19 अक्टूबर को श्री मल्लिकार्जुन खड़गे क्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के साथ एक प्रकार का क्रन्तिकारी बदलाव हुआ लगता है | सोचने की बात यह है कि यह परिवर्तन देश के अनुकूल है या प्रतिकूल ?
स्वतंत्रता के बाद हम लोगों ने बहुदलीय प्रजातंत्र की व्यवस्था चुनी है ,इस दृष्टि से कांग्रेस मुक्त भारत की बात सोचनी भी घातक है |
2014 और 2019 में लोकसभा चुनावों के जो परिणाम देखने को मिले उससे कांग्रेस मुक्त भारत के अजेंडे पर काम कर रहे लोगों के सपने पूरे होते दिखाई दे रहे थे |देश एक पार्टी की तानाशाही की और बढ़ रहा लगता था |
2016 में जिस प्रकार नोटबन्दी की गयी और जिसके नुक्सान आज तक देश भुगत रहा है |लोग कहते हैं कि यह सिर्फ एक आदमी का फैसला था और अब तो न्यायालय ने भी सरकार से उसके औचित्य का सवाल पूछा है |
देखते हैं क्या उत्तर मिलता है |
बहरहाल एकदलीय पद्धति का दूसरा नाम तानाशाही ही होना चाहिए |रूस का उदाहरण हम देख ही रहे हैं |
इस परिपेक्ष्य में कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव विशेष महत्वपुर्ण हैं ,और जिस प्रकार ये चुनाव हुए हैं वे कांग्रेस में भी एक ऐतिहासिक घटना लगते हैं |
कांग्रेस पर तो आपातकाल के दिनों में तानाशाही के आरोप खुले आम लगे थे |तब तो नारा ही था-तानाशाही हटाओ .लोकतंत्र बचाओ |अभी स्थिति एकदम विपरीत है |विगत दिनों राजस्थान के जयपुर में कांग्रेस का जो, विचार मंथन
के रूप में सम्मेलन हुआ था ,उस सम्मेलन में हुए निर्णयों के अनुसार कांग्रेस में चुनाव हुए और ऐसे स्वच्छ चुनाव पहली बार किसी राजनीतिक दल में देखे गए |
यह एक बड़ी बात है चूंकि कांग्रेस में चुनाव इस से पहले भी हुए हैं लेकिन उन पर पर्याप्त यकीन नहीं होता था |
भारत में अधिकांश दल व्यक्तिगत आधार पर निर्मित हैं |उनमें एक अथवा परिवार विशेष का ही नियंत्रण रहने की परंपरा रही है |
इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी में उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नियंत्रण रहता है | इस दृष्टि से कांग्रेस का सम्बन्ध जनता से ज्यादा दिखाई देता है |
कांग्रेस का 137 वर्ष का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि इसमें अनेक धाराएं हमेशा से रही हैं|इसमें वाम मार्ग से प्रभावित ग्रुप रहे हैं तो दक्षिणपंथी भी रहे हैं |श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि लोग रहे हैं तो पूंजीवाद के प्रबल समर्थक भी रहे हैं |यह कांग्रेस की विशेषता है कि वह सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी रही है |इसीलिए अधिकांश लोग इसे राजनीतिक दल की बजाय एक विचारधारा मानते हैं |
पिछले दिनों इंडिया टुडे से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला जी सत्य हिंदी न्यूज़ पर बता रहे थे कि कांग्रेस तो एक विचारधारा है जो चलती रहेगी |हार-जीत का सिलसिला तो लगा रहता है लेकिन पार्टी कायम रहेगी |वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा जी भी यही मानते हैं |
मल्लिकार्जुन खड़गे की जीत पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी बधाई सन्देश दिया है |यह राजनीतिक सहिष्णुता भारतीय राजनीति को बेहतर दिशा में ले जाने की दिशा में शुभ आशाएं जगाता है |अटल बिहारी वाजपेयी जी की भाजपा में यह सहिष्णुता आम थी |
एक तथ्य यह भी है कि मल्लिकार्जुन खड़गे यदि भाजपा के अंग रहे होते तो अस्सी की उम्र में मार्गदर्शक मंडल में ही होते ,आडवाणी जी और जोशी जी की तरह |अध्यक्ष का चुनाव जीतने की बात सोच भी नहीं सकते थे |
भाजपा में ज्यादा अनुभव मार्गदर्शक मंडल में ही जगह पाता है और कोई भी सोच सकता है कि मार्गदर्शक मंडल के मार्गदर्शन की भाजपा की राजनीति में भी
कितनी महत्ता है,दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है |
राजनीति में शक्ति के बिना कोई किसी के मार्गदर्शन को नहीं पूछता ,फिर भी कांग्रेस इस दृष्टि से बेहतर दिखाई देती है |
- आर.के.प्रिय


