हो सकता है समस्या उतनी बड़ी हो ही नहीं ---

 -रामकुमार सेवक 

एक दिन देखा कि बिजली नहीं आ रही थी जबकि पड़ोस में बिजली की कोई समस्या नहीं थी ,उजाला भी  था |जब कि हमारे घर में अँधेरा था और कंप्यूटर भी सन्नाटे में था | 

बिजली विभाग को फोन किया तो ज्ञात हुआ कि उधर से भी कोई समस्या नहीं थी |

उधर से कोई बाधा नहीं थी तो समस्या का आधार घर में ही खोजना पड़ा | घर में ही खोजा तो पता चला कि फ्यूज उड़ गया था |

विद्यार्थी जीवन में जब मैं वैद्युतिकी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था तो मुझे पता लगा कि जब बिजली के प्रवाह में बड़ा परिवर्तन होता है तो फ्यूज खुद बलिदान करके घर की वायरिंग को बचा लेता है |

तब मैं फ्यूज के इस कार्य में शहादत का जज़्बा देखता था |बहरहाल फ्यूज मनुष्य नहीं बल्कि एक कृत्रिम विद्युत् यन्त्र   है इसलिए उसे शहीद नहीं मान सकते |

बहरहाल उस समस्या को खत्म किया और लाइट दोबारा शुरू हो गयी |

ज़िंदगी में ऐसा बहुत बार होता है कि समस्या का आधार कहीं और होता है और समाधान कहीं और खोजा जा रहा होता है |

राबिया बहुत प्रखर और अनुभवी सन्त थी |

उन के साथ भी एक बार कुछ ऐसा ही हुआ था |वे बाहर गली में  सुई खोज रही थीं |शायद वे उस प्रसंग से लोगों को कुछ सन्देश देना चाहती थीं चूंकि बुजुर्ग थी तो लोगों ने उनकी मदद करनी चाही ,वे भी उनके साथ सुई खोजने लगे |

सुई मिली नहीं तो लोगों ने पूछा कि सुई खोई कहाँ थी ?

राबिया बोली कि सुई तो घर के भीतर खोई थी |

लोग बोले अगर घर के अंदर खोई थी तो अंदर ही मिलेगी बाहर नहीं | 

राबिया बोलीं -इस मामले में तुम लोग बहुत समझदार हो कि सुई भीतर खोई है तो भीतर ही मिलेगी लेकिन परमात्मा तुम्हारे मन से गायब है |क्यूंकि तुम्हारे मन में यह पुकार ही नहीं उठती कि परमात्मा से जुड़ें |

मोक्ष प्राप्त करने के लिए परमात्मा के साथ जुड़ना बहुत जरूरी है |परमात्मा से जुड़ने के लिए गुरु की शरण में जाना होगा |

समस्या भीतर की है लेकिन उपाय तुम बाहर कर रहे हो |कभी माला फेरने लगते हो तो कभी तीर्थाटन के लिए चले जाते हो |

मेहनत मन पर करने की ज़रुरत है और आप लोगों को खुश करने में लगे रहते हो | देखते हैं कि अशांति मन में है और लोग मन को साधने की बजाय माला फेरकर मन को शांत करने की कोशिश में लगे रहते हैं |

इस प्रकार बच्चों की तरह अपने मन को बहलाने में लगे हैं,किसी योग्य सत्गुरु को खोजने की बजाय |  |प्यास लगने पर पानी को कंठ से भीतर लेना होता है इसी प्रकार मन में प्रभु को बसा लेना होता है|

ज़रुरत मन को सहज बनाने की है कि वह विचलित न हो |स्थिर परमात्मा से जुड़ाव होगा तो मन कभी विचलित नहीं होगा |

सन्त कवि रैदास कहते हैं -

मन चंगा तो कठोती में गंगा |

हमारा मन चंगा कहाँ है क्यूंकि पाप की शुरूआत तो वहीं से होती है|वही है जो नयी नयी चालाकियां खोजता है और चालाकी से युक्त मन में प्रभु का बसेरा हो ही नहीं सकता |

जब इंसान जाग्रत होता है तो पाप को छोड़ने के प्रति जाग्रत होता है तो वापसी की शुरूआत भी मन से ही होती है |किसी कवि ने कहा है -मन जीते जगजीत |

 मन को जीतना तो असंभव जैसा है इसलिए मन को संयमित करना सीखें |

पावन गुरबाणी में कहा गया है -पहले मन प्रबोधो अपना पाछे अवरू रिझाओ |

ज़रुरत मन को संतुलित करने की है | मन को नियंत्रित करने के लिए सेवा ,सुमिरन और सत्संग का संतुलन चाहिए |

यह कार्य मुश्किल नहीं है क्यूंकि निरंकारी मिशन सहित अधिकतर आध्यात्मिक धाराओं में सत्संग कार्यक्रमों का तो जाल सा बिछा हुआ है |सुबह के भी कार्यक्रम लगभग हर शाखा में हो रहे हैं |दोपहर के कार्यक्रम दफ्तरों के आस -पास भोजन अवकाश में आयोजित किये जाते हैं |इस प्रकार सत्संग सुलभ हैं लेकिन सत्संग में रूचि प्रायः दिखाई नहीं पड़ती |सत्संग का उद्देश्य ही है -मन को संतुलित रखना |