Mothers Day (मातृशक्ति दिवस )पर माँ को श्रद्धा समर्पण



 मेरी मां

देवेन्द्र कुमार 'देव'

(फरीदाबाद)

मां छोटा सा शब्द, अर्थ बहुरंग समेटे
मेरे मुहल्ले के सब बच्चे,
थे उसके बेटी और बेटे
मां मेरी कोई शब्द नहीं,
वो तो शब्दकोश थी पूरा
मां जीवन से चली गई,
तो शब्दकोश हो गया अधूरा
वो सचमुच में अद्भुत थी,
समझ अब मुझको आती है
बेशकीमती मेरी मां थी,
ना होने पर याद दिलाती है
आज़ गर्व मुझको उस मां पर,
जिसके हम बेटी और बेटे
मां छोटा सा शब्द, अर्थ बहुरंग समेटे
लम्बाई में थी कुछ छोटी,
पर कद बहुत बड़ा रखती थी,
पानी भरना जहां हो वर्जित,
फोड़ घड़ा आती थी
सोई आस जगाई उनमें,
जो सोये थे सालों साल
उस दर पर ना माथा टेका,
जो पूंछ सका ना उसका हाल
घर , बाहर चहुं ओर संभालें,
रिश्ते सभी निभाती थी
जो कुछ गया बनाया घर में,
बांट-बांट कर खाती थी
हर हालत का किया सामना,
सालों हम धरती पर लेटे
मां छोटा सा शब्द
अर्थ बहुरंग समेटे
मेरी मां जिया थी मेरी,
सबने उसको जिया बनाया
गली -मुहल्ले का हर बच्चा,
उसने अपने गले लगाया
उसका चूल्हा,सबका चूल्हा,
जो आ जाये भटका -भूला
एक बार जो घर आ जाये,
उसको जिया का प्यार न भूला
व्यवहार कुशल, ममता का सागर 
सुंदरता की मूरत दिखती थी
हम देहरी पार न जाने देते,
जब त्योहारों में सजती थी
अपनी पीड़ा, अपने तक रख
रही सभी दुःख दर्द समेटे
मां छोटा सा शब्द 
अर्थ बहुरंग समेटे
पिता हमारे का संग पाके,
वो फूली नहीं समाती थी
सब बच्चे थे उसे दुलारे,
ना छोड़ अकेला जाती थी
चूल्हे -चौके की सब बातें,
वो मुझे सिखाती रहती थी
रिश्ते -नाते की मर्यादा,
वो मुझे पढ़ाती रहती थी
बकरा-बकरी,भैंस सभी को
स्वयं संभाला करती थी
चरखी जैसी रहे घूमती,
ना किसी काम से ड़रती थी
लेकिन ऐसी नज़र लग गई,
वो जिया हमारी बैठ गई
वो ऐसी बैठी, फिर बैठ गई,
बैठे -बैठे निज-धाम गई
श्रद्धा -वत नमन सभी करते हैं,
जिया तुम्हारे बेटी -बेटे
मां छोटा सा शब्द
अर्थ बहुरंग समेटे
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अनमोल है माँ का प्यार...

-लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

हमें याद आता है अपना गाँव
माँ की ममता के आँचल की छाँव
जब हम सर्वत्र होते हैं निराश
जीवन की न रहती है आस
हमको मिलता है यहीं पर ठांव
बचपन से जहाँ बढ़ें हमारे पाँव...

जहाँ पर हम जन्म लिए
खेले-कूदे और पढ़े-लिखे
शहर की तरफ कदम बढ़े
शहर की आबोहवा लगते ही
अक्सर हम जाते हैं भूल
जहाँ शिक्षा ग्रहण किए वो प्राइमरी स्कूल
आधुनिकता का हम पर ऐसा छा जाता मकड़जाल
गाँव में रह रही माँ का न ले पाते हालचाल...

गाँव में वृद्ध अशक्त बापू को छोड़कर
शहर में हम चैन की बंसी बजाते हैं
जब हम पर कष्ट या मुसीबत पड़े
तो माँ व गाँव हमें याद आते हैं..
फिर हम दौड़े चले आते हैं..
तब याद आती है माँ की ममता व दुलार..
बाबा-दादी, काका, चाचा, ताऊ का प्यार
गाँव के खेतों और खलिहान में बहती ठंडी बयार
हम भूल जाते हैं कि
जननी व जन्मभूमि ही जीवन का
सबसे बड़ा होता है अनमोल उपहार
इनसे बढ़कर कोई न दे सका है
हमें निश्छल प्यार...
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ग्राम-कैतहा, पोस्ट-भवानीपुर
जिला-बस्ती 272124 (उ. प्र.)
मोबाइल 7355309428