- रामकुमार 'सेवक'
जोहर कानपुरी के इस शेअर ने आज विचारोत्तेजना से भर दिया है -
जीतने का यह हुनर भी आजमाना चाहिए
भाईयों से जंग हो तो, हार जाना चाहिए
कौरवों की पृष्ठभूमि देखें |पूरे पांडव परिवार को भस्म कर देने के लिए लाख का मकान बनवाना |अर्जुन से विवाह के पश्चात भी द्रोपदी के अपहरण का षड़यंत्र और अंततः भरी सभा में चीर-हरण |
ज़रा सोचें जो इंद्रप्रस्थ की महारानी और अपनी भाभी द्रोपदी का सबके सामने चीर-हरण कर सकते हैं तो वो सामान्य स्त्रियों के साथ क्या - क्या नहीं करते होंगे यह कल्पना सहज ही की जा सकती है | उन्होंने कभी भी युधिष्ठिर को न्याय का पात्र नहीं माना जबकि वे ज्येष्ठ भ्राता थे, और जितना भी संभव था उनका उत्पीड़न किया, फिर भी कौरवों का पक्ष सिर्फ इसलिए लेना कि वे भाई थे,न्यायोचित नहीं है |
कई बार मुझे अर्जुन की मनभावन यह शांति कायरता का नमूना लगती थी लेकिन जोशी जी मुझसे बहुत बड़े थे और अपनी बात के समर्थन में उनके पास त र्कों की भरमार होती थी |मेरे पास सिर्फ श्रीकृष्ण के प्रति जन्मजात श्रद्धा थी इसलिए मेरा चुप रहना लाजमी था |यद्यपि जोशी जी अपना मत प्रकट करने और स्वयं से असहमत होने की स्वतंत्रता देते थे लेकिन उनसे असहमत होने और उसे सिद्ध करने का काम सरल नहीं था |
निर्मल जोशी जी ने किसी मंदिर में रास और कृष्ण पर बोलते हुए स्पष्ट कहा था कि लोग श्रीकृष्ण के बारे में अजीब-अजीब बात करते हैं जिनमें से ज्यादातर सुनी-सुनाई होती हैं |मैं कहता हूँ तुम भी रास रचाओ लेकिन शर्त यह है कि-जीवन में एक गीता लिख दो |
गीता का पूरा नाम है - श्रीमद्भगवद गीता |इसके कुल अठारह अध्याय हैं जिनमें जीवन की सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान निहित है |कल ही महाराष्ट्र के एक मंत्री कह रहे थे कि गीता को किसी धर्म के दायरे में बांधना संभव नहीं है |अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में गीता का नियमित अध्ययन किया जाता है ताकि जीवन की समस्याओं पर विजय पायी जा सके |
श्रीकृष्ण के जीवन में बहुत सारे चमत्कार दिखते हैं, कोई भी तार्किक व्यक्ति उन पर आसानी से यकीन नहीं कर सकता |जैसे बचपन में पूतना नामक राक्षसी ने उन्हें अपना दूध पिलाकर मारने की कोशिश की और वह स्वयं मर गयी |
बचपन में ही खेलते-खेलते उनकी गेंद यमुना में चली गयी, जिसे लेने के लिए वे यमुना में कूद गए |वहां कालिय नाग रहता था, जिसके प्रभाव से यमुना का पानी ज़हरीला हो गया था |श्रीकृष्ण किष्कंटक वहां से सफल होकर लौटे |
श्री कृष्ण का पूरा जीवन चमत्कारों से भरा पड़ा है |श्रद्धालु हर चमत्कार को सत्य मानते हैं |जो साम्यवादी अथवा तर्कप्रधान जीवन जीते हैं वे हर चमत्कार को झूठ मानते हैं |जो मध्यमार्गी हैं वो न सब बातों को सच मानते हैं और न सब बातों को झूठ मानते हैं |वे हर घटना में से अपने मतलब का तत्व निकाल लेते हैं और संतुलित जीवन जीते हैं |
श्रीकृष्ण पर कम लिखना संभव नहीं लगता क्यूंकि उनके जीवन में आयाम अथवा विशेषताएं बहुत हैं |संक्षेप में यही कहना उचित होगा कि -
1. वे जन्मजात अवतार थे अन्यथा देवकी की उनके पूर्व की अन्य सन्तानो की भांति वे भी मारे जाते |उनका बचना संभव नहीं हो पाता |
2. वे क्रांतिकारी थे,क्यूंकि गाँव के मक्खन व् घी आदि को गांव से बाहर नहीं जाने देते थे भले ही मटकियां फोडनी पड़ें या मक्खन घरों से चुराना पड़े |
3. अर्जुन को उन्होंने वीरता का सबक सिखाया लेकिन स्वयं मथुरा छोड़कर द्वारिका चले गए क्यूंकि
ज़रासंध का मुक़ाबला करने की क्षमता मथुरा की सेना में नहीं थी |यह उनके जीवन का विरोधाभास था |
4. इसके बावजूद जरासंध का अंत उन्हीं की रणनीति से हुआ |
5. साम - दाम - दंड - भेद, हर प्रकार की नीति को उन्होंने अपने जीवन में अपनाया और विजयश्री प्राप्त की लेकिन उनके अपने परिजन ही उनके कहे का सम्मान नहीं करते थे इसलिए एक व्याध के तीर से उनके नश्वर जीवन का अंत हुआ |
परिवार का पूर्ण सहयोग न मिलना लगभग सभी महापुरुषों के जीवन की विडंबना रही है| बहरहाल श्रीकृष्ण का पक्ष आज भी न्यायोचित लगता है क्यूंकि अन्यायी और अहंकारी लोग सर्वनाश के ही पात्र हैं शासक बनने के नहीं, भले ही वे किसी के भी भाई क्यों न हों |

