मेरा ख्याल था कि न्याय नहीं मिल पाया क्यूंकि निर्भया उस पुरानी स्थिति में नहीं लौट सकी जिस स्थिति में वह इस अपराध की शिकार होने से पहले थी | वह मेडिकल की शिक्षा नहीं पा सकी, जिसके लिए दिल्ली के एक मेडिकल कॉलेज में आयी थी |उसे अपराधियों ने जीवित ही नहीं रहने दिया कि मेडिकल की पढाई करके अपना कैरियर बनाती |
वारदात के बाद यदि वह बची होती तो न्याय के अधूरेपन को महसूस कर पाती |
न्यायपालिका के विधान में मृत्युदंड से बढ़कर कोई सजा नहीं होती लेकिन उसके साथ जो हैवानियत हुई और उसके माता-पिता को अपराधियों के वकील द्वारा जिस प्रकार के नुक्ते लगाकर मृत्युदंड की सजा को बार-बार टलवाया गया और इस प्रकार उन्हें बार बार प्रताड़ित किया गया क्या, उस प्रताड़ना की सजा भी साथ ही मिल गयी?
और भी अनेक प्रश्न थे जो न्याय के परिपेक्ष्य में उठाये गए थे,आज उनका कोई औचित्य नहीं क्यूंकि एक और बड़ा मामला सामने है |
निर्भया मामले से भी पहले अर्थात 9 फरवरी 2012की बात है जिसमें 19 वर्ष की एक युवती से बलात्कार और हत्या का लोमहर्षक और बेहद दर्दनाक कांड दिल्ली में हुआ था |
वह कांड इतना भयानक था कि उस युवती की आँखों में तेज़ाब डाल दिया गया था |गुप्तांगों के साथ भी भयानक अनाचार किया गया था (इसके विस्तार में जाने की मेरी हिम्मत नहीं होती लेकिन एक संवेदनशील इंसान होने के नाते उसकी भयंकर पीड़ा को मैं सिर्फ महसूस कर सकता हूँ |
कल जब सरबत का भला चाहने वाले श्री गुरुनानक देव जी के प्रकाश उत्सव की ख़ुशी हम सब मना रहे थे,उसी अख़बार में पिछले पृष्ठ पर दोषियों को बरी करने की ,माननीय उच्चतम न्यायालय की खबर मेरा मुँह चिढ़ा रही थी कि चाहे जितने जयघोष कर लो आदमी के सुधरने की कोई संभावना नहीं है |
उसके मजबूर माता-पिता का दर्द उनके शब्दों का सीना फाड़कर मेरी आत्मा को झकझोर रहा था क्यूंकि हम सबके घरों में बेटियाँ हैं और हम उन्हें खुश देखना चाहते हैं |
कल जब छावला कांड के आरोपियों की रिहाई का समाचार आया तो बेटियों की सुरक्षा पर अतीत की काली छाया और भी गहरी हो गयी |
इस केस में निचली अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी।उच्चतम न्यायलय के इस फैसले के बाद पीड़िता की मां बोलीं- 11 साल बाद ये फैसला आया और मैं हार गईं। अब तक मैं न्याय के इंतजार में जी रही थी… अब जीने की इच्छा ही खत्म हो गई है।
इस केस को कमजोर करने में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर बहुत सारे प्रश्न चिन्ह लगे हैं |
पुलिस इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है जबकि उनकी भी बेटियां हैं और अपराधी. पुलिस तो क्या गृहमंत्री का भी लिहाज़ नहीं करते ,मुफ्ती मुहम्मद सईद उस समय केंद्र सरकार में गृहमंत्री ही तो थे जब आतंकवादियों ने उनकी डॉक्टर बेटी का अपहरण किया था |
प्रश्न चिन्ह फिर न्यायिक व्यवस्था पर लगता है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री महोदय ने पीड़िता के माता-पिता को आश्वासन तो दिया है लेकिन उनके आश्वासनों पर क्या उस बेटी के लाचार माता-पिता यकीन कर पाएंगे ?दिल्ली के महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने भी लेकिन न्याय की कोई आशा नहीं दिखती |
सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर तो सिर्फ एक ही न्यायालय है जिसके बारे में सब कहते हैं कि परमेश्वर ही सच्चा न्यायकारी है |
बुद्धिमान कहते अथवा भक्त पुरुषों का कहना है कि परमेश्वर की चक्की चलती हुई नहीं दिखती लेकिन पीसती बहुत बारीक है अर्थात परमेश्वर की आँखों से कोई नहीं बच सकता | न्यायालय के अधिकार में अधिकतम सजा मृत्युदंड है और वह भी गुनहगारों कहाँ मिल पाता है,जैसा कि अनामिका (पीड़िता का बदला हुआ नाम) के केस में हुआ |
अपराधियों को तो संदेह का लाभ मिल गया लेकिन पीड़िता और उसके परिवार को न्याय का लाभ क्यों नहीं मिल पाता |
परमेश्वर के न्याय को किसी ने स्पष्ट नहीं देखा लेकिन पीड़िता के माता-पिता को जीवित रहने के लिए आशा की एक किरण तो चाहिए ही |उस बेटी के माता-पिता का दर्द देखकर ,वो गीत याद आता है जिसमें नायक शिवजी की मूर्ति के सामने अपनी पीड़ा प्रकट करता है और आक्रोश से पूछता है-ै
आग बनी सावन की वर्षा फूल बने अंगारे
नागन बन गई रात सुहानी पत्थर बन गए तारे
सब टूट चुके हैं सहारे ओ जीवन अपना वापस ले ले
जीवन देने वाले
ओ दुनिया के रखवाले,ओ दुनिया के रखवाले,सुन दर्द भरे मेरे नाले... एक लाचार लेखक और क्या कहे ?
- आर. के. 'प्रिय'

