करेंसी नोटों पर तस्वीर से क्या उनका मूल्य बढ़ जायेगा ?

 -आर.के.प्रिय  

हमारे देश भारत में और जिस हिन्दू धर्म में मेरा जन्म हुआ, उसमें देवी देवताओं का बहुत महत्त्व है |उनकी संख्या इतनी ज्यादा है कि जनसामान्य उनका नाम भी याद नहीं रख पाता लेकिन उनसे भयभीत बहुत रहता है और इसी भय को वह आस्था का नाम दे देता है |

मालिक की कृपा है कि बचपन में ही यह ज्ञान हो गया कि परमेश्वर एक है,जिसे कोई ईश्वर कहता है तो कोई खुदा या अल्लाह |बचपन में ही यह भी ज्ञान हो गया कि यह निरी कल्पना नहीं है बल्कि वास्तविकता है |जैसे ही इस वास्तविकता का बोध हुआ ,इसका अनुभव जीवंत होता चला गया |

अभी -अभी एक भजन सुन रहा था ,जो इस्लाम के किसी अनुयाई ने लिखा था, जिसमें कवि ने लिखा-

न खुदा मस्जिद में देखा ,न ही बुतखाने में है, 

शेख जी रिन्दों से  पूछो,दिल के काशाने में है |

यह कवि सिर्फ लिखने के लिए भजन नहीं लिख रहा था क्यूंकि जो वह लिख रहा है,एकदम सत्य है |

रिन्दों (शराबियों )से उसका आशय प्रभु के प्रेमियों दीवानो से है )इस्लाम की सूफी परंपरा में इसका गहरा प्रभाव है |

मेरा विवेक भी प्रभु के प्रति बेइंतेहा इश्क़ के पक्ष में गवाही देता है |इस सच्ची गवाही के साथ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि इस दुनिया में बहुत सारे लोग हैं,जो इस प्रभु के नाम को बेचकर रोटी खा रहे हैं,बहुत सारे धर्मगुरुओं को तो मैं भी जानता हूँ लेकिन उन पर नकारात्मक टिप्पणी करने का कोई औचित्य नहीं क्यूँकि कीचड में ईंट मारने से किसी का भी भला नहीं होने वाला |

इसके समानांतर दूसरी जमात राजनेताओं की है जिन्हें हम सब और खासकर मेरे बिरदारभाई यानी कवि बहुत गालियां देते हैं लेकिन उनके घोटालों को किसी के भी द्वारा अनदेखा किया जाना असंभव है|इस को ध्यान में रखते हुए कवियों के हास्य-व्यंग्य पर विचार करते हैं तो नेताओं के प्रति कोई सहानुभूति नहीं उमड़ती और मेरा विवेक कहता है कि वे हैं ही इस काबिल |

मुझे एक लतीफा याद आ रहा है,जिसमें संवाद है कि बीवी की ज़ुबान के जलवे हम पांडवों के ज़माने से ही देखते -सुनते आ रहे हैं लेकिन गूंगी लड़की से विवाह कोई नहीं करना चाहता |

लगभग ऐसा ही सम्बन्ध नेताओं के साथ भी है|सब एकमत से यह मानते हैं कि सब बेईमान हैं लेकिन जैसे ही खुद को मौका मिलता है सब उसी जमात में शामिल होना चाहते हैं |  

वर्षों पहले एक फिल्म आयी थी -नायक ,उसकी कहानी में इतना नयापन था कि आज भी दर्शकों को बांध लेता है |फिल्म आमतौर से सत्य नहीं हुआ करती लेकिन कुछ ही साल बाद एक नायक दिल्ली में अवतरित हो गया जो आज के सबसे बड़े नेताओं में भी शुमार हो गया है |मज़े की बात तो यह है कि इंडोनेशिया से हमें क्या कुछ सीखना चाहिए,यह उसी ने बताया |

अपने करोड़ों देवी -देवताओं में से लक्ष्मी जी,और गणेश जी की फोटो अपने curencyनोटों पर लगानी चाहिए ताकि देश की आर्थिक स्थिति में उछाल आये,यह मौलिक विचार उसी ने प्रस्तुत किया |

यह सुझाव देते वक़्त यह तथ्य वह यह तथ्य भी भूल गया कि इंडोनशिया की आर्थिक स्थिति डॉलर और पौंड वाले देशों बल्कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था से भी गयी-गुजरी (शायद) है |

फिर आई आई टी के ये शिक्षित नायक जो पूर्व सरकारी अफसर ,
हैं हमें अतार्किक और असिद्ध शिक्षा क्यों दे रहे हैं ?

जरा कोई बताये कि राजनीति की दिशा बदलने का वादा करने वाले ये नायक अपने मानसिक संतुलन का यह कौन सा नमूना पेश कर रहे हैं ?  

राजनीति में नैतिक मूल्यों के उत्थान की यह  नयी चुनौती है |