प्रगतिशील साहित्य पाठक मंच के तत्वावधान में होली त्यौहार के उपलक्ष्य में हुए कवि सम्मेलन में प्रस्तुत की गयीं कुछ हास्य कवितायेँ यहाँ प्रस्तुत हैं - सम्पादक एक
- अशोक मेहरा (रामप्रस्थ, दिल्ली)
मैं अपने मोटापे से परेशान था ,
और इस सस्पेंस के सीन में मैं भी हैरान था ।
मेरा वजन वेइंग मशीन के कांटो से ऊपर चला गया था ।
मुझे लगता था कि मैं चलता फिरता पैटन टैंक हो गया था ।
बड़े करे यत्न मगर कोई तरकीब काम ना आई ।
जिस ने जो कहा उसमें ही देखने लगता था अपनी भलाई ।
किसी ने कहा चिकनी चीज मत खाओ ,
भला चिकनी चीज क्यों नहीं खाएंगे ?
चिकनाई होगी तो फिसलने का आनंद आएगा ,
जिसका केलोस्ट्रोल बढे उसको नहीं पसंद चिकनाई ।
सैकड़ों नुस्खे आज़माने के बाद ,
कोई जुगत काम नहीं आई l
अंततः आत्मघाती निर्णय लिया ,
और खुद को ऊंचाई से नीचे धकेलने का निश्चय किया ।
अब दिक्कत यह आई कि दिल्ली में बुर्ज खलीफा नहीं, और दिल्ली में एफिल टावर भी नहीं और दिल्ली में स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी भी नहीं ,
फिर भला कौन सी जगह मान लूं मैं ऊंचाई ।
मैंने तुरंत भूगोल की किताब उठाई ,
10-15 पन्नों को इधर-उधर टटोला ,
और अपने मन में ही बोला भाई जल्दी आजा ,
भाई जल्दी आजा ,
कौन सी तू मीनार है ,
मेरे जेब में जितनी भी इंडियन दिनार है ,
वह सब तेरे हवाले कर दूंगा ,
तुम मुझे मोटा मत कहना वरना तेरी ऐसी की तैसी कर दूंगा ।
चलो यह तो खयाली पुलाव था ,
जो मैं बिना मसाले के बना रहा था ।
लेकिन अपनी आत्मकथा मैं आज ही लिखने जा रहा था ,
तभी 4-5 नंबर पेज पर हमें दिखाई दी कुतुब मीनार ।
उसकी ऊंचाई के आंकड़ों से
छलांग लगाने का हमने कर लिया विचार ।
और किसी को बिना बताए , टूरिस्ट की घूमती टैक्सी की तरह पहुँच गया कुतुब मीनार ।
सबसे ऊपरी मंजिल के ऊपर जाने के बाद ,
नीचे देखा तो मन हिचकोले खाने लगा ,
साथ ही कलेजा ,
मुँह को आने लगा ।
नीचे चलते-फिरते लोग ,
चींटी जैसे लग रहे थे ,
बदन में सुरसुरी सी दौड़ गई ,।
हमारे विचारधारा के डायरेक्शन को ,
नीचे को मौड़ गई ,
फिर निश्चय किया की
कौन मोटे-मोटे की जिल्लत को झेलेगा ,
आज तो मौत और जिंदगी,
का ज्ञान ,
खुद के दिमाग में पेलेगा । बस आंख बंद करी
और भगवान का नाम लेकर ,
छलांग लगा दी ,
होंश आया तो हमारी आंखों के आगे से अंधेरा हटा ,
हमारा ध्यान अपने शरीर की तरफ बटा ,
हमने अपने शरीर को टटोलते हुए पाया कि सैकड़ों पट्टियां बंधी थी , ऊपर पंखा भी चल रहा था , हमने सोचा हज़ारों कोस पर यमराज को भी गर्मी लगती है ?
इनकीं गर्मी तो बादलों और आकाश गंगाओ से हट जाएगी ,
मगर हमारा क्या
हमारी तो आत्मकथा
की पुस्तक ही फट जाएगी हमने स्वयं से पूछ लिया क्या मैं जिंदा हूं ? अब हम स्वयं अपने आप को क्या जवाब देते ?
हमने बराबर से निकलती हुई नर्स को ताडा ,
फिर भी बड़े अदब के साथ ,
पूछा सिस्टर क्या मैं जिंदा हूं ? वह तुरंत पलट कर हमारे पास आई ,
और देने लगी दुहाई
के भैया तुम तो ऊपर से गिरकर भी तर गए ,
अब उन 5 लोगों का
क्या करें ,
जो आपके मोटापे के नीचे आकर दब मर गए ।
अस्वस्थता के कारण आज के कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सका,क्षमाप्रार्थी हूँ
दो- प्रकाश सूना (मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश)
होली आई, होली आई, बूढ़ों पर भी मस्ती छाई,
ऐसा रंग चढ़ा होली का, सबने मिलकर धूम मचाई।
कुछ के हाथों में पिचकारी, कुछ गुलाल के साथ खड़े हैं,
बच न पाये कोई सूखा, भैया हो या हो भौजाई।
होली का त्यौहार निराला, नौकर है ना कोई लाला,
सबकी अपनी अपनी मस्ती मिलकर पी ली भांग-ठंडाई।
देख रहे थे सारे गौरी, जिसकी भीगी अंगिया -चोली,
सोचो ! मन में कैसी-कैसी, सबके दिल ने ली अंगड़ाई।
होली आई, होली आई, बूढ़ों पर भी मस्ती छाई।
हास्य क्षणिका :
रेखा !
जबसे तुझे देखा
मैं
भूल गया सुलेखा !
हमें
गर्व है अपनी ईमानदारी पर
क्योंकि
निभाई है हमने
बेईमानी
सदा
ईमानदारी के साथ !
- श्रीमती वेद रहेजा (गुड़गांव)
बिखरे प्यार के जो रंग, *
*खेलें होली हम संग संग*
होली कौन अकेले खेले
ये तो हैं रंगो के मेले
भला अकेले से क्या मेला
रंगों का होता है रेला
नफ़रत कर देती बदरंग
बिखरे प्यार के जो रंग,
खेलें होली हम संग संग
प्यार नफ़ा देता जीवन को
प्यार वफ़ा देता है मन को
चहुँ और हम प्यार बिखेरें
घिरे रहें और सब को घेरें
प्यार की ऊँची उड़े पतंग …
बिखरे प्यार के जो रंग,
खेलें होली हम संग संग
रंग सुर्ख़ जितना जब होगा
प्यार सबल उतना तब होगा
जितना रूह को रंग चड़ेगा
उतना सकूँ हृदय को मिलेगा
रंगे रहें सोचें ये ढंग …
बिखरे प्यार के जो रंग,
खेलें होली हम संग संग
प्यार है पूजा प्यार इबादत
प्यार की डालें मन को आदत
जहाँ प्यार, ईश्वर का घर है
वरना कांटो का नगर है
जिस की गलियाँ होती तंग …
बिखरे प्यार के जो रंग,
खेलें होली हम संग संग
प्यार अमन का राहगीर है
प्यार है योद्धा महावीर है
जीत दिलों की प्यार से निश्चित
सुख शान्ति होती विकसित
प्यार बिना जीवन बेरंग
बिखरे प्यार के जो रंग,
खेलें होली हम संग संग
आओ ‘वेद’ यूँ खेलें होली
जिसमे हो बस हंसी ठिठोली
बुरा मनाना आता ना हो
दिल दुखाना भाता ना हो
छेड़ें ना ऐसा प्रसंग …
बिखरे प्यार के जो रंग,
खेलें होली हम संग संग