समय की पुकार किसने सुनी ?

-रामकुमार सेवक 

समय की पुकार कौन सुनता है यह सोचने की बात है |समय की पुकार सुनते हुए, उन्हें माना जाता है जो कि समय के साथ बदल जाते हैं |जैसे ऐसा कार्य किया जाये जिसमें ज्यादा लाभ हो जैसे कुछ साल पहले फोटो ग्राफर का भी कारोबार अच्छा होता था |

एस टी डी कॉल करवाने की भी बहुत सारी दुकाने हुआ करती थीं |जिन लोगों ने कारोबार बदल लिये ,उन्हें माना गया कि उन्होंने समय की पुकार सुनी |

मैंने जब सबसे पहली बार यह वाक्य (समय की पुकार )लिखा तो मेरे मस्तिष्क में स्वामी विवेकानंद थे |

वे कारोबारी नहीं बल्कि सन्यासी थे |

सन्यासी कारोबार के बारे में सोचता ही नहीं बल्कि उसका जीवन तो पूर्णतः अध्यात्म को समर्पित होता है |

अध्यात्म में समय की पुकार सुनने के अर्थ तो परम पिता परमात्मा की प्राप्ति ही है |

इसका मुख्य कारण तो यही है कि संसार में हर चीज का option  (विकल्प )  उपलब्ध है लेकिन परमात्मा का कोई विकल्प नहीं है |

     जो परमात्मा को अनेक मानते हैं ,वहां तो उसी में कारोबार की अनेकों संभावनाएं निकल आती हैं क्यूंकि भक्ति में अनेकों धाराएं हैं |कोई शैव हैं ,कोई वैष्णव हैं |जो जिससे जुड़ जाता है, वह उसी का अनुयाई हो जाता है |

     हिंदुत्व में अनेकों मार्ग हैं -अनेकों देवी-देवताओं के रूप में उपासना की जाती है इसलिए जहाँ बहुदेव हैं वहां अनेकों विकल्प हैं इसलिए मुझे लगता है कि सत्य और समाधान तो एकत्व में ही है |

      एकत्व का विचार मुझे बाबा हरदेव सिंह जी से मिला  |

मुझे लगता है कि यह विचार हमारी शक्ति को बिखरने नहीं देता |बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे -एक परमाता को जानो |एक को ही मानो और एक हो जाओ चूंकि आत्मा तो एक ही है और इसे ही मुक्ति का प्रसाद चाहिए इसलिए मुक्ति अथवा मोक्ष की ही उपलब्धि सर्वोच्च उपलब्धि है |जो इसकी उपलब्धि हासिल कर लेता है वही समय की पुकार सुनता है |           

    हर नए वर्ष के अवसर पर हम भली भांति महसूस करते हैं कि वर्ष भी समय ही तो है |यह तथ्य वैसे ही सत्य है जैसे एक बच्चे का जवान होना और बाद में बूढा हो जाना |

    मुट्ठी  में  बंद  रेत  इकट्ठी करके और उसमें पैर डालकर हम बचपन में घर बनाया करते थे |

बचपन के उन दिनों में यह एक मनोरजक खेल था |लेकिन यह भी एक तथ्य है कि जब तक खेलते थे तब तक हम उस घर पर जान छिड़कते थे |लेकिन जब माँ की आवाज़ आती थी तो उसी आवाज़ का महत्व होता था |फिर घर की तरफ ऐसे दौड़ते थे जैसे बिल्ली की म्याऊं की आवाज़ पर चूहे |

माँ की आवाज़ आती तो खिलोनो का मोह छूट जाता था और हम अपने प्राणप्रिय घरोंदों को रोंदते हुए दौड़ते थे |  

       आती -जाती साँसों के बीच फिसलन की भाँति पहले बचपन गया |उसके बाद जवानी भी चली गयी |मुट्ठी में बंद रेत की  भांति वक़्त  लगातार फिसल  रहा   है | इस  साल  के  22 दिन  जा   चुके  हैं बाइस दिन पहले  हमने कुछ संकल्प किये थे |उन संकल्पों को कभी -कभी पढ़ लेना चाहिए |तब संकल्प नया रूप ले सकता है |

       नव वर्ष के शुभ अवसर पर हमने कुछ  नया  करने  की  प्रेरणा  ली  और  दी  थी -क्या  हमें  याद  है ?

        निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे जो दुर्गुण हैं ,जो जीवन में कुछ रचनात्मक नहीं जोड़ते |ऐसे कामो को जितनी जल्दी छोड़ा जाए उतना ही बढ़िया है | क्रोध  के  बदले  यदि  क्रोध  ही  किया .वैर    बदले  वैर  ही  किया   तो  फिर  नया   क्या   हुआ ?शुभ  क्या  हुआ ?

         नव वर्ष पर हमने कुछ उद्देश्य निर्धारित किये थे |उन उद्देश्यों पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए | 

          वर्ष के आगे बढ़ने के साथ अपने जीवन को ऊँचा उठाना था |यह तो निश्चित हैं कि जीवन अत्यंत सीमित है |

          पिछले वर्ष भी हमने कुछ  संकल्प निर्धारित किये थे |जैसे-एक बार मैंने अपने व्यवहार में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने की चेष्टा की थी कि किसी पर क्रोध नहीं करेंगे |

          किसी  ऐसे  व्यक्ति  को  साध संगत  से  जोड़ने  का  प्रयास करेंगे |जो  टूट  रहा  हो ,निराश  को  हौसला  देने  का  संकल्प करेंगे |

और  बाकी  भी  कुछ  ऐसे ही  या  PERSONAL.संकल्प किये इसकी  स


मीक्षा  करनी  ज़रूरी  है |-दातार  कृपा करे -अपने  संकल्प  याद  रखें  और  उन्हें  पूरा  कर  सकें  -धन  निरंकार  जी