निरंकारी सत्गुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी को गाँधी ग्लोबल फॅमिली द्वारा विश्व शांतिदूत सम्मान
- आर. के. प्रिय
धर्म को परिभाषित करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-दया धर्म का मूल है,पाप मूल अभिमान
तुलसी दया न छोड़िये जब लग घट में प्रान
स्पष्ट है कि धर्म दया का नाम है |जहाँ दया होती है,वैर की गुंजाईश नहीं होती |सन्त निरंकारी मिशन इसी दया को व्यवहार का अंग बनाने की ओर प्रेरित करता है |
निरंकारी मंगलाचरण 1981 -82 में निर्धारित की गयी थी जिसमें स्पष्ट कहा गया है-
घट घट वासी हे प्रभु अविनाशी अवतार
दया से तेरी हों सभी भव सागर से पार
स्पष्ट है -एक परमेश्वर निराकार घट घट में बस रहा है और इसकी दया से सबका पार उतारा हो सकता है |इस प्रकार निरंकारी मिशन का केंद्रबिंदु सबके प्रति दयावान होना है |
प्लैटिनम जुबली समागम के इस अवसर पर मानव मात्र को करुणा,दया व प्रेम की ओर ही प्रेरित किया जा रहा है |
धर्म उदारता का नाम है,दया का नाम है ,इसमें न संकीर्णता की गुंजाइश है न कट्टरता की लेकिन धर्म के नाम पर जितने लोग मारे जाते हैं उतने लोग युद्धों में भी नहीं मारे जाते |शायद ऐसे ही नकारात्मक परिणाम देखकर साम्यवाद के मसीहा कार्ल मार्क्स को कहना पड़ा कि धर्म एक अफीम है जिसका इस्तेमाल करके लोगों का ध्यान मूल समस्याओं से भटकाकर उन्हें एक प्रकार के नशे में सुला दिया जाता है |
सोचने की बात यह है कि क्या धर्म वाकई अफीम की तरह लोगों को मदहोश कर देता है ?
व्यक्तिगत रूप से मैं ऐसा नहीं मानता क्यूंकि सन्तों -महात्माओं,गुरु-पीर-पैगम्बरों ने धर्म की जो परिभाषाएं दी हैं उनमें धर्म को सार्थक रूप में प्रस्तुत किया गया है लेकिन राजनीति और राजनीतिज्ञों की संगति जब से धर्म को मिली है धर्म में स्वार्थसिद्धि की घुसपैठ हो गयी अन्यथा निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी (1954 -2016 )कहा करते थे कि धर्म वह प्रक्रिया है,जिससे मनुष्य.मनुष्य ,बनता है |निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी (1929 -1980 )ने अस्सी के दशक में ही कहा था कि-धर्म का काम जोड़ना है,तोडना नहीं |1974 के आस -पास इस शीर्षक पर वार्षिक सन्त समागम में बहुभाषी कवि दरबार भी हुआ था कि-
प्यार हमारा धर्म है,इंसानियत ईमान है |
इस प्रकार निरंकारी मिशन धर्म को जोड़ने वाले तत्व के रूप में स्वीकार करता है |
1986में निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी ने धर्म का व्यवहारिक रूप रक्तदान अभियान की श्रृंखला के रूप में भी प्रस्तुत किया |
उन्होंने कहा -खून नालियों में नहीं नाड़ियों में बहना चाहिए |
इस प्रकार यह साबित हो गया कि निरंकारी मिशन धर्म को जोड़ने वाले तत्व के रूप में मान्यता देता है |मिशन का 75 वां सन्त समागम भी इन्हीं सिद्धांतों के प्रस्तुतीकरण की शानदार कोशिश है |यह समागम 16नवंबर 2022 से शुरू हुआ और 22 नवंबर तक चलेगा |
इस समागम का बहुभाषी कवि दरबार 19 नवम्बर को शाम 4 बजे के आस पास शुरू हुआ | इस कवि सम्मेलन में पंजाबी,हिंदी,अंग्रेजी ,मराठी ,उर्दू ,पंजाबी,मुल्तानी और हरियाणवी के लगभग बाइस कवियों ने अपनी कवितायेँ पढ़ीं |
कवि सम्मेलन का संचालन उर्दू के लोकप्रिय कवि-गीतकार श्री रोशन देहलवी ने किया |मुल्तानी कवि सुभाष भाषी प्रायः हास्य कवितायेँ प्रस्तुत करते हैं,यह भी एक बड़ा कारण है कि श्रोता उन्हें प्यार करते हैं |संगतों में वे खूब लोकप्रिय हैं|पहली कविता अमृतसर के श्री राजकुमार राज़ जी ने पढ़ी और अंतिम कविता उस्ताद शायर बचित्तर सिंह जी पारस ने पढ़ी |बीच में उतार-चढ़ावों के कई दौर आये |
लोक कवि सभा के प्रधान श्री सुरजीत सिंह जी नशीला और सचिव श्री सुलेख साथी जी ने युवा कवियों को सुन्दर कलाम लिखने की प्रेरणा अपनी शानदार कविताओं से दी |युवा कवि विवेक रफ़ीक़ तथा लुधियाना के श्री राजेंद्र राजन ने भी अपनी विशेष पुरानी परंपरा को जीवित रखा |
इंसानियत और रूहानियत संग -संग शीर्षक पर कविताओं में इंसानियत और रूहानियत के समन्वय पर बल दिया गया |सत्गुरु को साकार परमारमा मानना मिशन की लोकप्रिय अवधारणा हो चुकी है ,जबकि मिशन निराकार की सर्वोच्चता पर प्रतिष्ठित है |
मुझे समागम के कवि सम्मेलनों में बाबा हरदेव सिंह जी के पावन सान्निध्य में हुए 1988 के कवि सम्मेलन में पहली बार कविता पढ़ने का सौभाग्य मिला था |
इसे सौभाग्य मानने का पहला कारण तो यह है कि बाबा हरदेव सिंह जी निरंकारी मिशन के रूप में ऐसे अभियान का संचालन कर रहे थे ,जो मानवता को ही धर्म मानता है |जिसका दृष्टिकोण अनेकता में एकता की खूबसूरती को ही महसूस करना है न कि अनेकता के नाम पर वैर करना |
इस समागम में भी विश्व के विभिन्न देशों से आये अध्यात्म प्रेमियों की संस्कृतियां इस समन्वय का सुन्दर नज़ारा प्रस्तुत कर रही थीं |
यद्यपि आज के दौर में कट्टरता ही सर्वत्र देखी जा रही है लेकिन मिशन के सत्संग-समागम आज भी प्रेम व मिलवर्तन तथा अनेकता में एकता के दृश्य साकार करते है |आज धर्म को समाज और जातियों में विभाजित करके देखा जा रहा है लेकिन निरंकारी मिशन की प्रतिनिधि पुस्तक सम्पूर्ण अवतार बाणी में बाबा अवतार सिंह जी स्पष्ट कहते हैं-
कहे अवतार यह दूजा प्रण है,वर्ण-जात नहीं मैंने मनणी तूं |
मज़े की बात यह है कि कोई भी धर्म इंसान को ख़त्म कर देने के पक्ष में नहीं है क्यूंकि सैद्धांतिक स्तर पर धर्म कहता है-
मज़हब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना
फिर भी मज़हब के नाम पर ही देश का विभाजन हुआ |इस विभाजन की प्रवृत्ति को रोकने के लिए ही मानवता और प्रेम का फैलाव आवश्यक है |स्वामी विवेकानद जैसे प्रगतिशील विचारकों को पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है कि-धर्म जागने की प्रक्रिया है कि इंसान मानवता के प्रति जाग जाए |इंसान की सेवा को ही परमात्मा की सेवा मान ले लेकिन मामला यदि इतना ही आसान होता तो कार्ल मार्क्स को धर्म की तुलना अफीम से करने की ज़रुरत नहीं पड़ती |
हमारा इतिहास बताता है कि भारत में धर्म बहुत ही संवेदनशील तत्व है |धर्म के नाम पर लोग अपने निज विवेक का इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं | धर्म को लोक-परलोक से जोड़कर देखा जाता है इसलिए इंसान प्रायः धर्म के विषय में बहुत भयभीत है और कोई खतरा लेना नहीं चाहता | जबकि धर्म ज़ख्म देने का नाम नहीं बल्कि ज़ख्म पर मरहम लगाने का नाम है |
सच्चाई यह है कि धार्मिक इंसान को सदा विवेकी और उदार होना चाहिए |कट्टर होना किसी भी धर्म के लिए खतरनाक ही नहीं बल्कि आत्मघाती है |कट्टरता धर्म में विष का काम करती है |यह इंसान को कूपमंडूक और संकीर्ण बना देती है |
मिशन की वर्तमान सत्गुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी के सब प्रवचन भक्ति के तत्व पर ही आधारित हैं जो कि रूहानियत का आधार पर प्रतिष्ठित है |समागम में आये भक्त अपने सहज व्यवहार से भक्ति को सहज स्वीकार्य बना रहे हैं व्यजतिगत व्यवहार से भक्ति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं |

