निरंकारी सन्त समागम की पहली स्मृति

अध्यात्म में मेरी यात्रा के पचास वर्ष 

- रामकुमार 'सेवक '

विगत 19 नवम्बर को जब 75 वे सन्त समागम में कार्यक्रम मंच पर जब मैं माइक के पीछे खड़ा था तो मुझे छब्बीसवें वार्षिक निरंकारी सन्त समागम के वो दिन याद आ गए,जब मैं छठवीं कक्षा में पढता था और अपने पिताजी (श्री चिरंजी लाल जी )की उंगली पकड़कर मैं रामलीला मैदान (दिल्ली )में आया था |

उन दिनों निरंकारी मिशन की बागडोर बाबा गुरबचन सिंह जी संभाल रहे थे |

सन्त समागम की मेरी कल्पना उतने विशाल रूप में नहीं थी |समागम 13  से 15 अक्टूबर तक था |

मुरादनगर में निरंकारी मिशन नया-नया स्थापित हुआ था |


डॉ.शक्ति सिंह जी के प्रयासों से मेरे परिवार के लोग मिशन में दीक्षित हुए थे |उसके कुछ वर्ष बाद सन्त निरंकारी सेवादल में सम्मिलित हुआ |

1978 में अमृतसर में जब निरंकारी मिशन के मानव एकता सम्मेलन पर सशस्त्र आक्रमण हुआ तब मैं दसवीं कक्षा में पढता था |

अमृतसर पंजाब में है और मुरादनगर उत्तर प्रदेश में लेकिन मानव एकता सम्मेलन के आयोजन ने दोनों के बीच एक अदृश्य पुल निर्मित कर दिया |

सन्त निरंकारी पत्रिका भी तभी पढ़नी शुरू की थी |उसमें विदेशों में चल रही निरंकारी मिशन की गतिविधियों के बारे में भी छापता था तो मेरे बचपन की दृष्टि फैलनी शुरू हुई |

फरवरी 1986 में सन्त निरंकारी (हिंदी )के सहसंपादक के रूप में दिल्ली स्थित सन्त निरंकारी मंडल के मुख्यालय में सेवा देने का अवसर मिला जो कि अगस्त 2011 तक निरंतर जारी रहा |

27 अप्रैल 1980 से निरंकारी मिशन का नेतृत्व बाबा हरदेव सिंह ने संभाला |सही अर्थों में अध्यात्म का अर्थ उन्होंने ही समझाया |

19  नवम्बर 2022  को 26  वे समागम का दृश्य सहज ही स्मृति में उपस्थित हो गया ,उसे मैंने एक ही वाक्य में समेटकर साध संगत के अपने लाखों भाई -बहनो के समक्ष प्रस्तुत कर दिया कि 26 वे समागम से ७५ वे समागम तक पचास वर्षों की अर्धशती पूरी हुई है |

मंच संचालन कर रहे लोकप्रिय शायर रोशन जी ने मिशन में जन्म के पचास वर्ष की मुबारक बाद देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मुझे सचेत किया कि अपनी कविता तुरंत शुरू करनी है,और मैंने अपनी कविता तुरंत प्रस्तुत कर दी |प्रस्तुत है,इंसानियत और रूहानियत के समन्वय पर केंद्रित वह कविता -

आओ भाई, 

दिखाएँ तुम्हें, खुदा की खुदाई 

समुद्र की गहराई और अम्बर की ऊँचाई 

दोनों को खुदा ने ही तो बनाया है 

इस के अलावा इंसानियत और रूहानियत भी तो खुदा के ही किरदार हैं 

और कहना चाहिए कि-चमत्कार हैं 

चूंकि इंसानियत तो लग रहा है,

लुप्त हो चुकी है वर्षों पहले 

चूंकि आज के दौर में हिन्दू हैं,सिख हैं 

जाट,ब्राह्मण और मुस्लमान हैं 

कोई भूल से भी नहीं कहता कि हम इंसान हैं 

सुबह सैर करने जा रहा था 

तो सामने से आ रहा था -स्कूटर 

जिसे एक आदमी चला रहा था 

उसके पीछे ,नम्बरप्लेट के ऊपर लिखा था -ब्राह्मण 

पढ़कर -मैं चौंका,फिर सोचा कि  

ब्राह्मण हो या क्षत्री 

वैश्य हो या शूद्र -हमें किसी से कोई समस्या नहीं 

लेकिन इंसान जब मन से छोटा हो जाता है 

तो घर के पांच प्राणी भी खलने लगते हैं 

बात -बात पर अहंकारपूर्ण संवाद उछलने लगते हैं 

कभी कभी तो छोटी -छोटी बातों पर बड़े-बड़े मुक़दमे भी चलने लगते हैं 

जबकि यह आज की बात नहीं है 

जब वसुधा को ही  कुटुंब  मान लिया गया था 

वास्तव में आदमी ही आदमी को बोझ लगने लगता है 

जब अहंकार हमें छलने लगता है,ठगने लगता है 

तो इंसानियत लानी भी आसान नहीं है 

और रूहानियत -

रूहानियत के भाषण करने तो आसान हैं 

लेकिन रूहानियत से पहले ,इंसान होना जरूरी है,

यह एक नैतिक मजबूरी है 

क्यूंकि इंसानियत ही तो बुनियाद है इंसान होने की 

जाति,धर्म,मज़हब,की पहचान खोने की 

भगवान की संतान और खुदा का चाहवान होने की 

इंसान में इंसान देखने से भी पहले 

जब हम सूक्ष्म आत्मा को 

गुरु की दी हुई दिव्य दृष्टि से देख पाएंगे तो 

सब कुछ होने से पहले इंसान हो जायेंगे | 

और- रूह के धरातल पर खड़े होकर 

निज के अहंकार को जान जायेंगे ,उसे मात करने का हुनर पहचान पाएंगे 

उसे निरंकार में विसर्जित कर 

जब गुरु को समर्पित हो पाएंगे 

एकत्व के भाव को मन में बसायेंगे -

ब्रह्मलीन होने का वक़्त आने से पहले ही 

ब्रह्मलीन 

सिद्ध हो पाएंगे | 

और शान से कह सकेंगे -

इंसान और इंसान के ,ना बीच में दीवार हो |

बीच में कुछ हो तो केवल तत्व ,मन का  प्यार हो |

प्यार गर हो बीच में तो खुशनुमा संसार है |

खुशनुमा संसार का आधार बस किरदार है |

किरदार में इंसानियत का तत्व गर ज़िंदा रहे,

आदमी के रूप में फिर देवता साकार है |

स्थूल इस संसार में,इक दूसरे से प्यार हो 

रूहानियत इंसानियत ,संग संग तेरा आधार हो 

धन निरंकार जी -