व्यवहारिक अध्यात्म -एकाग्रता से युक्त होकर व्यवहार को अध्यात्म में ढालना जरूरी

निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी 


सन्तों-महात्माओं ने एकाग्रता से युक्त होकर मजबूती के साथ इस परमात्मा के साथ जुड़े रहने की बात कही है |चाहे कैसा भी समय आ जाए ,ये इस प्रभु का दामन छोड़ते नहीं हैं |

हरि का रंग  

प्रभु के,हरि के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह तो जर्रे-जर्रे में समायी हुई सत्ता है तो न यह हमसे अलग हो सकता है और न हम इससे अलग हो सकते हैं लेकिन देखने में आता है कि इसके साथ होने के बावजूद हम इसका एहसास खो बैठते हैं तो फिर दूरी बन जाती है |

परमात्मा की तरफ से दूरी नहीं है ,दूरी इंसानो की तरफ से है |  इस प्रभु के साथ नाता न जुड़ना |इसे भूलकर विषय-विकारों में खुद को गलतान रखना ,हमेशा सांसारिक तल पर ही जीते रहना यह प्रभु और हममें दूरी पैदा करता है |

जो इसके साथ अपनी निकटता बना लेते हैं उन्हें इस प्रभु के अस्तित्व का भी एहसास होता है और उन पर इसके असर भी होते हैं |हरि भी उसके संग रहता है जब इंसान खुद इस प्रभु के एहसास के साथ जीवन जीता है |यह आपस का प्रेम ही हरि का रंग है जो जीवन को अपना अनूठा रंग दे देता है |एक भक्त तमाम कर्तव्यों का पालन करते हुए भी इस प्रभु से नाता जोड़े रखता है,एहसास के रूप में |

निरंकार के प्रति समर्पण 

महात्माओं ने कहा है-काठ की पुतरी,क्या जाने बपुरी खिलावणहारा जाने 

यह है -समर्पण भाव |

महात्मा मानते हैं कि हम सब तो परमात्मा की बनायी हुई कठपुतलियां हैं |काठ की कठपुतलियां भला-बुरा नहीं जानती |कठपुतलियों को नचाने वाला जानता है कि किसका कहाँ उपयोग करना है |

इसी प्रकार सन्त-महात्मा हर जिम्मेदारी निभाते हुए भी कर्ता इस प्रभु को ही मानते हैं |इस प्रकार अभिमान से बचे रहते हैं |यही समर्पण की अवस्था है |  

जो तुद भावे 

सन्तों-महात्माओं ने सदैव से कहा है कि-जो तुद भावे साईं भली कार अर्थात जो तेरी मर्ज़ी के अनुकूल हो वही काम भला है -जो मुझ भावे नहीं कहा अर्थात प्रभु की रज़ा में राज़ी |

साथ ही ये यह भी मानते हैं कि-तू कर्ता है जगत का अर्थात पूरे जगत का कर्ता प्रभु तू ही है |जब सब-कुछ का कर्ता परमेश्वर को मान लिया तो यह भी भाव पैदा होता है कि-


पूरे का किया सब कुछ पूरा वाद-घाट कुछ नाही 

मन फिर इसकी रज़ा अर्थात प्रभु के किये हुए कार्य को ही श्रेष्ठ मानने लगता है |यही तो रज़ा में राज़ी रहना है |सब कुछ का कर्ता प्रभु है तो अभिमान की गुंजाईश ख़त्म हो गयी | सब जीव-जंतुओं को जब इसी का मान लिया जाए तो फिर किसी के साथ भी वैर की गुंजाइश नहीं रहती |इससे स्पष्ट है कि अध्यात्म मन को विशाल बनाता है  |  जीवन में चाहे जैसा भी समय आये सन्त-महात्मा -भक्त अपनी चाल सहज बनाये रखते हैं |परिस्थिति चाहे जैसी भी हो अपनी मनोस्थिति को वे प्रभु के प्रति समर्पण भाव से युक्त रखते हैं |फिर मन की अडोल अवस्था बनी रहती है |


अडोल आधार 

स्टूल या मेज के ऊपर यदि पानी का गिलास रखा हो तो मेज या स्टूल के हिलने के साथ वह गिलास भी हिलेगा |भक्त हमेशा चूंकि इस प्रभु-परमात्मा के साथ जुड़े रहते हैं,इसे ही अपना आधार बनाते हैं तो कभी डोलते नहीं हैं |उनकी चाल सहज बनी रहती है |सन्त-महात्मा सदा इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि-

हे प्रभु ,सहजता जीवन में तेरे बिना आ नहीं सकती |

तेरे बिना मन की अवस्था स्थिर नहीं हो सकती | तेरे एहसास के बिना जीवन में नेकियां नहीं हो सकतीं |

एक ही लक्ष्य 

सन्त -महात्मा -भक्तों की धुन यह परमात्मा ही होता है |इनकी दृष्टि इसी पर टिकी होती है जैसे महाभारत की निशाना लगाने वाली मिसाल हम पढ़ते-सुनते हैं कि गुरु जी अपने शिष्यों को निशाना लगाने के लिए ले गए |


उन्होंने पूछा -क्या नज़र आ रहा है तो सबने अपने -अपने जवाब दिए लेकिन जिसका लक्ष्यस्पष्ट था उसने कहा -मुझे सिर्फ चिड़िया की आँख नज़र आ रही है |सिर्फ वही निशाना लगा पाया |जिसे सिर्फ आँख नज़र आ रही हो तो वो निशाना कैसे चूक सकता है ?भक्त भी इसी प्रकार अपना ध्यान इस मालिक से,प्रभु से जोड़कर रखते हैं और भक्ति की ऊंची अवस्था हासिल करते हैं |  

कबीरदास जी को सत्य पथ से विचलित करने के लिए क्या -क्या नहीं किया गया कि परमात्मा को ये भूल जाएँ |

मीराबाई को विचलित करने की कोशिश की गयी कि यह ज़हर से डर जाए |इसे बदनाम करें ताकि यह प्रभु भक्ति को छोड़ दे लेकिन मीराबाई की भक्ति क़ायम रही और कबीर जी को भी यही धुन थी कि सत्य को छोड़ नहीं सकता | संसार में ज़रा सा उतार-चढ़ाव भी आये तो इंसान कहीं का कहीं पहुँच जाता है जबकि भक्त सदा अडोल अवस्था को धारण किये रखते हैं | 

जितना -जितना पानी ,उतनी-उतनी ठंडक 

हम देखते है कि नदी में जो जितना -जितना उतरता है उतनी-उतनी उसे ठंडक प्राप्त होती है |जो घुटनो तक डूबा उसे घुटनो तक की ही ठंडक मिली |जो कन्धों तक डूबा उसे कन्धों तक ठंडक मिली ,जिसने  सिर से पैर तक डुबकी लगायी वो पूरा स्वच्छ हो गया और ठंडक भी ज्यादा मिली | इसी प्रकार जो परमात्मा के एहसास में जितना-जितना डूबा उसे उतनी-उतनी शांति मिली ,आनंद  मिला  |भक्त इस प्रभु के रंग में रंगे रहते हैं और चौरासी लाख योनियों से मुक्ति प्राप्त करते हैं |वे लोक की यात्रा को भी सहजता से तय करते हैं और परलोक भी सुहेला करते हैं |

 उन्होंने चूंकि इस परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करके इसे ही अपने जीवन का आधार बनाया तो यहाँ भी समर्पित जीवन जिया और चूंकि आत्मा को ठिकाना मिल गया तो वहां भी परवानगी अर्थात लोक भी सुखी परलोक भी सुहेला |यह उपलब्धि जीवनकाल में ही हासिल करनी होती है |शरीर में रहकर ही यह काम करना होता है |