उन्होंने फिल्मो में वास्तविक जीवन से जुड़े किरदार निभाए ,जिन्हें दर्शकों ने खूब पसंद किया |अपने चार दशक के लम्बे करियर में उन्होंने ऐसी दर्जनों फिल्में कीं,जिन्होंने दर्शकों पर स्थायी प्रभाव छोड़ा |1978 में उस समय के जाने—माने फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म 'जूनून ' में काम किया लेकिन उन्हें असली पहचान और लोकप्रियता 1980 में प्रदर्शित फिल्म 'एक बार फिर' से मिली।
दीप्ति का करियर बहुत अच्छा चल रहा था |निर्माता -निर्देशक उन्हें और उनके काम को पसंद कर रहे थे लेकिन व्यक्तिगत जीवन में वे अपने आपको उतनी सफल नहीं पा रही थीं बल्कि फिल्मो की सफलता उनकी निजी ज़िन्दगी से गायब थी |उन्होंने निर्माता निर्देशक प्रकाश झा से विवाह किया लेकिन यह संतोषजनक नहीं रहा |सत्रह वर्ष बाद अंततः उनका तलाक़ हो गया |
यद्यपि उनकी एक गोद ली गयी बेटी थी लेकिन तलाक़ के बाद उनकी ज़िन्दगी में अकेलापन छा गया |एक हमसफ़र की कमी उन्हें खल रही थी |
लेकिन जल्दी ही उनकी ज़िंदगी में शास्त्रीय गायक पंडित जसराज के बेटे विनोद जसराज आये और दीप्ति के जीवन में हवा का एक खुशनुमा झोंका आता महसूस हुआ |जीवन में शुभ आशाओं के दीपक जलने लगे थे |उनकी सगाई हुई और विवाह तय होने प्रक्रिया भी शुरू हो गयी लेकिन यह गीत ध्यान में आ रहा है-
जुबां पे दर्द भरी दास्ताँ चली आयी,
बहार आने से पहले ख़िज़ाँ चली आयी--
ऐसा ही कुछ हुआ विनोद जसराज विवाह से पहले ही चल बसे (वे कैंसर के मरीज थे)और दीप्ति के जीवन में फिर अँधेरा छा गया |
दीप्ति के जीवन का यह एक कठिन मोड़ था लेकिन दीप्ति ने खुद को संभाला और दोबारा फिल्मो में सक्रिय हो गयीं |
अमृतसर में तीन फरवरी 1952 को जन्मी दीप्ति नवल का बचपन न्यूयॉर्क में बीता, जहाँ उनके पिता सिटी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे |एक साक्षात्कार में उन्होंने प्रसार भारती (राज्यसभा टी.वी.)को बताया कि 1971 में उनके पिताजी अमृतसर से न्यूयॉर्क जाकर बस गये |धीरे -धीरे पूरा परिवार ही वहां बस गया |उनके पिताजी अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे तो दीप्ति को भाषा से स्वाभाविक ही लगाव हो गया |कविताओं से जुड़ाव भी उसी का असर हो सकता है |पेंटिंग का शौक उन्हें उनकी माता जी से लगा ,जिसे उन्होंने अपने हिसाब से विकसित किया |
अभिनय से उनका लगाव बचपन से ही था लेकिन शिक्षक माता-पिता की संतान होने और घर में शिक्षा का अधिक प्रभाव होने के कारण कॉलेज की पढाई पूरी होने तक उन्होंने इस शौक को स्वयं तक सीमित रखा तत्पश्चात जब न्यूयॉर्क में उन्होंने अपनी पढाई पूरी कर ली तब अपने परिवार को बता दिया कि भारत वापस जाकर हिंदी फिल्मो में अभिनय को कैरियर के तौर पर अपनाने उनका इरादा है |
परिजनों को इससे आश्चर्य भी हुआ लेकिन 1977 में वे भारत आ गयीं और फिल्मो में काम करने लगीं |उनके पिताजी ने उन्हें सहयोग किया चूंकि वे महसूस करते थे कि जबरदस्ती किसी क्षेत्र को अपनाने से बेहतर है स्वाभाविक रूचि के क्षेत्र में प्रतिभा को विकसित किया जाये |
न्यूयॉर्क में उन्होंने भारत के कुछ प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशकों के नाम अपनी डायरी में लिखे हुए थे,जिनके साथ काम करना उनका सपना था |इनमें हृषिकेश मुख़र्जी,सत्यजीत रे ,श्याम बेनेगल,बासु भट्टाचार्य,गुलज़ार,बासु चटर्जी आदि के नाम थे | न्यूयॉर्क में उन्होंने अनेक फ़िल्मी हस्तियों के इंटरव्यू किये थे ,जिनमें राजकपूर,सुनील दत्त,दिलीप कुमार ,साधना तथा गुलज़ार प्रमुख थे |
जब 1977 में फिल्मो में काम करने वे भारत आयी तो हेमंत कुमार की बेटी रानू मुख़र्जी की दोस्ती काम आयी |उन्होंने हृषिकेश मुख़र्जी से उन्हें मिलवाया |इसी क्रम में किसी ने श्याम बेनेगल से भी मिलवाया |उन्होंने उन्हें जूनून में अवसर दिया |
जूनून में उन्हें शशि कपूर,जेनिफर कपूर,नसीरुद्दीन शाह,शबाना आज़मी,कुलभूषण खरबंदा आदि के काम को निकट से देखने का मौका मिला |
इससे पहले स्टेज आदि पर अभिनय का भी कोई अनुभव उन्हें नहीं था |नसीरुद्दीन शाह के अनुसार -दीप्ति नवल की बड़ी बात यह है कि उन्होंने अभिनय कहीं सीखा नहीं |
दीप्ति नवल का कहना है कि वे फिल्मो को मात्र मनोरंजन का साधन नहीं मानती बल्कि दर्शकों को अपने किरदार से ऐसा सन्देश देना चाहती हैं ,जो उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर करे |
कमला,मोहन जोशी हाज़िर हों और तपन सिन्हा की दीदी ऐसी ही फ़िल्में हैं |
फारूक शेख के साथ उन्होंने नौ फिल्में कीं |इसकी स्वाभाविकता का श्रेय वे फिल्म निर्देशिका सई परांजपे को देती हैं |उन्हें वे बहुत ही संवेदनशील और सहज कलाकार मानती हैं |विश्व सिनेमा से हिंदी सिनेमा की तुलना करने पर वे मानती हैं तकनीकी रूप से आज की फिल्में बहुत सफल हैं लेकिन
गुरुदत्त,विमल रॉय आदि की फिल्मो में जो आत्मिक तत्व नज़र आता है,वह अब कहीं पीछे छूट गया लगता है |
उनके बारे में यह आम कहा जाता है कि उनकी ख़ामोशी बहुत बोलती है विशेषकर आँखें | उन्हें पेंटिंग और फोटोग्राफी का शौक शुरूआत से ही था |
सिटी यूनिवर्सिटी में पढाई के बाद उन्होंने मेनहट्टन के थंडर कॉलेज से फाइन आर्ट में बैचलर डिग्री हासिल की |कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने न्यूयॉर्क के रेडियो स्टेशन में काम करना शुरू किया |वहां हिंदी कार्यक्रम भी प्रसारित होते थे | साथ ही उन्होंने मेनहट्टन के चीन ट्रैंकल के एक्टिंग एंड फिल्म मेकिंग कोर्स में भी प्रवेश ले लिया |
कोर्स शुरू करने के एक महीने बाद ही उन्हें भारत आकर फिल्मो में काम करने का अवसर मिल गया | यह 1977 था ,यहीं फिल्म जलियांवाला बाग से उनके एक्टिंग करिअर की शुरूआत हुई |
अपने चार दशक लम्बे फ़िल्मी करियर में उन्होंने लीक से हटकर फिल्में की और अलग पहचान बनाई | उन्होंने अलग तरह के किरदार निभाए और दर्शकों को उनकी अदाकारी भा गयी |जिन फिल्मो से उनकी पहचान बनी उनमें अनकही ,बवंडर,लीला,अंगूर ,मिर्च मसाला,फ़िराक़ शामिल हैं | जिन फिल्मों के लिए वह जानी जाती हैं उनमें 'चश्मे बद्दूर', 'कथा' और 'साथ-साथ' प्रमुख हैं।
उन्होंने रुपहले परदे पर न केवल अपने अभिनय की छाप छोड़ी बल्कि एक कलाकार के तौर पर अपने हुनर को भी साफ़ किया |उन्होंने अपने मन के भावों को कागज़ पर भी उतारा |
उनकी प्रकाशित पुस्तकों में काव्य संग्रह लम्हा लम्हा ,तथा अंग्रेजी भाषा में एक लघुकथा संग्रह ( )बहुत प्रसिद्ध है |इसके लिए वे अमृता प्रीतम को श्रेय देती हैं |बहुआयामी कलाकार दीप्ति ने कवयित्री होने के अलावा अपनी पेंटिंग्स और फोटोग्राफी से भी अपनी संवेदना का परिचय दिया है | फिल्म अभिनेत्री दीप्ति नवल कविताएं भी लिखती हैं तथा कहानी लेखन में भी उनका दखल है ।सामानांतर सिनेमा में उन्हें शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल के करीब माना जाता है | दीप्ति को संगीत तथा फोटोग्राफी से भी लगाव है। 1983 में इनका कविता संग्रह लम्हा-लम्हा प्रकाशित हुआ।उन्होंने फिल्मो में केवल अभिनय ही नहीं किया बल्कि लेखन,निर्माण और निर्देशन में भी हाथ आजमाया |इस क्रम में उन्होंने महिलाओं पर आधारित टी.वी.धारावाहिक थोड़ा सा आसमान का लेखन और निर्देशन किया | एक यात्रा शो का भी निर्माण किया |
2014 में बनी अपनी फिल्म यारियां में उन्होंने गर्ल्स हॉस्टल के वार्डन की भूमिका निभाई | इससे पहले 2013 में वे बी.ए.पास और औरगजेब में भी नज़र आ चुकी हैं | इनकी पहली फिल्म 1979 में रिलीज हुई। इनका जन्म अमृतसर पंजाब में हुआ। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत से लगाव है। वे कई वाद्ययंत्र भी बजाती हैं।हिमाचल व लद्दाख की पहाड़ियों में ट्रैकिंग का भी उन्हें उन्हें शौक है |एनिमेटेड फिल्म महाभारत की सी डी में उन्होंने कुंती के चरित्र को अपनी आवाज़ दी |मानसिक रूप से बीमार लोगों के बारे में सामाजिक जागरूकता फैलाने के काम में भी वे लगी हैं |अपने दिवंगत मंगेतर विनोद जसराज की स्मृति में उन्होंने विनोद पंडित चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना भी की है |जिसके माध्यम से वे समाज सेवा के कार्य करती रही हैं|
चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, कथा, किसी से न कहना, साथ-साथ, लिसेन अमाया आदि उनकी लोकप्रिय फिल्में हैं।कविताओं में उनकी संवेदना की एक झलक यहाँ प्रस्तुत है-
मैंने देखा है दूर कहीं पर्बतों के पेड़ों पर...
मैंने देखा है दूर कहीं पर्बतों के पेड़ों पर
शाम जब चुपके से बसेरा कर ले
और बकिरयों का झुंड लिए कोई चरवाहा
कच्ची-कच्ची पगडंडियों से होकर
पहाड़ के नीचे उतरता हो
मैंने देखा है जब ढलानों पे साए-से उमड़ने लगें
और नीचे घाटी में
वो अकेला-सा बरसाती चश्मा
छुपते सूरज को छू लेने के लिए भागे
हाँ, देखा है ऐसे में और सुना भी है
इन गहरी ठंडी वादियों में गूँजता हुआ कहीं पर
बाँसुरी का सुर कोई़...
तब
यूँ ही किसी चोटी पर
देवदार के पेड़ के नीचे खड़े-खड़े
मैंने दिन को रात में बदलते हुए देखा है!
"बहुत घुटी-घुटी रहती हो...
"बहुत घुटी-घुटी रहती हो...
बस खुलती नहीं हो तुम!"
खुलने के लिए जानते हो
बहुत से साल पीछे जाना होगा
और फिर वही से चलना होगा
जहाँ से कांधे पे बस्ता उठाकर
स्कूल जाना शुरू किया था
इस ज़ेहन को बदलकर
कोई नया ज़ेहन लगवाना होगा
और इस सबके बाद जिस रोज़
खुलकर
खिलखिलाकर
ठहाका लगाकर
किसी बात पे जब हँसूंगी
तब पहचानोगे क्या?
लोग एक ही नज़र से देखते हैं...
लोग एक ही नज़र से देखते हैं
औरत और मर्द
के रिश्ते को
क्योंकि उसे नाम दे सकते हैं ना!
नामों से बँधे
बेचारे यह लोग!
