मनुष्य बने या नहीं ?

 रामकुमार सेवक 


 यदि अध्यात्म कहीं नज़र आता है तो मुझे निरंकारी मिशन में नज़र आता है |इसे आप मेरा मोह भी कह सकते हैं क्यूंकि धर्म अथवा अध्यात्म की पहली परिभाषा यहीं मिली |मानवता का नाम भी यहीं सुना और केवल प्यार के आधार पर मानवीय सम्बन्ध भी यहीं देखने को मिले |

सेवादल में जब भर्ती हुआ तो मार्चिंग गीत में इस भाव को जीवन में उतारने का मौका मिला कि-


न हिन्दू ,न सिख ईसाई न हम मुसलमान हैं 

मानवता है धर्म हमारा ,हम केवल इंसान हैं |

 

कोई भी व्यक्ति जब भी पहली बार निरंकारी मिशन में आता है तो एक-दूसरे को आपस में चरण स्पर्श करते देखकर बहुत हैरान होता है |साथ ही वे एक-दूसरे को महापुरुष कहकर सम्बोधित करते हैं |

मुझे याद आता है कि कुछ पत्रकारों ने बाबा हरदेव सिंह जी से यह प्रश्न भी किया था कि ब्रह्मज्ञान लेते ही क्या कोई भी इंसान परिवर्तित हो जाता है अन्यथा उसे एकदम महापुरुष के नाम से सम्बोधित करने का क्या औचित्य है ?

जब मैं सन्त निरंकारी मासिक पत्रिका के हिंदी संस्करण का संपादक था तो इस आशय एक प्रश्न एक पाठक ने मुझे लिखकर भेजा था |

प्रश्न के साथ यह भी जिक्र था कि बाबा हरदेव सिंह जी ने इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया था |बाबा हरदेव सिंह जी बहुत ही विवेकी पुरुष थे ,वे कुछ भी बोलने से पहले काफी सोचते थे इसलिए उनके विचारों पर आधारित मिशन की बहुत सारी सूक्तियां हैं |जैसे उन्होंने कहा था -धर्म जोड़ता है,तोड़ता नहीं |

उन्होंने यह भी कहा कि-कुछ भी बनो मुबारक है पर पहले बस इंसान बनो इस प्रकार उन्होंने अनेक समाधान मानव समाज को दिए |

बाबा जी ने उस पत्रकार को बताया कि यह तो तय है कि इंसान की आदतें तो एकदम परिवर्तित नहीं होतीं लेकिन जब उसे बार - बार महापुरुष कहा जाता है तो इंसान को महसूस होता है कि अब मुझे कर्म से भी महापुरुष होना होगा ,यही कारण है कि सन्त समागमों में आये महापुरुष अपने व्यवहार से जाग्रत समाज की छवि निर्मित करते हैं | 

इस चौराहे पर खड़े होकर कुछ प्रश्न भी उभरते हैं कि-क्या हम निरंकारी खुद को मनुर्भव के रूप में महसूस करते हैं या मनुर्भव या मनुष्य बनो का उद्घोष हमारे लिए मात्र नारा बनकर रह गया है ?               

जब हम अपना परिचय एक निरंकारी के रूप में देते हैं तो आत्मविश्लेषण करना पड़ता है कि क्या मैं सदैव निरंकार में ही रहता हूँ चूंकि गुरुदेव हरदेव भाग १ में निरंकारी होने को इस प्रकार स्पष्ट किया था कि जिस प्रकार जापान में रहने वाले को जापानी और ईरान में रहने वाले को ईरानी कहा जाता है इसी प्रकार जो निरंकार में निवास करता है वह निरंकारी कहलाता है |

निरंकार के ज्ञान के परिपेक्ष्य में देखते हैं तो पाते हैं कि निरंकार सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है इस प्रकार महात्मा कहते हैं -

चौगिर्द हमारे रामकार,दुःख लगे न भाई |

निरंकारी होने के नाते जो पांच सिद्धांत हमने स्वीकार किये उन्हें यदि हमने सचमुच प्रण माना है तो फिर राम को सर्वत्र महसूस करते हैं |इस अवस्था में दुःख हमें स्पर्श कर ही नहीं सकता तभी इंसान उपर्युक्त सच्चाई को महसूस कर सकता है और बाबा हरदेव सिंह जी के वचन -

एक को जानो ,एक को मानो और एक हो जाओ 

को मानकर मुक्ति को जीते जी अनुभव कर सकता है |