रामकुमार सेवक
कबीर कहते हैं -
कबीरा यहु घर प्रेम का खाला का घर नाहींसीस उतारे भुई धरे सो पैठे घर माही
कबीर जिस घर की बात कर रहे हैं ,वह है तो प्रेम का लेकिन कौन सा प्रेम है यह सोचना पड़ेगा चूंकि यह जो महीना चल रहा है ,वसंत का महीना है |वसंत कोई आज का सच नहीं है बल्कि वैलेंटाइन से बहुत पहले का सच है |
दिल्ली बसने पर मुझे ज्ञात हुआ कि वैलेंटाइन एक सन्त थे |
सन्त और युवक -युवतियों का प्रेम दिवस ?सन्त और प्रेमियों का आदर्श ,यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था |खोजने पर ज्ञात हुआ कि रोम का सम्राट क्लॉडियस इस विचार का था कि विवाह से युवकों की बुद्धि और ताक़त कम हो जाती है |
सत्ता को आज्ञाकारी सैनिक चाहिए थे इसलिए वह चाहती थी कि युवक विवाह अथवा प्रेम की बजाय सत्ता के प्रति पूर्ण समर्पित हों और युद्ध के बारे में सोचें |
बाइबिल कहती है -प्रेम ईश्वर है और ईश्वर प्रेम है |हिंदी के महान कवि गोपालदास जी नीरज ने इस बात को काव्य में ढालते हुए कहा -
कोई कहता है मुहब्बत खुदा है ,कोई कहता है मुहब्बत सजा है,
अगर मुझसे पूछो तो मैं यह कहूंगा -खुदा मुहब्बत है ,मुहब्बत खुदा है |
खुदा को अगर मुहब्बत माना जाये तो यह सवाल पैदा होता है कि खुदा ही मुहब्बत है तो इसे सजा क्यों माना जाता है |मुझे हिंदी फिल्म हँसते ज़ख्म का यह गीत याद आता है ,जिसमें कैफ़ी आज़मी साहब लिखते हैं -
यह माना मेरी जां,मुहब्बत सजा है ,
मज़ा इसमें लेकिन मगर किसलिए है |
मुहब्बत में मज़ा तो वास्तव में है अन्यथा कोई इंसान स्त्री के पीछे दीवाना न होता |यहाँ प्रेम का सम्बन्ध शरीर से जुड़ जाता है |
यह कोई पाप नहीं है |मेरा ध्यान सीधा धर्म की ओर जाता है |हिन्दू धर्म में शिवजी की पत्नी सती और अन्य जन्म में पार्वती अथवा रमा |शिवजी को रमापति और राम जी को सीतापति कहा जाता है |इस प्रकार इन देवताओं का भी प्रेम से सम्बन्ध है |इस प्रकार प्रेम मर्यादित हुआ और परिवारों का आधार बना |
अल्बर्ट आइंस्टीन का एक कथन मैंने हाल ही में पढ़ा,कथन प्रेम के सम्बन्ध में था और मुझे आश्चर्यचकित करता था कि वैज्ञानिक भी प्रेमी हो सकते हैं अथवा प्रेम का महत्व बतला सकते हैं |वे कहते हैं कि प्रेम बेहतर स्वामी है ,कर्तव्य की अपेक्षा(love is better master than duty )
कुछ चीजें उस तरह नहीं दिखाई देतीं ,जैसे हम आँख या कान को देखते हैं | प्यार या नफरत बाहर से दिखाई नहीं देतीं,यह तो भीतर की अनुभूति है |प्यार नुमाइश की चीज़ नहीं है |
एक विचारक ने कहा है कि-मुहब्बत लिबास नहीं है जिसे बदला जाये बल्कि यह तो जीवन का मूल तत्व है जो हमारी संवेदनशीलता में सदैव जीवित रहता है |
किसी शायर ने लिखा -चांदनी चाँद से होती है सितारों से नहीं ,मुहब्बत एक से होती है हज़ारों से नहीं |एक लेखिका ने अपना अनुभव यूँ लिखा -
में प्रेम को दुनिया की सबसे बढ़ी दौलत समझती हूँ | लेकिन इसे बचाकर रखना हर किसी के वश की बात नहीं है, क्योंकि किसी भी दौलत या ख़ज़ाने को रखने के लिए इतने खतरे नहीं होते, जितने प्रेम के लिए होते है |इसकी वजह है कि हम प्रेम में सेक्स को मिला देते हैं, तो प्रेम का रूप बदलने लगता है | वह मन से तन तक आने लगता है, इसलिए खतरे भी बढ़ने लगते हैं| दरअसल आजकल सेक्स को ही प्रेम समझा जाने लगा हैं | यह बात मेरा मन मानने को तैयार नहीं क्योंकि प्रेम और सेक्स अलग-अलग होते हैं | सेक्स का बाजार हो सकता हैं, प्रेम का नहीं |प्रेम और सेक्स की मिली-जुली अभिव्यक्ति पर खतरे मंडराने लगते हैं तो हम राधा और मीरा के प्रेम की दुहाई देने लगते हैं, लेकिन वह क्या प्रेम की अभिव्यक्ति वही हैं, जो इन दिनों हम देख रहे हैं?
इन दिनों रास्तों पर, बाज़ारो में, सार्वजनिक स्थानो पर हम लड़के - लड़कियों को बेपर्द होते देखते हैं | यह मन की स्वतंत्रता का सवाल हैं, लेकिन यह प्रेम हैं या प्रदर्शन हैं, इस सवाल पर ही सवाल उठता है ?
कहते हैं कि प्रेम की तीव्रता वियोग में सबसे ज़्यादा होती है |
लेकिन क्या हम अपने प्रेम को ,जो निजी होता हैं ,को इतना सार्वजनिक करके या शरीर के धरातल पर उतारकर सेक्स की ही हिमायत नहीं करते ?
आजकल कहा जाता है कि आधुनिक या मॉडर्न प्रेम यही है |
फिर जो बिछोह मैं प्रेम को जीते रहे, क्या उनका प्रेम. प्रेम नहीं है? मन के प्रेम में स्पर्श का भी महत्व है, जिससे ज़्यादा अंतरंगता महसूस होती है, लेकिन उसको नुमाइश बनाने से मर्यादाहीनता तो साकार होती ही है ,प्रेम की गरिमा भी धूमिल हो जाती है |
किसी युवती ने लिखा कि- मुझे चौदह-पंद्रह साल की उम्र में एक प्रेम पत्र मिला था | वह पत्र कविता रूप में था | मुझसे एक -दो साल सीनियर लड़के का |
मैंने उस प्रेम-पत्र को प्रेम किया और उस लिखनेवाले को भी किया | मैंने उस प्रेम कविता से इतना प्यार किया कि खुद एक लेखिका बन गई | वह प्रेम पत्र मेरे पास आज भी सुरक्षित है और जिसने उसे लिखा था , उससे मेरा आज भी संपर्क है | इस बात को पचास से ज़्यादा साल बीत चुके हैं |
क्या हमने उस प्रेम को दुनिया को दिखाया?
मेरा मानना है कि प्रेम तो निजी होता है,बहुत व्यक्तिगत | बहुत प्यारी सी भावना होती है | उसकी नुमाइश करने की ज़रूरत नहीं होती है | इससे वह हल्का पड़ जाता है |
मैं कई बार सोचती हूँ कि इस तरह के प्रदर्शन मुझे कई बार दिखाई देते हैं | मुझे उनमे प्रेम कहीं नज़र नहींआता | यह कुछ समय के लिए अपनी यौनिक इच्छा को संतुष्ट करना भर है | इसे सिर्फ फैशन में शुमार किया जा सकता है, लेकिन यह प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं है |
मुझे लगता है कि इस लेखिका की अभिव्यक्ति में ईमानदारी का तत्व सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है,उसने अपनी भावनाएं व्यक्त करने में ज़रा भी कोताही नहीं की | जबकि आज के युवाओं में यह दुर्लभ है क्यूंकि एक कवि कहते हैं कि हम तो खत में कलेजा निकालकर रख देते थे जबकि आज के ये लैला -मजनू एक meesage मोबाइल पर टाइप करते हैं और एक click में उसे सबको forward कर देते हैं |प्रेम में ईमानदारी होनी ही चाहिए तभी वह स्थायी हो सकता है |मैंने पत्नी में ही प्रेमिका को भी खोजा और मेरी सन्तानो के दोस्त पूछते हैं अंकल-आंटी ने लव मैरिज की है क्या ?
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