पितर पूजा (श्राद्ध) का क्या औचित्य है ?

श्राद्ध हिन्दू धर्म में किया जाने वाला एक कर्म है जो पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने तथा उन्हें याद करने के निमित्त किया जाता है। इसके पीछे मूल मान्यता तो यह है कि जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं, जिनसे गुण व कौशल, आदि हमें विरासत में मिलें हैं, उनका हम पर  अपार ऋण है | इस प्रकार वे हमारे पूर्वज पूजनीय हैं। 

इसके बावजूद परमात्मा ही एकमात्र सर्व व्यापक और सर्वशक्तिमान सत्ता है |परमात्मा ही है जिसने हमारे पितरों को जन्म दिया इसलिए परमात्मा ही सर्वोच्च पूजनीय सत्ता है |परमात्मा का कहीं कोई विकल्प नहीं |

गीता के अध्याय 9 श्लोक 25 के अनुसार पितर पूजने वाले ,पितरों को, देेव पूजने वाले देवताओं को और परमात्मा को पूजने वाले परमात्मा को प्राप्त होते हैं।[2][3][4] अर्थात् मनुष्य को उसी की पूजा करने के लिए कहा है जिसे वह पाना चाहता है अर्थात समझदार व्यक्ति को तो परमात्मा की ही पूजा करनी चाहिए |

गीता के इस तत्वज्ञान में मुझे जरा भी संदेह नहीं लेकिन धर्म इतना सरल नहीं है चूंकि श्राद्ध की परंपरा आज की नहीं है |सदियों से यह परंपरा चलती आ रही है |गीता में कहे गए श्रीकृष्ण के निष्कर्ष पर यदि हिन्दुओं को शत प्रतिशत यकीन होता तो कोई भी हिन्दू परमात्मा को ही सर्वोच्च महत्व देता लेकिन धर्म में बहुत से व्याख्याता हैं जो कि अपनी तरह से धर्मप्रेमियों का मार्गदर्शन करते रहते हैं |   

सन्त कबीर दास जी ने श्राद्ध के नाम पर होने वाले रिवाजों को देखा होगा क्यूंकि इस बारे में वे बहुत तर्कसंगत दृष्टिकोण रखते थे |उसका कारण यह था कि उन्हें देवताओं आदि के नामो पर व्याप्त  अंधविश्वासों का कोई भय नहीं था |वे किसी भी आडम्बर के विरुद्ध थे |उनका मानना था कि परमात्मा स्वयं एक चेतनसत्ता है इसलिए ऊपरी स्तर पर अर्थात मात्र दिखावे द्वारा परमात्मा को प्रसन्न नहीं किया जा सकता क्यूंकि इसे बरगलाया नहीं जा सकता |यहाँ एक रोचक प्रसंग ज्ञातव्य है |

कहते हैं कि गुरु रामानंद जी ने श्राद्ध के दिनों में उन्हें दूध लाने भेजा |

बर्तन लेकर कबीर दास  जी दूध लेने चले गए लेकिन बहुत समय बाद और भोजन का समय भी व्यतीत हो गया तो रामानंद जी स्वयं कबीर को ढूंढने निकले |

उन्होंने देखा कि एक गाय मरी पडी है |बर्तन वहीं रखा है और कबीर जी वहां बैठे हुए हैं |

रामानंद जी के पूछने पर कबीर जी ने कहा-गुरु जी,गाय घास खायेगी तभी तो दूध देगी |

रामानंद जी ने कहा कि गाय तो मरी हुई है तो घास कैसे खायेगी ?

कबीर जी ने कहा कि गुरु जी,गाय तो आज मरी है और वह घास नहीं खा पा रही है |

आपके पूर्वजों की मृत्यु तो सैकड़ों साल पहले हो चुकी है तो वे आज का भोजन कैसे खा पाएंगे ?

यह सुनकर रामानंद जी कुछ नहीं कह सके |

कबीर दास जी सत्य के प्रति बिलकुल खरा दृष्टिकोण रखते थे |वे सत्य कहने में जरा भी संकोच नहीं करते थे चाहे उसका नतीजा जो भी हो |

उनका दृष्टिकोण यह नहीं था कि बहुमत को संतुष्ट करने के लिए झूठ को प्रतिष्ठित करें |वे  कहते थे -

माटी का इक नाग बनाकर पूजे लोग लुगाया |

जिन्दा नाग जो घर में निकले ,ले लाठी धमकाया |

ज़िंदा बाप कोई न पूजे मरे बाप पुजवाया |

मुट्ठी भर चावल देके कौवे को बाप बनाया | 

दुनिया कैसी बावरी जो पत्थर पूजन जाय |

घर की चक्की कोई न पूजे जिसका पीसा खाय |

इस प्रकार विपरीत की परवाह न करते हुए वे सत्य की शक्ति पर पूर्ण भरोसा करते थे |

सिख धर्म श्राद्ध के परंपरागत रूप को प्रायः मान्यता नहीं देता | प्रसिद्द सिख विद्वान ज्ञानी सन्त सिंह जी मस्कीन ने अपनी एक कथा में कहा कि इस प्रथा की प्रतिष्ठा में इस प्रथा के संचालकों का स्वार्थ निहित दृष्टिगोचर होता है |

उनका कहना है कि शरीर त्यागने के बाद जिनका पता ही नहीं कि मृत्यु के बाद किस अवस्था में हैं उन तक किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से भोजन ,वस्त्र आदि का पहुंचना कैसे संभव है ?

इसके अलावा उन्होंने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब की सत्रहवीं पौड़ी का उल्लेख करते हुए कहा है कि जीते-जागते माँ-बाप की तो सेवा नहीं,सम्मान नहीं ,ढंग का भोजन नहीं लेकिन मरने के बाद श्राद्ध ,विशेष ढंग का भोजन |यह सब पितरों को शांत करने के लिए करते हैं और यह दावा करें कि यह पितरों तक पहुँचता है इस बारे में श्री गुरु नानक देव जी का वचन तर्कसंगत लगता है कि कोई इंसान इस कार्य के लिए यदि चोरी करे,चोरी के पैसे से श्राद्ध करे तो यह अवस्था बनती है कि वस्तु तो चोरी की है और परमात्मा तो सब कुछ जानता है इसलिए पितर चोरी के दोष में सहभागी होंगे |

 फिर तो पितर भी चोर हो गये | क्यूंकि चोरी जिसने की वह तो अपराधी है ही लेकिन जो चोरी का सामान खरीदे या अपने पास रखे वह भी अपराधी माना जाता है इस प्रकार अपने पूर्वजों अर्थात पितरों को भी चोरी का भागीदार बनाते हैं |

प्रश्न उठता है कि क्या शरीर त्यागने के बाद किसी को कुछ नहीं भेजा जा सकता ?

गुरु साहिब कहते हैं कि शरीर त्यागने के बाद इंसान का अस्तित्व सूक्ष्म होता है इसलिए  पितरों के निमित्त कुछ भी स्थूल रूप में नहीं भेजा जा सकता |

इससे  यह तथ्य तो स्पष्ट है कि स्थूल चीज हम किसी  सूक्ष्म अस्तित्व को नहीं भेज सकते |

गुरु साहिब कहते हैं कि यदि परमात्मा का नाम इस संकल्प से जपो कि मैं यह जाप अपने पितरों के निमित्त कर रहा हूँ तो जाप का लाभ उस तक पहुँच सकता है |

इस कार्य का फल यदि उन्हें अर्पण करना चाहता हूँ तो हरि नाम चूंकि सूक्ष्म है और सूक्ष्म वस्तु दूर तक भेजी जा सकती है |इस प्रकार पितरों का भी उद्धार हो सकता है |  

धर्म का जिसे थोड़ा सा भी ज्ञान हैं वह दार्शनिक इस तथ्य को भली भांति समझ सकता है कि खाये तो कोई और और उसका लाभ किसी  अन्य को मिल जाये अर्थात भूख शांत अर्थात क्षुधा तृप्ति किसी और की हो,यह सम्भव नहीं है |

वर्षों पहले जिस व्यक्ति ने शरीर त्यागा हो,अब वह किस योनी में है किसी को नहीं पता तो दान का धन और सामान उस तक कैसे पहुंचेगा ?

शायद ही कोई मनुष्य यह दावा कर सके कि उसके किये गये श्राद्ध में कुछ भी धन अपवित्र किस्म का नहीं है |

कुछ न कुछ मात्रा में अपवित्र अंश जरूर होगा |अगर यह अवस्था है तो चोरी की अपवित्रता का दुष्प्रभाव पितरों तक जरूर जायेगा |

दूसरों का हक़ चोरी करके अर्जित किया गया धन जिस अपवित्रता का वाहक है,वह अपवित्रता भी पितरों तक अवश्य पहुंचेगी | 

किसी के हक़ पर डाका डालकर पितरों को श्राद्ध समर्पित करना पितरों को भी चोरी का इल्जाम देने का कारण बनेगा | 

अगर शरीर के रहते हुए ही इंसान ने कुछ मेहनत की हो,प्रभु के नाम का जाप किया हो तो वह शरीर के अन्त में इंसान के साथ जाता है |जाप शब्द इस बात का द्योतक है यह रटन नहीं है |

जाप का अर्थ है कि जुबान जब परमात्मा का नाम बोलती है तो मन उसे सुने |जाप करने के साथ उसने कुछ परोपकार भी किया हो तो तो यह पुण्य उसके साथ जाता है |

इस प्रकार गुरु साहिब ने दूसरों के कराये गए श्राद्ध पर भरोसा करने की बजाय स्वयं अपने सत्कर्मो ,पुण्य आदि पर भरोसा करने की बात कही है |

निरंकारी श्रद्धालुओं में श्राद्ध की प्रथा को प्रगतिशील रूप में देखा जाता है |यह समाज पूर्वजों के प्रति श्रद्धा को मान्यता देता है परन्तु उसके लिए किसी कर्मकांड को स्वीकार नहीं करता |

इस समाज में व्यक्ति के जो भी पूर्वज शरीर त्यागते हैं तो उनके वंशज उनकी स्मृति में सत्संग में आये श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद का वितरण कर देते हैं |इसके लिए कोई समय निर्धारित नहीं है |ये कभी भी अपनी श्रद्धा समर्पित कर देते हैं |

अनेक बार यह भी होता है कि जीवन काल में जो उनके मित्र रहे उन सज्जनो की सेवा कर दी जाए |इस 

आयोजन द्वारा यह भाव बिलकुल नहीं होता कि इससे उस पूर्वज की स्थिति में कोई सुखद परिवर्तन होगा बल्कि निरंकारी श्रद्धालु उन्हें ब्रह्मलीन सन्त मानते हैं और मानते हैं कि वे चूंकि शरीर त्यागने से पूर्व निरंकार की अनुभूति और साक्षात्कार कर चुके थे तो उस व्यक्ति की आत्मा मुक्त हो चुकी है |

श्राद्ध के प्रति उनके मन में आस्था तो होती है लेकिन उसके पीछे का भाव वही रहता है कि जो भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के नौवें अध्याय में कहा कि जो परमात्मा के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित करते हैं वे परमात्मा तक पहुँचते हैं | 

परमात्मा चूंकि निराकार है इसीलिए ऐसा माना जाता है कि प्रभु की सन्तानो अर्थात इंसानो की सेवा करके ही प्रभु को प्रसन्न किया जा सकता है इसलिए निरंकारी श्रद्धालुओं में नर सेवा नारायण पूजा के सिद्धांत की पूर्ण प्रतिष्ठा है जो मानती है कि प्राणिमात्र की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है |

इस प्रकार यहाँ इस प्रथा का बेहतर रूप नज़र आता है कि वे श्राद्ध को किसी पूर्वाग्रह के रूप में देखकर भयभीत नहीं होते बल्कि सही अर्थों में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं |

इसी को आध्यात्मिक दृष्टिकोण स्वीकार करना चाहिए चूंकि व्यक्ति के वंशजों में अपने पूर्वजों की मुक्ति के प्रति कोई संशय नहीं है और उनके प्रति श्रद्धा का भाव पूर्णतः प्रस्तुत किया गया है |   

- रामकुमार 'सेवक'