आज सुबह जब मैं घर से चला तो सामने से लोग किसी शव को लेकर जा रहे थे |मैं बेटे की स्कूटी पर सवार था लेकिन मुर्दे को सामने से गुजरते देखा तो मैं स्कूटी से नीचे उतर गया |
मुझे लगा कि हो सकता है उस मुर्दे की जगह मैं खुद ही उसमें बंधा होता |मृत्यु किसी की कभी भी हो सकती है,इससे कोई इंकार नहीं कर सकता इसलिए यह ख्याल आते ही मैं नीचे उतरकर खड़ा हो गया |
मुझे लगा कि यह इंसान ,जो आज मरा है,हर मृतक की तरह ,अपने परिजनों की सहानुभूति का पात्र तो अवश्य है लेकिन एक मनुष्य होने के नाते मेरे साथ भी उसका एक अस्पष्ट सा सम्बन्ध है इसलिए मुझे भी मनुष्यता दिखानी चाहिए |यद्यपि मैं इसका आश्रित नहीं हूँ और न यह मेरा आश्रित है |
लेकिन कोई तो होगा जिसका जीवन इसके न होने से कुछ कठिन हो जायेगा |ऐसे व्यक्तियों को इसकी मृत्यु का दुःख होना स्वाभाविक है और वे सब भगवान को अन्यायी मान रहे होंगे |जैसे कि मैं भी मान रहा हूँ कि परमात्मा ने एक पिता से उसका बेटा छीन लिया |
मुझे पता ही नहीं था कि रस्सियों में बंधी लाश किसकी है इसके बावजूद मैंने भगवान को अन्यायी मान लिया चूंकि मेरी सहानुभूति मृतक के प्रति थी |मृतक कौन है,मैंने सोचा |
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उसे सब सोनू कहते थे |माँ का वह कुछ ज्यादा ही लाडला था ,जैसे कि बच्चे और खासकर बेटे होते हैं|हर बच्चा अपनी माँ की आँखों का तारा ही तो होता है |
आँखों का तारा तो पिता के लिए भी होता है लेकिन पिता चूंकि पुरुष होता है इसलिए उसका प्रेम इस तरह नज़र नहीं आता |वह कभी- कभी डांटता भी है |
दीपक उसका असली नाम रहा होगा लेकिन हर दीपक में रोशनी नहीं होती |यह वैसे ही है जैसे हर तारा ध्रुव तारा नहीं होता और हर बेटा अपने माता - पिता का नाम रोशन करने वाला नहीं होता|
यद्यपि मोहल्ले में मैंने सोनू की कोई बड़ी शिकायत नहीं सुनी ,हाँ एक बार किसी टी.वी. चैनल ने उसके पिताजी के चक्कर में सोनू को बदनाम कर दिया था |
यद्यपि उसके पिताजी बहुत अच्छे आदमी हैं लेकिन कुछ दिनों से वे बाबा अथवा धर्मगुरु के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गए हैं |बड़े -बड़े अखबारों में उनके फोटो और इंटरव्यू छपते हैं इसलिए विशिष्ट हो गए हैं |अब तो हज़ारों लोग उनकी जय-जयकार करते हैं |
ऐसे लोगों के पास पैसा भी खूब होता है तो टी वी चैनल ने उनके इकलौते पुत्र अर्थात सोनू के तब तक के जीवन के सारे नकारात्मक पहलुओं को हाईलाइट करना शुरू किया |
सोनू युवक था तो किसी भी युवक की दिलचस्पी लड़कियों में हो सकती है और मालदार बाप के इकलौते बेटे में किसी भी लड़की की |
यह कोई विशेष बात नहीं है लेकिन आजकल की पत्रकारिता गणेश शंकर विद्यार्थी और राजेंद्र माथुर के युग की पत्रकारिता नहीं है इसलिए किसी ने भी मामले को तूल नहीं दिया लेकिन सफ़ेद कुर्ते पर छोटा सा दाग भी दिखाई देता है और धर्मगुरु पर तो खासकर ,इसलिए छोटा-मोटा दाग तो लग ही गया |
सोनू मोहल्ले में बिलकुल शांत रहता था इसलिए किसी ने भी ब्लैक मेलिंग की इस कहानी को तूल नहीं दिया |परन्तु इतना तो सबने सोचा कि धुआँ है तो आँच भी होगी ही |
चन्दन सिंह जी यद्यपि बहुत अच्छे आदमी हैं और लोगों की बहुत मदद करते हैं|
एक सज्जन ने मुझे बताया कि उनकी घरवाली को बच्चा होने वाला था और कोरोना के दौर में जॉब छूट गयी |
किसी ने चन्दन सिंह जी के पास जाने को कहा |कोई और चारा भी नहीं था इसलिए कोई परिचय हुए बिना ही श्रीवास्तव जीउनके पास चले चले गए |
चन्दन सिंह जी ने उन्हें दस हज़ार रूपये दिए और साथ ही कहा कि ये दस हज़ार रूपये क़र्ज़ नहीं है बल्कि श्रीवास्तव जी के होने वाले बच्चे के लिए मेरी तरफ से शगुन है |
आप सोच सकते हैं कि श्रीवास्तव के दिल से चन्दन सिंह जी के लिए कौन -कौन सी दुआ नहीं निकली होगी लेकिन चन्दन सिंह जी आज भीतर से रो रहे हैं |इसे भगवान का न्याय कहें या अन्याय ,समझ में नहीं आता |
भगवान के न्याय को कोई क्या कहे चूंकि न्यायकारी के न्याय पर सवाल उठाना किसी भक्त की मर्यादा नहीं है और सवाल उठाने की हिम्मत भी कौन करे चूंकि भगवान् के सामने हर कोई डरपोक है |
चन्दन सिंह उनका जन्म का नाम है और जिनकी उन्होंने मदद की है,उनके दिलों में चन्दन सिंह जी का नाम यूँ विराजमान है जैसे किसी जंगल में चन्दन का पेड़ |
चन्दन सिंह जी के परोपकार के कामो से जैसे चन्दन की खुशबू महकती रहती है |वास्तव में सेवा और परोपकार ही किसी भी इंसान को अमर करते है |
उनकी दरियादिली का एक किस्सा शर्मा जी ने मुझे बताया था |एक बार वे शर्मा जी के साथ जा रहे थे |रास्ते में एक बूढ़े को तरबूज बेचते देखा |
चन्दन सिंह जी ने उससे पूछा कि तरबूज कितने का है |
बूढ़े ने एक किलो का रेट बता दिया |
चन्दन जी ने पूछा -सारे तरबूज कितने के हैं ,उसने कहा-सौ रूपये के |
चन्दन जी ने उसे सौ रूपये दे दिए |
शर्मा जी ने चन्दन जी को डाँटा और कहा- गाड़ी में सब पहले ही मुश्किल से बैठे हैं अब ये तरबूज कहाँ रखें ?
बहरहाल बूढ़े की समस्या तो हल हो ही गयी |
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फिर चन्दन सिंह जी को इतना बड़ा सदमा क्यों झेलना पड़ा ?यह एक ऐसा प्रश्न है जो मुझे लगातार मथ रहा है |
साठ की उम्र में आंसू तो नहीं बहा सकते और धर्मगुरु के रूप में तो बिलकुल नहीं |
भगवान के इस अन्याय ने मेरी नींद ख़राब की हुई थी क्यूंकि मेरा दृढ विश्वास है कि भगवान कभी अन्याय नहीं करता और इस विश्वास को मैं अन्धविश्वास की तरह और पत्थर की लकीर मानता हूँ |
चेतन जी हाल ही में एक अख़बार से जुड़े हैं |उन्होंने मुझे कुछ रहस्य बताये जिनके बाद मुझे लगा कि चन्दन सिंह जी उतने अच्छे तो बिलकुल नहीं हैं,जितना मैं उन्हें समझ रहा था |
चेतन जी ने बताया कि एक दवा कंपनी खोलने के नाम पर उन्होंने बैंक से मोटा क़र्ज़ लिया और क़र्ज़ चुकाने से पहले ही कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया |
इस प्रकार बैंक को और इस बहाने देश को भी चोट पहुंचाई |
आज चौथा दिन है सोनू की मृत्यु हुए |
लेकिन यह प्रश्न लगातार भारी होता है जा रहा है कि चन्दन सिंह को यह दर्द क्यों झेलना पड़ा | इसका सीधा सा जवाब है हरि इच्छा |लेकिन यह उत्तर मेरे लिए पर्याप्त नहीं है |चूंकि मेरे मन में उठने वाले प्रश्नो की संख्या लगातार बढ़ रही है |प्रश्नो की नसबंदी भी तो नहीं कर सकते चूंकि वो तो दिमाग की उपज हैं |
मूल सवाल यह है कि भगवान के न्याय का यह कौन सा स्वरुप है कि पिता से उसका बच्चा छीन लिया जाये ?
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सोनू की बीवी कौन है ?चन्दन सिंह जी ने अपने बेटे सोनू का विवाह तो नहीं किया था फिर बंटी सोनू का बेटा कैसे हुआ ?जो कॉलोनी के सब लोग आपसी बातचीत में कहते हैं लेकिन आगे का जवाब कोई नहीं देता |
फिर बंटी से सोनू का क्या सम्बन्ध है ,जिससे उसकी चिता को अग्नि दिलवाई गयी ?मेरा ताज़ा प्रश्न है |
बंटी को खुद पता नहीं है कि सोनू के शरीर को उसने आग क्यों लगायी ?
दीवाली में एक बार उसकी उंगली मोमबत्ती से छू गयी थी तो इतना दर्द हुआ था कि चीख निकल गयी थी फिर सोनू जी को बाबा जी ने मुझसे आग क्यों लगवाई, वह सोच रहा था |
उससे भी बड़ा प्रश्न यह था कि सोनू जी के मुँह से चीख क्यों नहीं निकली ,इतनी ज्यादा आग में जलने पर भी,बंटी सोच रहा था |
मेरे सवाल कुछ और थे और बंटी के कुछ और लेकिन सवाल दोनों के ही थे और सच्चे थे |
चन्दन सिंह खुद ब्रह्मर्षि और बाबा हो गए थे लेकिन प्रश्न उनके भी थे हालांकि बाबा लोग हर प्रश्न का उत्तर रखने का दावा करते हैं, यह दावा कितना सच्चा है चन्दन सिंह जी ही बेहतर जानते थे |
बाबा के सवालों का जवाब कौन दे ,मुझे खुद पता नहीं |
चन्दन सिंह जी एक ज्योतिषी के प्रभाव में बहुत दिनों से थे |ज्योतिषी ने ही पहले उन्हें बाबा बनाया और बाद में ब्रह्मर्षि और फिर योग योगेश्वर |
स्वामी जी के पास पैसा खूब था और किसी शायर ने कहा है -न बीवी न बच्चा ,न बाप बड़ा न भैया the whole thing is that कि भैया -सबसे बड़ा रुपैया |
चन्दन सिंह जी को बाबा बनने में कोई मुश्किल नहीं आयी चूंकि वे दिल के अच्छे थे |काम-धंधा अच्छा-ख़ासा था तो पैसे की कोई कमी नहीं थी |
ज्योतिषी जी ने उन्हें बताया कि आपको कुछ नहीं करना बस आशीर्वाद देते जाओ |
हिंदुस्तान में वैसे भी बाबाओं की कमी नहीं है |लेकिन चन्दन सिंह जी आयुर्वेद भी जानते थे और स्वामी जी के धंधे में आयुर्वेद का अपना महत्व है |
स्वामी जी आयुर्वेद के अच्छे -खासे डॉक्टर थे और उनके इलाज से मरीज ठीक भी हो जाते थे |लोग उन्हें फीस भी अच्छी -खासी देते थे |स्वामी जी उस पैसे का बड़ा हिस्सा ज़रूरतमंद गरीबों को बाँट देते थे |जिन लोगों की समस्याएं वे हल करते थे वे लोग उन्हें दिल से आशीर्वाद देते थे |ज्योतिषी के बाद एक पत्रकार महोदय भी उनके संपर्क में आये |
पत्रकार ने स्वामी जी के बारे में झूठे -सच्चे लेख लिखे और कुछ ही समय बाद उनके घर का नवीनीकरण होना शुरू हो गया |
धीरे -धीरे घर ने आश्रम का रूप ले लिया |कमरों की संख्या बढ़ गयी और कारों की भी |
उनके आश्रम के बाहर सिक्योरिटी दिखाई देनी शुरू हो गयी |उन्होंने एक अस्पताल भी बनवाया और आश्रम के माध्यम से परोपकार शुरू हो गया |उन्होंने एक और कोठी खरीदी जो उनके घर से भी ज्यादा शानदार थी |
उसमें ऐसी व्यवस्था थी कि ब्रह्मर्षि जी,स्वामी जी अथवा योग-योगेश्वर जब उसकी सबसे ऊँची मंज़िल पर खड़े हों तो हज़ारों भक्त उनके दर्शन कर सकें |
धीरे -धीरे लोग उनका असली नाम भूल ही गए और वे स्वामी जी कहलाने लगे |स्वामी कहलाने में कोई नैतिक समस्या नहीं थी चूंकि वर्तमान युग में स्वामियों की कोई आचार संहिता नहीं होती |हाँ,सम्मान जरूर ज़रुरत से ज्यादा होता है|
लेकिन पुराने ज़माने में सम्मान इससे भी बहुत अधिक होता था |
धीरे- धीरे उनका रुतबा बढ़ता गया |दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ती गयी |उनके पास लोग जुटते थे और धीरे -धीरे लोग उन्हें भी भगवान मानने लगे |
उनकी पत्नी उनके पुत्र और उनके रिश्तेदार भी बहुत अधिक सम्मानित हो गए |कई लोग उनके लिए काम करते थे |इन स्वयंसेवकों में से कुछ युवतियां भी थीं |
स्वामी जी के अनेक सेवा केंद्र थे ,इनमें एक हस्पताल अथवा रिसर्च सेंटर भी था |
हमारी कॉलोनी ज्यादा बड़ी नहीं थी इसलिए यहाँ किसी भव्य मंदिर के निर्माण के लिए पर्याप्त जगह नहीं है फिर भी स्वामी जी ने वहां कल्पवृक्ष भूदेव मंदिर बनवाया |
कल्पवृक्ष की अपनी विशेष कहानी है |समुद्र मंथन के दिनों में जो चौदह रत्न निकले थे उनमें कल्पवृक्ष भी था ,कथावाचक बताते हैं |
हमारी कॉलोनी में पीपल का एक पेड़ था ,जिसके नीचे एक नाई बैठा करता था |और भी खाने-पीने की अनेक दुकाने थीं |धीरे-धीरे उन सब दुकानों ने मंदिर में समाधि ले ली और पीपल के पेड़ को कल्पवृक्ष घोषित कर दिया गया |
ज्योतिषी ,पत्रकार और स्वामी जी एकजुट हो गए तो स्वामी जी के घर को स्वर्ग धाम मान लिया गया |यह तर्कसंगत भी था चूंकि कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में ही होता है |ज्योतिषी जी महापंडित थे तो उनकी घोषणा में भी कोई शंका न रही |
इस बाजार में काफी भीड़-भाड़ रहने लगी |
रामआसरे स्वामी जी का एक वफादार चौकीदार था |वह बहुत कम बोलता था |उसकी बेटी को भी स्वामी जी के आश्रम में नौकरी मिल गयी |राम आसरे खुश था कि उसकी उम्र तो अब काम करने की न रही लेकिन बेटी को रोज़गार मिल गया था जिससे घर में खुशहाली के लक्षण दिखाई देने लगे |
मधु का रुतबा भी काफी बढ़ गया था |कई लड़कियां थीं जिन्हें उसने आश्रम में रोजगार दिलवाया था |उसका रुतबा इतना बढ़ गया था ,वह बहुतों की दीदी गुरु हो गयी थी |मंदिर में कन्या पूजा का विशेष महत्व था |
स्वामी जी का आभामण्डल दिन ब दिन बढ़ रहा था |उनके दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ने लगी थी |मंदिर में काफी लोग आने लगे थे |मंदिर के प्रति आस्था में वृद्धि के लिए पत्रकार महोदय पूरी कोशिश कर रहे थे |उन्होंने मंदिर के सम्बन्ध में प्रभावी लेख लिखे थे |इस प्रकार पत्रकार महोदय का प्रभाव भी लगातार बढ़ रहा था |
जितनी भी रामलीला कमेटियां थीं सब स्वामी जी को बुलाकर उनकी उपस्थिति का लाभ लेना चाहते थे |
नेता भी उनसे आशीर्वाद लेना चाहते थे |यह सब प्रबंध जनार्दन पंत जी को ही करना पड़ता था |कार्यक्रमों का मंच सञ्चालन भी वही करते थे |
स्वामी जी की लोकप्रियता निरंतर विकास पर थी इसलिए स्वामी जी को अनेकों कार्यक्रमों में जाना पड़ता था |ज्यादातर कार्यक्रमों में उनकी पत्नी भी साथ जाती थी |उनकी भी खूब जय-जयकार होती थी |आश्रम का कार्य बहुत बढ़ गया था |
ऐसे ही एक दिन सोनू ने अपने आपको एक देवता,एक राजकुमार के रूप में महसूस किया |उसके आस पास अनेकों परियां थीं ,जिनमें से किसी का भी रसास्वादन वह कर सकता था |
दूसरी कोठी पर भी पुलिस का अच्छा -मजबूत पहरा था |उसने किसी एक को चुना और आसानी से उसका उपभोग कर लिया |स्वर्ग का विशेषण सोनू के लिए तो पूर्ण सत्य था |उसे लगा कि यह काम सबसे आसान है चूंकि विरोध करना सबकी आदत नहीं होती |
इस युग में तो विरोधी पक्ष यूँ भी कमजोर हुआ पड़ा है |विरोध के स्वर सुनाई ही नहीं देते |
धीरे -धीरे यह उसकी आदत हो गयी |वह जिसका चाहे शिकार कर सकता था |अखबार जो उससे विज्ञापनों की प्राप्ति के लिए चप्पलें घिसा करते थे और टी.वी.चैनल कोई सेवा पूछा करते थे |उनसे किसी सत्य की गहराई में उतरने की आशा नहीं थी |
एक दिन मधु सोनू की पकड़ में आ गयी |मधु को खुद ऐसी आशा नहीं थी चूंकि बचपन में ही उसका विवाह हो चुका था ,जिसके कारण वह अपने आपको सुरक्षित समझती थी |
उसने सोनू जी का विरोध किया और बहुत कुछ कहा जिसे सुनने का कोई भी स्वेच्छाचारी आदी नहीं होता |
बहरहाल उसके बाद मधु को किसी ने नहीं देखा और राम आसरे भी राम को प्यारा हो गया |
चन्दन सिंह जी और सोनू का साम्राज्य इसी प्रकार निष्कंटक चलता रहा |
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एक दिन उसके पेट में दर्द हुआ |गरीबों के लिए तो पेटदर्द कोई रोग ही नहीं है क्यूंकि उनका दर्द तो भूख के कारण होता है ,थोड़ा सा प्रसाद मिल जाये और दर्द ख़त्म |
सोनू तो राजकुमार था |उसे भी दवा दी गयी लेकिन राहत नहीं मिली |
अब एक फाइव स्टार अस्पताल में इलाज शुरू हुआ |अस्पताल बड़ा था तो डॉक्टर और स्टाफ भी ज्यादा trained था |
उन्नीस-बीस का आराम भी लगा लेकिन खूब कोशिशों के बावजूद राहत वहां भी नहीं मिली |उसे यह ज़रा भी अंदेशा नहीं था कि हर दुआ या बद्दुआ का असर होता है |कबीर दास जी का यह दोहा उसने कभी नहीं पढ़ा था कि-
निर्बल को न सताइये जाकी मोती हांय,मरे पशु की खाल से लोह भस्म हो जाय |
उसे जरा भी अंदेशा नहीं था कि कमजोर और पीड़ित की दुआ अथवा बद्दुआ को चमकने के लिए तेज रोशनी की ज़रुरत नहीं होती |
मधु कोई सती सावित्री नहीं थी लेकिन अपना आत्मसम्मान तो रखती ही थी |सोनू ने उसके आत्मसम्मान और अस्मत को ही चिन्दी- चिन्दी करके उसके वस्त्रों के साथ बिखेर दिया था |
सोनू को लगता था कि उसे किसी ने नहीं देखा |हर स्वेच्छाचारी को यही लगता है लेकिन परम पिता परमात्मा इस जगत के कण कण में विद्यमान है |कोई माने या न माने लेकिन परमपिता परमात्मा से कुछ भी छिपाना संभव नहीं है |परमात्मा के दरबार में किसी साक्षी की दरकार नहीं होती और न्याय अनिवार्य होता है |
इसलिए सोनू को रोग तो मामूली हुआ लेकिन राहत बहुत दूर थी |
ग्लूकोज़ की बोतल से बूँद बूँद उसके शरीर में जाती |खाते समय भी हाथ में सुइयां लगी रहतीं |मांस का स्वाद लिये कई सप्ताह हो गए थे |उसे तेज मसालों से अलग अस्पताल का भोजन दिया जा रहा था |वजन भी बहुत कम हो गया था लेकिन पेट का दर्द ख़त्म नहीं हुआ |सोनू को कोई नया-नकोर रोग था |कोई उसे कोरोना बता रहा था तो कोई एड्स |कोई तपेदिक तो कोई टॉयफाईड |वास्तविक रोग कौन सा था इसका किसी को भी ठीक-ठाक मालूम न था |
मृत्यु किसी रोगविशेष की मोहताज नहीं होती |और प्रभु का न्याय भी किसी दफा अथवा धारा के अंतर्गत नहीं आता |
इस प्रकार सोनू के साथ अजीब सा कुछ हुआ और वह चल बसा |
उसका रोग मेरी कल्पना के अनुसार तो न्यायसंगत नहीं था लेकिन प्रभु के आशय अनुसार पूर्णतः न्यायसंगत था इसीलिए इसे मैं इसे भगवान के न्याय नाम देता हूँ |
- रामकुमार 'सेवक'
