कबीरदास जी का एक बहुत खूबसूरत भजन है-जल में मीन पियासी ,मोहे सुन सुन आवत हांसी
मछली ने तो कभी किसी से नहीं कहा कि-मैं प्यासी हूँ लेकिन इंसान तो सदा प्यासा है |उसकी प्यास बुझती ही नहीं |
निरंकार में ही पैदा होता है,निरंकार में ही विचरण करता है और एक दिन उसकी यात्रा पूरी हो जाती लेकिन मन की इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं और वह प्यासा ही मर जाता है |
निरंकार में विचरण करते रहने के बावजूद निरंकार का उसे पता नहीं चलता और हालात ऐसे होते हैं-कबीर जी के ही शब्दों में-
कस्तूरी कुण्डल बसै मृग ढूंढें वन माहि ----
हिरन की तरह इंसान आत्मावलोकन नहीं करता और जंगल- जंगल भटकता रहता है |
कोई सत्ता के पीछे दीवाना है,कोई सुंदरियों के पीछे |कोई अपनी ताक़त के सहारे दुनिया को नाच नचाना चाहता है |24 सितम्बर को वर्षों पहले हुए बम धमाकों से कोई अपने नाम का सिक्का जमाना चाहता है |
कहने का भाव कि हर कोई अपने वर्चस्व को स्थापित करना चाहता है |सत्य तो यह है कि इन सबकी एक सीमा है |
कल शहीद दिवस था |शहीद दिवस महात्मा गाँधी के बलिदान दिवस के दिन वर्षों से मनाया जाता है |
शहीद दिवस के परिपेक्ष्य में महात्मा गाँधी की महानता के बावजूद उनसे अधिक लोकप्रिय अनेक नाम हैं लेकिन हम महात्मा गाँधी के साथ -उन सबको अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं अंततः हमें उसी तरफ लौटना पड़ेगा ,जहाँ से हमने बात शुरू की थी |
प्रश्न यह है कि मनुष्य प्यासा क्यों है ?
कॉर्पोरेट जगत का साम्राज्य पूरी दुनिया में फैला है |उद्योगपतियों ,माया का खेल खेलने वालों की अपनी दीवानगी है |
मैंने सुना है कि मुंबई के एक उद्योगपति के निवास स्थान की छत पर हवाई जहाज तक उतर सकता है |इसके साथ यह भी सत्य है कि भूख -प्यास आदि मूल ज़रूरतें उनकी भी वही हैं जो कि कबीरदास जी अथवा इस दुनिया के आम आदमी की हैं |
खिलाडियों की अपनी समस्याएं हैं और नेताओं की अपनी |खिलाडियों की अपनी विशेषता है और नेताओं की अपनी |पिछले दिनों विश्व स्तर के अनेक खिलाड़ी जंतर-मंतर (नयी दिल्ली )में नेताओं अथवा उनकी स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध धरना दे रहे थे |
बचपन से ही मैं यह देखता आया हूँ कि सत्ता भी रहती है और सत्ता के विरुद्ध असंतोष भी रहता है |
पूंजीवाद की अपनी समस्याएं हैं और समाजवाद की अपनी |
इन दोनों के बीच सत्ता का अपना स्वाद निर्विवाद है |
कभी आडवाणी जी को कनॉट प्लेस के भीतरी सर्किल से रथयात्रा निकालते और सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे ,के नारे लगवाते देखा है |
अयोध्या में मंदिर बन गया है लेकिन आडवाणी जी कहीं नहीं हैं |
माया के खेल ऐसे ही होते हैं |कुर्सी किसी की सगी नहीं होती | कल किसी और के पास थी ,आज किसी और के पास है |
राहुल गाँधी का भाषण कल मैं सुन रहा था जिसमें शिवजी का भी फलसफा था और भारत के अन्य सन्तों का भी |कर्नाटक के सन्त वसावा जी के साथ नरसी भगत का भजन -वैष्णव जन तो तेने कहिए पीड़ पराई जाने रे ,भी था |
एक पत्रकार का कहना था कि श्रीनगर का राहुल जी का भाषण एक सन्त का भाषण लग रहा था |
वर्तमान सत्ता की अपनी शक्ति है और राहुल जी के अपने सपने हैं|मोदी जी की अपनी प्यास है और राहुल जी की अपनी लेकिन प्यास दोनों का सत्य है |
मेरी उम्र साठ वर्ष की होने जा रही है |सुषमा स्वराज जी और जॉर्ज फर्नांडीस स्वाहाब के शानदार भाषण सुने हैं है लेकिन किसका अन्त कैसा रहा हम जानते हैं |
फिर कबीर याद आते हैं जिन्होंने फक्कड़ता के साथ सत्य कहा-
जोगी दुखिया ,जंगम दुखिया ,तपसी को दुःख दूना हो
आशा -तृष्णा सबको व्यापे कोई महल ना सूना हो
अवधू दुखिया,भूपति दुखिया . रंक दुखी विपरीति हो
कहे कबीर सकल जग दुखिया सन्त सुखी मन जीति हो |
इस प्रसंग के साथ निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी मन को जीतने की बात कहा करते थे |किसी भी दौड़ का अन्त यही रहेगा |मन जीते जग जीत -इस प्रकार सन्त ही सुखी है क्यूंकि वह इच्छाओं से मुक्त है |
- रामकुमार 'सेवक'
