यथार्थ वचन -रोम रोम में राम -क्या सचमुच है ?

 रामकुमार सेवक 

 अनूप जलोटा साहब ने एक भजन गाया है-

तेरे तन में राम ,मन में राम ,रोम -रोम में राम रे , 

राम सुमिर ले ,ध्यान लगा ले,छोड़ जगत के काम रे  |

यह भजन सुनना एक सुखद अनुभव है |तन में राम है क्या ?जरा सोचकर देखिये -राम तो अयोध्यावासी हैं ,उनका इतना बड़ा मंदिर बन रहा है ,वे किसी इंसान के तन में कैसे समाहित हो सकते हैं ?

यह सुनकर आदमी फ़ौरन पैंतरा बदलता है और एक दम फिल्म नीलकमल के मधुर भजन को गुनगुनाने लगता है ,जिसमें साहिर लुधियानवी साहब ने लिखा है -

हे रोम -रोम में बसने वाले राम 

जगत के स्वामी ,हे अंतर्यामी ,मैं तुझसे क्या मांगू ----

हम कहते हैं-राम तो रोम -रोम में रमा हुआ है |प्रश्न उठता है कि-क्या राम साहिर साहब के रोम-रोम में भी रमा था ?वे तो मुसलमान थे 

हो सकता है कि मेरे हिन्दू भाई इस प्रश्न को अनुचित बल्कि धर्मविरुद्ध भी घोषित कर दें लेकिन प्रश्न तो स्वतः ही पैदा हुआ है |मेरा स्वयं का पैदा किया हुआ नहीं है |

जैसे खेती के साथ खर -पतवार अपने आप पैदा होती है ,इसी प्रकार ऐसे प्रश्नो को कोई पैदा नहीं करता |अपने आप पैदा होते हैं |ऐसे प्रश्न क्यूंकि सत्य होते हैं और सत्य की अपनी शक्ति होती है |यह सत्य हमारे दिल को प्रभावित करता है |जरा इसके उत्तर पर विचार करें |

हमारा दर्शनशास्त्र कहता है कि-

मनुष्य शरीर पांच तत्वों से निर्मित है-छिति,जल ,पावक ,गगन समीरा,पंच तत्व यह अधम सरीरा 

पांच तत्वों के साथ -शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं,पाँच कर्मेन्द्रियाँ भी हैं | मन ,चित,बुद्धि और ,अहंकार भी हैं |कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्धि तर्क करती है और मन भी उसकी मदद करता है तो मन में प्रश्न स्वतः पैदा होता है (खर -पतवार की तरह )

पहला प्रश्न तो अनूप जलोटा जी के भजन के साथ पैदा होता है-तन में राम ?

क्या हर तन में राम है -मेरे जैसा आम आदमी कहेगा ,यह कोई पूछने की बात है ?

इसका तात्पर्य है  कि-जो भी मनुष्य शरीर है,उसके रोम-रोम में राम बसा हुआ है |

इस बात को ज्यादातर लोग स्वीकार करते हैं |यह अलग बात है कि राम को हर किसी में मान भी  लेंगे और एक वर्ग के विरुद्ध बुलडोजर भी चला लेंगे |

यद्यपि ऐसे लोग भी हैं जो राम शब्द को किसी भी हालत में जुबान पर न लाएंगे |ऐसे लोगों पर हिन्दू क्रोधित होंगे और मुसलमान होने के बावजूद -हे रोम -में बसने वाले राम लिखने पर ऐसे कठमुल्ले  साहिर साहब को भी सहन न करेंगे |

कुमार विश्वास जी कहते हैं-दोनों तरफ ऐसे (अनुदार )लोग हैं |

उन्हें यहीं छोड़कर आगे बढ़ते हैं |तथ्य यह है कि अनूप जलोटा अथवा साहिर ने जिस राम की चर्चा की है वह निराकार है |

यह तथ्य इस प्रातः गायी जाने वाली आरती से भी स्पष्ट हो जायेगा |इसमें हम बचपन से ही गाते आये हैं-

 ॐ जय जगदीश हरे ,भक्तजनो के संकट क्षण में दूर करे |

बड़े से बड़ा संकट क्षण में दूर जो कर सकता है ,ऐसा परमेश्वर अथवा जगदीश साकार नहीं हो सकता क्यूंकि जो शरीर में है अर्थात साकार है वह एक समय में एक ही स्थान पर हो सकता है |

ऐसा व्यक्ति एक साथ ज्यादा से ज्यादा एक परिवार के संकट दूर कर सकता है ,पूरी सृष्टि के नहीं | इसलिए अनूप जलोटा और साहिर लुधियानवी जिस राम की चर्चा कर रहे हैं वह निराकार ही हो सकता  है जिसके लिए कहा गया है -

बिनु पग चले ,सुने बिनु काना ,कर बिन कर्म करे विधिनाना 

आनन् रहित सगल रस भोगी ,बिन बानी ,वकता बड़जोगी |  

अनेक मनीषियों ने लिखा है -जपा कर,जपा कर हरि ॐ  तत्सत |इस जाप को जपने का पवित्र स्थान है -मंदिर |

मंदिर के विषय में निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे-मंदिर किसे कहते हैं ?

बाबा जी कहते थे कि लोग कहते हैं-मन मंदिर |

बाबा जी कहते थे कि हर मन, मंदिर नहीं हुआ करता क्यूंकि मंदिर हम उसे कहते हैं -जिसमें प्रभु का वास हो |

जिस मन में प्रभु बसा हो,सिर्फ वही मन मंदिर हुआ करता है | बाबा जी कहा करते थे कि पूजा करनी है तो खुद मंदिर बन जाना होगा |यह गहरी बात है क्यूंकि खुद मंदिर बनना आसान नहीं है |

हमें मालिक ने जो मन दिया है,उसके भीतर कुछ लोग घुस गए हैं और मन मंदिर खाली करने को तैयार नहीं हैं |ये अनचाहे तत्व हैं-काम,क्रोध,लोभ,मोह ,अहंकार आदि |ऐसे में मन निरंकार का स्वागत कर ही नहीं सकता |

मुझे एक और भजन याद आ गया है ,हमारे बचपन में यह भजन काफी लोकप्रिय था -

कन्हैया -कन्हैया तुझे आना पड़ेगा,

गीता वाला वादा निभाना पड़ेगा |

सोचने की बात यह है कि कन्हैया क्या अपना वादा भूल गए हैं जबकि निरंकार रूप में जो कन्हैया है,वह  हम लोगों की तरह भुलक्कड़ नहीं हैं |गीता में जो उन्होंने कहा है -

परित्राणाय साधुनाम ,विनाशय च दुष्कृताम 

धर्म संस्थापनाय ,सम्भवामि युगे युगे 

यह वादा उन्हें याद है और अपना वादा निभाने के लिए वे तैयार भी हैं लेकिन हमारे मनो में जो वैर,ईर्ष्या ,हिंसा ,द्वेष आदि ने पहले ही से कब्ज़ा कर रखा है इसलिए प्रश्न हमारी तरफ लौट आता है |जैसे कन्हैया पूछ रहे हैं कि-मुझे बैठाने के लिए तुम्हारे पास जगह कहा है ?

अपने मन में प्रेम के लिए जगह तो बनाओ क्यूंकि महाकवि गोपाल दास नीरज जी ने लिखा है -

कोई कहता है मुहब्बत खता है 

कोई कहता है मुहब्बत सजा है 

अगर मुझसे पूछो तो मैं यह कहूंगा -खुदा मुहब्बत है ,मुहब्बत खुदा है |


राम ,कृष्ण ,खुदा अल्लाह गॉड आदि यदि एक के ही नाम हैं तो इन नामो में एक मुहब्बत को भी जोड़ लीजिए और मुहब्बत के लिए अपने मन में जगह पैदा कीजिए |

फिर मन मंदिर हो जायेगा और हम गौरव से कह सकेंगे -

तन में राम ,मन में राम ,रोम -रोम में राम है 

राम को सुमिरें राम को पाकर यही बड़ा आराम है |

धन्यवाद