युगों से इस संसार में भक्तों के जीवन को ही श्रेष्ठ माना गया गई |जो दुनिया और दुनियादारी में ही खचित रहे,प्रभु को अपने जीवन में महत्ता नहीं दी ,जो वैर-ईर्ष्या,हिर्स-ओ-हवस से युक्त होकर इस धरती पर विचरण करते आये हैं, उन्हें तो धरती पर बोझ का रूप ही माना गया है | जो भक्त होते हैं,वो हमेशा यही अरदास करते हैं कि हम परमार्थी बने रहें ,कदम-कदम पर परमात्मा को विशेषता देते रहें |
हम हमेशा उन values (शिक्षाओं )को महत्व देते रहें ,जिन्हें सन्तो-महात्माओं ने हमेशा विशेष माना है |
गुरसिख ,किसे कहते हैं
गुरसिख हमेशा सत्य के साथ नाता जोड़कर ,इस सत्य को अपने ह्रदय में बसाकर जिस मार्ग पर चलता है ,वह पूर्ण रूप से अध्यात्म का मार्ग होता है |उसके जीवन की चाल उसकी आध्यात्मिक भावनाओं के अंतर्गत होती है | वे सदा परमात्मा से ऐसे ही मार्ग पर दृढता से चलते रहने की प्रार्थना करते हैं अन्यथा दुनिया में अनेक प्रकार के रूप हैं,अनेकों ऐसी objects (चीजें )हैं ,भावनाएं हैं -प्रवृत्तियां हैं,फितरतें हैं |जो Prorities(प्राथमिकताएं ) और Preferences (वरीयताएं )हैं |गुरसिख अथवा भक्त हमेशा दूसरों को सुखी करना चाहता है |जीवन की सच्ची राह
परमार्थ और भक्ति को जिन्होंने विशेषता दी है,वही युगों-युगों से श्रेष्ठ बनकर सामने आये हैं | चाहे युग बीत गए लेकिन हमारी श्रद्धा -आस्था उनके प्रति बानी हुई है क्यूंकि वे परमार्थ और भक्ति के मार्ग पर चले जो कि जीवन जीने की सच्ची राह है,सही मार्ग है |
उन्होंने इस रमे हुए राम को जीवन में विशेषता दी ,इसे जीवन का आधार बनाया |उठते-बैठते इस निराकार के रंग में रंगे रहे |चाहे वे कुटिया में रहे,झोपड़ी में रहे या महल में रहे ,चाहे उन्होंने बहुत पढ़ाइयाँ नहीं की हों,शरीर की दृष्टि से बहुत ताक़तवर भी न हों लेकिन आज युग बीत जाने के बाद भी उनका स्थान हमारे हृदयों में बना हुआ है |
आज की आवश्यकता
आज भी यही प्रार्थनाएं -अरदासें की जा रही हैं कि हम उसी मार्ग पर चलें ,जिस पर ये सन्त-महात्मा चले,भक्ति का मार्ग,परमार्थ का मार्ग |
हर युग में दोनों प्रकार के इंसान रहे हैं-भक्ति के मार्ग पर चलने वाले और इसके विपरीत कर्म करने वाले भी |दोनों के नाम दुनिया में कायम हैं |यदि शबरी का नाम कायम है तो रावण का नाम भी कायम है |
सोचने की बात यह है कि किसके आगे मस्तक श्रद्धा से नत होता है ?क्या रावण के आगे ,नहीं,शबरी के आगे | हनुमान जी के आगे ,छोटे से बालक प्रह्लाद के आगे न कि हिरण्यकश्यपु या कंस के आगे |न कि सांसारिक प्रवृत्तियों में खचित किसी व्यक्ति के आगे |नाम बेशक है उनका भी इतिहास में लेकिन उनके प्रति श्रद्धा नहीं है |
उनको दुत्कारा जाता है,विपरीत भाव से लिया जाता है ,उनको नीची दृष्टि से देखा जाता है |
सन्त-महात्मा सदैव से ऐसे मार्ग को अपनाते आये हैं जो श्रेष्ठ मार्ग प्रमाणित हुआ है |
श्रेष्ठ मार्ग चुनते हैं इसलिए
सन्त -महात्मा श्रेष्ठ कहलाने के लिए श्रेष्ठ मार्ग नहीं चुनते क्यूंकि श्रेष्ठ कहलाने की इच्छा भी इस मार्ग पर चलने वालों की भावना नहीं होती |क्यूंकि कुछ कहलाने की इच्छा भी परमार्थ में स्वीकार नहीं की जाती |मैं भक्त कहलाऊँ या पुजारी कहलाऊँ इस इच्छा को परमार्थ में नीचा दर्जा प्राप्त है |परमार्थी में यह इच्छा भी नहीं होती कि मैं इस मार्ग पर इसलिए चलूँ कि मुझे श्रेष्ठ माना जाए |जो श्रेष्ठ कहलाने की इच्छा से भक्ति करता है .वह भक्ति का वास्तविक आनंद ले ही नहीं सकता |अपने आपको कुछ कहलाने की इच्छा परमार्थ के मार्ग में बाधा बन जाती है |
गुरसिख आप गंवावे न कि आप गिणावे
गुरसिख अपने आपको गिनवाना नहीं चाहता बल्कि अपने आपको गंवाता है |total surrender अर्थात अपने आपको कुछ न मानना |not me & mine but thee & thine (केवल तू और तेरा न कि मैं और मेरा |मैं कुछ नहीं हूँ और न मेरा कुछ है ,गुरसिख अथवा भक्त इसी भाव को अपनाकर समर्पित जीवन जीता है | उसका अपने आपको गंवा देना बहुत बड़ी प्राप्ति है |उसका अपने आपको मिटाना कायम करने का रूप है |जैसे कहते हैं कि जो प्रेम में डूबता है वही तर जाता है |डूबना और तर जाना ,ये दोनों बातें मेल नहीं खातीं |
डूबकर पार उतरने का रहस्य
सिर्फ परमार्थ में ये दोनों बातें संभव हुआ करती हैं |not me & mine जब वह अपने आपको गंवा देता है,प्रेम के सागर में डूब जाता है इसलिए उसका पार उतरना संभव हो जाता है |उसके जीवन में अस्तित्व बचता है तो सिर्फ परमात्मा को |वो अपने जीवन को अहंकार से बिलकुल खाली कर देता है और इस प्रकार प्रकार प्रभु का उसमें समा जाना संभव हुआ करता है |
-दिल्ली (18 /04 /2010 )बुराड़ी रोड,ग्राउंड न.8 ) प्रस्तुति-रामकुमार सेवक
