता को भोग लगाते थे तो उसे पहले खुद चख लेते थे |

इतने सरल महात्मा ही विवेकानंद जी के प्रखर व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते थे | 

वह अनाथ बच्चा जिसका परमेश्वर से से सहज संवाद हो गया था ,शायद इसी श्रेणी का था |

मूसा आज जब कोहतूर पर पहुंचे तो परमात्मा ने उनसे बात नहीं की |

हजरत मूसा भी सिद्ध पुरुष थे |परमात्मा से उनका भी सीधा संवाद था |परमात्मा ने उनसे बात नहीं की तो वे भी बेचैन हो गए |

परमात्मा ने कहा -तूमने आज मेरे सच्चे भक्त का दिल तोडा है इसलिए तुमसे मैं बात नहीं कर सकता |

नियम के अनुसार शब्द कुछ और हो सकते हैं लेकिन परमात्मा शब्दों के फेर में नहीं पड़ता |परमात्मा तो भाव देखता है और उन्हें ही स्वीकार करता है |

आइये खुद को टटोलें कि हमारे पास निर्मल हृदय के शुद्ध भाव हैं या केवल खोखले शब्द ?