नाम यदि सज्जन रखा है तो ठगी का काम छोड़ दो...

 -रामकुमार सेवक 

शायर निदा फ़ाज़ली साहब की यह बात अक्सर याद आती है,जिसमें वे कहते हैं -

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी ,जिसको भी देखना हो,कई बार देखना |

उन्होंने बहुत गहरी बात कही है| एक आदमी, जो हमें सिर्फ एक नज़र आता है उसके भीतर कई आदमी हो सकते हैं |उसके भीतर कोई बढ़िया वक्ता हो सकता है ,जो किसी को भी तालियाँ बजाने को मजबूर कर दे लेकिन कर्म उसके एकदम विपरीत हों |

बाबा हरदेव सिंह जी अपने प्रवचनों में एक ऐसे लेखक का किस्सा सुनाया करते थे जिसने सहनशीलता पर एक किताब लिखी लेकिन जब उसकी पत्नी ने भीतर आकर भोजन करने को उससे कहा तो लेखक महोदय ने अपनी भारी-भरकम सहनशीलता की किताब उसके सिर पर मार दी |

हम जान सकते हैं कि लेखक की सहनशीलता कितनी कमजोर थी |          

श्री गुरु नानकदेव जी के सम्बन्ध में पिछले दिनों एक विद्वान से सुनने को मिला कि उन्होंने एक आदमी को अपना नाम बदलने को कहा ,जिसका नाम तो सज्जन था लेकिन जो भी व्यक्ति उसके नाम पर यकीन करके उस पर अन्धविश्वास करता तो वह सज्जनता का चोला उतर फेंकता था और निर्लज्जता से ठगी करता था |

गुरु साहब ने उससे कहा कि इस नाम के साथ किसी को ठगी नहीं करनी चाहिए |अगर तुम ठगी से नहीं रुकते तो अपना नाम बदल लो |

सज्जन ठग तो अब तक इसी नाम से विख्यात है इसका अर्थ है कि उसने अपना नाम नहीं बदला लेकिन ठगी भी नहीं छोड़ी |

यह स्थिति दर्दनाक है लेकिन यह सिलसिला कोई नया नहीं है |

आदमी नारे तो सभ्यता और सज्जनता को बचाने के लगाता है लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई दे रही होती है |

बहुत वर्ष पहले मैंने एक प्रसंग पढ़ा कि एक धनी आदमी बैलगाड़ी में कहीं जा रहा था |गाँव में लोग अक्सर खुलकर बोलते हैं |छिपाने की उन्हें आदत कम ही होती है |इस प्रकार स्वभाव में प्रायः सच कहने और इसके कारण वाचालता का तत्व भी ज्यादा होता है |

हुआ यह कि बैलगाड़ी के नीचे एक मुर्गा आ गया |मुर्गे को मरा देखकर गाड़ीवान ने गाड़ी रोकी और सेठ से उसे छिपा दिया |

सेठ ने अपने नौकर गाड़ीवान से पूछा -अरे मंगरू ,सफ़ेद कपडे के नीचे तूने क्या छिपाया है ?

मंगरू हाथ जोड़कर बोला-मुर्गा है मालिक ,जिसे मरता देखकर आप बहुत दुखी हुए थे |

सेठ ने कहा-अरे इसे मेरे थैले में रख दे |शाम को इसकी स्वादिष्ट तरकारी  बनवाकर खाऊंगा |

मंगरू सेठ जी को शाकाहारी समझ रहा था लेकिन सेठ जी टॉप के माँसाहारी निकले |

दया-धर्म ,प्रेम -सज्जनता आदि की चर्चा बहुत होती है लेकिन जो बड़े धर्मावतार माने जाते हैं वे जरा नज़र बचते ही बहुत सफाई से धर्म की हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं करते इसलिए बार गुरु साहब की हिदायत याद आती है कि -सज्जन का नाम रखते हो तो ठगी मत करो |

शाकाहार और मांसाहार अब कोई मुद्दा नहीं रहा है चूंकि जीभ का स्वाद ही बड़ा मुद्दा बना हुआ है |यद्यपि यह एक बड़ा सत्य है कि जो भी हम खाते हैं जीभ से आगे उसका स्वाद कोई महत्व नहीं रखता |

मुझे अपनी ही कही एक बात याद आती है कि बैंगन सहित कई सब्जियां मुझे थोड़ी नापसंद हैं |लेकिन पत्नी ने एक दिन मुझे कढ़ी बनाने की सूचना दी |

कढ़ी चूंकि मेरा प्रिय खाद्य है तो मैं बहुत खुश हो गया लेकिन घर जाकर मैंने देखा कि थाली में कढ़ी के स्थान पर बैंगन विराजमान हैं |

मन बहुत ख़राब हुआ और ऐसा लगा जैसे पत्नी ने मुझसे ठगी कर दी हो |

यद्यपि पत्नी अक्सर यही कोशिश करती है कि मेरे लिए स्वादिष्ट भोजन बने लेकिन किसी दिन यदि भोजन स्वादिष्ट न बने तो उसे विवाद का विषय न बनाया जाये |क्यूंकि स्वाद का सम्बन्ध सिर्फ जीभ तक सीमित है इसलिए मुझे कढ़ी न बनाने पर अपने मन को संयम और विनम्रता की सलाह देनी चाहिए |

बहरहाल जनता को जिस मानवता ,एकता और भाईचारे के सपने नेताओं द्वारा प्रायः अपने शब्दों से दिखाए जाते हैं उन्हें साकार करने के लिए भी कुछ कोशिश होनी चाहिए अन्यथा सज्जन का सिर्फ नाम हमारी प्रतिष्ठा को नहीं बचा सकेगा |