अध्यात्म - इस युग में तो इस प्रभु के दर्शन-दीदार-एहसास की महत्ता शेष तीनो युगों से ज्यादा है |

 -निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी 


परमात्मा से नाता जोड़ने की बात हमेशा कही गयी है लेकिन परमात्मा से नाता जोड़ने की बात बाहरी नहीं है बल्कि भीतर से नाता जोड़ने की बात कही गयी है |

बाहर से नाता तो इंसान जोड़ लेता है लेकिन मुख्य बात है-परमात्मा का बोध होना ,एहसास होना |मन को जब आठों पहर इसका एहसास होता है तो फिर यह इसके रंग में रंग जाता है |तो ही आत्मा का उद्धार होता है,जीवन का कल्याण होता है लेकिन-इंसान ने प्रायः यही माना,यही सोचा कि बाहरी रूप में कुछ क्रियाएं कर ली जाएँ |

कबीर दास जी इंसान की इस प्रवृत्ति के बारे में कहते हैं-लोक-पचारा करे दिन-रात 

राम को अयाना (नादान )मत समझो 

कबीरदास जी समझाते हैं कि-नाहीं राम अयाना अर्थात प्रभु अज्ञानी नहीं है कि जिसे बाहरी दिखावा करके बहला लिया जाए |

इंसान अक्सर सोचता है कुछ क्रियाएं,कुछ कर्मकांड कर लेने से प्रभु  की प्राप्ति हो जायेगी और राम का वास मन में भी हो जाएगा |इस प्रकार प्रभु हमसे खुश हो जाएगा |लेकिन महापुरुषों-गुरुओं-अवतारों ने सदा से यह सन्देश इंसान को दिया है कि-प्रभु जानने योग्य है |

गीता में भी यही सन्देश 

भगवान् कृष्ण ने गीता में यही सन्देश दिया है कि-प्रभु जानने योग्य है -Worthknowing

दुनिया में अनेकों किस्म के ज्ञान हम हासिल करते हैं लेकिन अन्य किसी भी ज्ञान के बारे में यह नहीं कहा गया कि यह जानने योग्य है  -Worthknowing - है |

प्रभु को जान लो और अपनी असली पहचान हासिल कर लो |वह पहचान जो जाति या धर्म आदि पर आधारित नहीं है |वो मजहबों वाली नहीं,काले-गोरे वाली नहीं ,पहनावों वाली नहीं ,संस्कृतियों वाली नहीं बल्कि अपनी आत्मा वाली पहचान |

इस प्रभु को जाने बिना यह वास्तविक पहचान होनी संभव नहीं |

चर्चा और बोध 

प्रभु की चर्चा तो खूब हो रही है |प्रभु का नाम-सुना और सुनाया भी जा रहा है लेकिन यदि चर्चा या सुनना -सुनाना ही काफी होता तो फिर बोध शब्द की भी जरूरत नहीं |फिर अनुभूति या बोध सिर्फ शब्द रह जाते हैं |इस त्रिकाल सत्य की Realisation (अनुभूति )-होनी बहुत जरूरी है |इसका बोध होना जरूरी है |महात्मा कहते हैं-

सुण वड्डा आखे सब कोय ,केवड वड्डा डीठा होय  

अर्थात अक्सर परमात्मा के बारे में कह दिया जाता है कि यह बहुत विशाल है लेकिन कितना विशाल है यह तो केवल देखने से ही पता चलता है |

परमात्मा को देखने का मर्म 

कबीर दास जी ने डीठा शब्द का प्रयोग किया है-डीठा कहते हैं देखने को |

कहते हैं-कहे कबीर मेरी संशय नासी सर्व निरंजन डीठा यानी इस निरंजन को जो सर्वत्र समायी हुई सत्ता है को जब देख लिया तो मेरे संशयों का नाश हो हो गया |

सब सशय-संदेह-भ्रम समाप्त हो गए |कहते हैं-मैंने निरंजन को देख लिया -ज्ञान की नज़रों से |

जब सत्गुरु की कृपा से ज्ञान नेत्र मिल गए तो फिर  बोध हो गया |

ज्ञान नेत्र 

जो कृष्ण भगवान ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए |ये कोई नेत्र ऑपरेशन करके नहीं लगा दिए बल्कि प्रभु के बारे में जो भी मिथ्या धारणाएं थी ,ज्ञान समझाकर ख़त्म कर दीं |श्री कृष्ण ने गीता में उन्हीं संशयों  और समाधानों का वर्णन गीता में विस्तार  से किया है  और अंत में जब अर्जुन को बोध हो गया तो वह समझ गया कि जन्म-मृत्यु प्रभु के हाथ में हैं इसलिए अनासक्त भाव से कर्म करना है |

उसे समझ में आ गया कि मोक्ष सिर्फ मानवीय कल्पना नहीं है बल्कि अटल सच्चाई है |

नज़र और नज़ारा 

ज्ञान की नज़र मिली तो इस सर्वव्यापक प्रभु की सर्वव्यापकता  का नज़ारा लेने लगी |बाबा अवतार सिंह जी महाराज ने कहा-

हर जर्रे विच सूरत तेरी ,हर पत्ते ते तेरा नाम ,

ऐधर औधर चार चुफेरे तेरी सूरत तकदा हाँ |

- कहते हैं कि-केवल एक दिशा में नहीं बल्कि चारों दिशाओं में तेरी सूरत देख पा रहा हूँ |इस प्रकार भक्तों को ऐसी दृष्टि प्राप्त होती है |इसे देखने ,इसे देखकर ,इसका एहसास करते हुए जीवन जीने की प्रेरणा हर युग में दी गयी है |सतयुग ,त्रेता,द्वापर या कलयुग ,हर युग में यह आवाज़ दी गयी है |

यदि कलयुग को सबसे नीचे दर्जे वाला युग समझा जाए,जैसे कि आम धारणा है तो इस युग में तो इस प्रभु के दर्शन-दीदार-एहसास की महत्ता शेष तीनो युगों से ज्यादा है |

धर्म के नाम पर 

धर्म के नाम पर भी इस युग में कठोरता और क्रूरता ही देखने को मिल रही है |यह और भी ज्यादा दुखद है क्यूंकि धर्म से तो हमेशा राहत की ही उम्मीद होती है |लेकिन वहां भी धर्म के-मजहब के नाम पर ज़ालिमाना हरकतें देखने को मिल रही हैं |जैसे दर्द ही नहीं हैं ,धड़कने ही नहीं हैं इस दृष्टि से क्रूरता देखने को मिल रही है,सर कलम कर दिया जाता है तो धर्म के नाम पर भी पीड़ाजनक दृश्य देखने को मिल रहे हैं |ऐसे दौर में जरूरी है कि इंसान अपने असली रूप को पहचाने और सत्य के ,प्रेम के मार्ग पर चले |  

जितना ज्यादा अंधकार है ,रोशनी की ज़रुरत उतनी ही ज्यादा |

मन में जितना ज्यादा अँधेरा है,कर्मो में रावण प्रव्रृति जितनी ज्यादा है उजाले की ,आँख खोलने की ंप्रभु के एहसास के साथ जीवन जीने की ज़रुरत उतनी ही ज्यादा है |

जितनी ज्यादा तपिश है,शीतलता की ज़रुरत उतनी ही ज्यादा है |जैसे जब सूखा पड़ता है तो बरसात की उतनी ही ज्यादा ज़रुरत महसूस होती है इसी प्रकार जिसे घोर कलयुग कहा जा रहा है,प्रभु के ज्ञान रूपी रोशनी की ,शीतलता की उतनी ही ज्यादा ज़रुरत है |

सूखा पड़ा हो तो थोड़ी सी वर्षा से पानी की सतह ऊंची नहीं होती इसी प्रकार प्रभु का एहसास हर समय और गहरा होना जरूरी है |जितना ज्यादा सूखा (Drought )हो उसी अनुपात में पानी की ज़रुरत होती है ,ब्रह्मानुभूति की ज़रुरत इसीलिए बहुत ज्यादा है |

इस युग में शैतानियत और दरिंदगी जितनी देखने को मिल रही है,सन्त-महात्मा चाहते हैं कि परमात्मा को चारों तरफ देखने वाली नज़र सबको और शीघ्र प्राप्त हो ताकि सत्य का,प्रेम का,शांति और ज्ञान का उजाला देखने को मिले |

सब एक ईश्वर की संतान हैं ,हर आत्मा का मूल परमात्मा है,सब इस सच्चाई को जाने | इसका एहसास हर किसी को हो ताकि आपस में प्रेम-शांति और भाईचारा हो और जीवन सुखद और सुन्दर हो | हर तरफ रोशनी रोशनी हो,प्रेम हो,करुणा हो ,मिलवर्तन हो,हित की भावना हो |