75 वां निरंकारी सन्त समागम - कुछ विचारणीय तथ्य


वर्ष 2016 के बाद निरंकारी मिशन में बड़े परिवर्तन हुए |बाबा हरदेव सिंह जी के देहत्याग के बाद उनकी पत्नी सविंदर हरदेव जी ने मिशन की बागडोर संभाली लेकिन उनका कार्यकाल कम रहा |उन्होंने मिशन के नेतृत्व का दायित्व अपनी सुपुत्री सुदीक्षा जी को सौंपा |

उन्होंने सुदीक्षा सविंदर हरदेव के नाम से मिशन का नेतृत्व संभाला जिसे मिशन के अधिकांश श्रद्धालुओं ने सहज भाव से स्वीकार किया |

सत्गुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी के नेतृत्व में आज 16 नवंबर 2022 से निरंकारी मिशन का 75

वां,प्लैटिनम जुबली सन्त समागम शुरू हो रहा है |

निरंकारी शब्द स्वतः इस तथ्य को प्रकट करता है कि निरंकारी अनुयाई निराकार के उपासक हैं और हर प्रचलित धर्म का सम्मान करते हैं |

र्ष 2016 में वार्षिक सन्त समागम से पूर्व सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के सत्संग हॉल में मुझे विचार प्रकट करने का अवसर मिला था |उसमें मैंने निरंकारी सिद्धांतों के प्रति अपनी आस्था के अनुसार ,सन्त समागम के अर्थ का विश्लेषण करने का प्रयास किया था |

 कुछ प्रश्न चिन्ह लगाए थे अर्थात कुछ जायज़ प्रश्नो के हल खोजने का प्रयास किया था |संक्षेप में वे इस प्रकार हैं -

निरंकारी-निरंकारी होने की परिभाषा क्या है ?

सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी ने गुरुदेव हरदेव (भाग-1)में इसे परिभाषित करते हुए कहा है -

जिस प्रकार जापान में रहने वाला जापानी कहलाता है |हिंदुस्तान में रहने वाला हिंदुस्तानी कहलाता है इसी प्रकार निरंकार में रहने वाला निरंकारी कहलाता है |

इसे और स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने कहा-कि जिस प्रकार हिंदुस्तान में रहने वाले को हिंदुस्तान का ज्ञान  होता है  और हिंदुस्तान के प्रति आस्था भी होती है उसी प्रकार निरंकारी को निरंकार का ज्ञान भी होता है और निरंकार के प्रति आस्था भी होती है,विश्वास भी होता है |

जो सत्संग में अथवा समागमों में जाते हैं ,पहली दृष्टि में उन्हें देखकर यही लगता है कि इनमें आस्था तो है अर्थात हम सभी निरंकार के प्रति आस्थावान तो हैं लेकिन सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी के कुछ प्रवचन ,जिनमें उन्होंने हम लोगों की कमजोरियों को उजागर किया , विशेषकर जनरल बॉडी मीटिंग्स में किये गए प्रवचन ,वे हमारी आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं |

उनसे तो यह भी प्रकट होता है कि हम मात्र शरीरों से जुड़े हैं |बचपन से लेकर मृत्यु तक हम शरीरों में रहकर ही कार्य -व्यवहार करते हैं और काम-क्रोध-लोभ- मोह -अहंकार की कमजोरियों को पालित-पोषित करते हुए अमूल्य सांस गंवाते रहते हैं |जब थक जाते हैं तो हमें सहारे की ज़रुरत पड़ती है तो आदतन -तू ही निरंकार हमारी जुबान पर आ जाता है जबकि भीतर दिलो-दिमाग में सांसारिक क्रियाकलाप ही चलते रहते हैं तो यह अवस्था सिद्ध करती है कि हम निरंकारी तो ज़रूर कहलाते हैं लेकिन अभी पूरी तरह से हो नहीं पाए हैं |

दूसरा शब्द है-सन्त |

बाबा अवतार सिंह जी के कार्यकाल में इन सन्त समागमों का शुभारम्भ हुआ |स्पष्ट है कि यह नाम उन्होंने ही दिया होगा |

सन्त होना बहुत जरूरी है |अध्यात्म अथवा रूहानियत में यह उतना ही जरूरी है जितना कि शरीर  में आत्मा का होना |

सन्त की अवस्था के बारे में बाबा हरदेव सिंह जी महाराज कहा करते थे -सन्तन के मन रहत है सबके हित की बात ,घट-घट देखें अलख को,पूछे जात न पांत |

इस अवस्था में सबसे जरूरी तत्व है -ह्रदय में सबके हित का भाव होना | हिन्दू का ,मुसलमान  का,स्त्री का,पुरुष का,पशु का,पक्षी का ,अमीर का,गरीब का,पूंजीपति का,मजदूर का अर्थात सबका हित अर्थात धर्म-लिंग-जाति ,समुदाय,चौरासी लाख योनियों में से प्रत्येक योनि,सामाजिक स्थिति ,व्यवसाय आदि के दायरों से ऊपर उठकर सबका हित सोचना |

इसके अलावा सन्त की विशेषता बताई गयी-घट-घट देखें अलख को पूछे जात-न पांत |

यह है सन्त होने का आधार -हर घट में निरंकार को देखना |अगर यह हो सके तो फिर जाति-पाँति और जिन दायरों का जिक्र मैंने ऊपर किया वे बचते ही नहीं |इस प्रकार घट-घट में निरंकार को देखना ,समागम में आने वालों की विशेषता होनी चाहिए अर्थात बाबा अवतार सिंह जी ने सन्त समागम की जो विशेषता बताई उनके अनुसार इसमें सम्मिलित होने वाले महापुरुषों में हर घट में निरंकार को देखने की क्षमता होनी चाहिए| 

प्रश्न यह है कि आगंतुक सज्जनो में से कितने घट-घट में अलख को देख पाते हैं |निश्चय ही काफी देख पाते होंगे अन्यथा इस व्यस्त युग में कौन अपना किराया खर्च करके ,बिना कोई सांसारिक भाव रखे अपने घर-नगर से बाहर जाता है |

तीसरा शब्द है-समागम |समागम का अर्थ है -वह अवस्था ,जो रसोई में खाना बनाने की प्रक्रिया में आटे

और पानी को मिलाने पर होती है-अलग-अलग होने पर भी एक लक्ष्य के लिए एक हो जाना |

विवाह के बाद अथवा विवाह के पूर्व पति-पत्नी के सम्मिलन को भी समागम ही कहते हैं |अभी तो राजनीतिक नेताओं के भी समागम होने लगे हैं |बड़े-बड़े अख़बार भी बड़े-बड़े लोगों के समागम आयोजित करते हैं जिनमें आम आदमी तो घुस भी नहीं सकता |लेकिन मैंने सबसे पहले यह शब्द निरंकारी मिशन में ही सुना |

यहाँ इसके अर्थ पूरी तरह अध्यात्मिक हैं |समागम अर्थात सबके भीतर सबके हित का भाव ,सबके प्रति प्रेम का भाव |शांति का भाव ,मैत्री का भाव |

इस भाव को समर्पित यह सन्त समागम आज से शुरू हो रहा है |

निरंकारी मिशन का नेतृत्व आजकल सत्गुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी के हाथों में है |मिशन का सैद्धांतिक आधार अब भी वही है जो वर्षों पहले था |

अक्टूबर 2017 में एक रविवारीय साप्ताहिक सत्संग में प्रवचन करते हुए सत्गुरु माता सविंदर हरदेव जी ने कहा था -रेलगाड़ी जब किसी सुरंग में घुसती है तो उसमें अन्धकार छा जाता है लेकिन जैसे ही वह सुरंग के बाहर निकलती है ,भरपूर रोशनी दिखाई देती है |ये पंक्तियाँ आशाओं को जगाती हैं|सुदीक्षा सविंदर हरदेव जी आयु से युवा हैं अर्थात उनमें शुभ आशाएं और अधिक ऊर्जा और विश्वास के साथ मौजूद हैं |इसमें यह यथार्थ भी निहित है कि निरंकारी मिशन का भविष्य उज्जवल है |

सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज एक महामानव थे |उनका तप-त्याग-विजन असाधारण था |उनकी छत्रछाया 2016  में जिन परिस्थियों में विलुप्त हुई वे परिस्थितियां और भी दुखद हैं |ऐसी दुखद परिस्थितियों के बावजूद सुदीक्षा माता जी अपने पिता और गुरु के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प हैं |सिद्धांतों की इस यात्रा का मैं तन-मन-धन से उनका अनुगामी हूँ | 

आज 75 वे कदम की शुरूआत में हम में से हर एक को सोचना होगा कि हम कहाँ खड़े हैं और हमारी दिशा कौन सी है ?क्योंकि सत्गुरु के श्री चरणों में हम जीवनमुक्ति के लिए आये हैं,मौज-मेले तो दुनिया में भी कम नहीं हैं |

- रामकुमार सेवक