रोटी का सवाल और सत्ता की भूख

सत्तर के दशक में हिंदी में एक फिल्म आयी थी - रोटी |

मनमोहन देसाई की इस फिल्म में शुद्ध मनोरंजन था |जिसे राजेश खन्ना ने अपनी लोकप्रियता के बल पर बुलंदी तक पहुँचाया था | इस फिल्म में भूख की पीड़ा को नाटकीय अंदाज़ में उभारा गया था |

उस समय प्रजातंत्र के प्रति लगभग वैसी ही दीवानगी थी, जितनी इस समय एक खास मज़हब के प्रति है |

पब्लिक यानी जनता पर फ़िल्मकार को बहुत भरोसा था | आनंद बक्शी के लिखे गीतों में नयापन तो नहीं लेकिन एक किस्म का पॉजिटिव जूनून था|


फिल्म कश्मीर की पृष्ठभूमि पर थी लेकिन कश्मीर फाइल्स की तरह एक खास वर्ग के प्रति घनघोर नफरत फ़ैलाने वाली नहीं थी बल्कि उसमें कश्मीरी सुंदरता थी और प्रेम भी |

फिल्म मुख्यतः रोटी के सवाल पर ही केंद्रित थी |इसमें राजनीति की घुमावदार जुमलेबाज़ी नहीं थी बल्कि सीधा साधा मनोरंजन का गणित था |

इसमें एक गीत है, जो आज भी अपनी तरफ खींचता है-इसके बोल हैं-

हीरे - मोती तुमने छुपाये, कुछ हम लोग न बोले 

जब आटा -चावल भी छिपा तो भूखों ने मुँह खोले |

भीख न मांगे, क़र्ज़ न मांगे , यह अपना हक़ मांगती है..

यह पब्लिक है सब जानती है..

अंदर क्या है, बाहर क्या है, यह सब - कुछ पहचानती है |पब्लिक है सब  जानती है |

मुझे यह गीत कल रात से ही याद आ रहा है जबकि गैस सिलिंडर की कीमत एक हज़ार रूपये के किनारे तक आ लगी है और गेहूं की सरकारी खरीद लक्ष्य से काफी कम हुई है |

समाचारों में केंद्रीय खाद्य  सचिव श्री सुधांशु पांडेय के हवाले से बताया गया गया कि खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत राज्यों को गेहूं के स्थान पर चावल भेजा जा रहा है चूंकि भारत सरकार ने इस वर्ष गेहूं की खरीद कम की है | 

केंद्र सरकार ने विपणन वर्ष 2022-23 में रिकॉर्ड 444 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य रखा था , जबकि पिछले विपणन वर्ष में यह लक्ष्य 433.44 लाख टन था।लेकिन गेहूं की खरीद काफी कम हुई -लगभग आधी ,जिसके कारण आने वाले महीनो में दिक्कतें आने की पूरी संभावना है |सूत्रों के अनुसार गेहूं खरीद में यह गिरावट निजी कारोबारियों द्वारा भारी खरीद के कारण हुई है | 

सूत्रों ने बताया कि इस साल 21 अप्रैल तक निजी कंपनियों द्वारा लगभग 9.63 लाख टन गेहूं का निर्यात किया गया है जबकि एक साल पहले इसी अवधि में 1.3 लाख टन गेहूं का निर्यात किया गया था।

वर्तमान सत्ताधारी दल की 2014 और 2019 के बाद 2024  में भी सत्ता प्राप्ति की लालसा इतनी गहरी है कि जनता को लाउडस्पीकर लगवाने और हटवाने के प्रश्नो में इतना उलझा दिया गया है कि लगता है जैसे अयोध्या,मथुरा  और काशी के मंदिरों में जलते दीपक ही उसके जीवन में उजाला ले आएंगे |साम्प्रदायिकता की अफीम इतनी गहरी सुंघाई गयी है कि महंगाई कोई मुद्दा ही नहीं है |पेट्रोल का दाम 100 /-प्रति लीटर से ज्यादा है और रसोई गैस का दाम 1000 /-प्रति सिलिंडर से छूता हुआ |

गर्मी के मौसम में नीबू की शिकंजी पीने का शौक था लेकिन नीबू भी अब पहुँच से दूर हो गया है | 

दूसरी खबर इससे भी ज्यादा खतरनाक है क्यूंकि खबर आयी है कि विश्व बैंक के कमोडिटी मार्किट आऊटलूक ने अनुमान लगाया है कि इस वर्ष गेहूं की कीमतों में चालीस प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि होगी जो करीब रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचेगी |

सवाल यह भी है कि क्या बड़े व्यापारी ऐसे ही समय के लिए गेहूं इकठ्ठा कर रहे हैं और बाद में बढे हुए दामों पर बेचेंगे |

सोचने की बात है कि जनता का ख्याल तो अंततः सरकार ही रखती है और यह उसका सबसे बड़ा काम भी है क्यूंकि इस काम के लिए वह जनता से मनमाने टैक्स वसूलती है और जनता राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को अपनी पीठ उपलब्ध करवाती है |

इस दृष्टि से जनता को अपनी पीठ और मजबूत करनी चाहिए चूंकि आने वाले समय में गेहूं भी उसकी पहुँच से दूर हो सकता है और रोटियां google से डाउनलोड नहीं होती और न ही धर्मस्थानों से लाउडस्पीकर हटवाने से मिलती है | 

जरा किसान आंदोलन के दिनों को याद कीजिए जब किसान इसी सच्चाई की तरफ हमारा ध्यान दिला रहे थे कि अनाज मंडियों में यदि गेहूं की खरीद बंद हो गयी तो व्यापारी मनमाना दाम वसूलेंगे और खाद्यान्न जनता की पहुँच से दूर हो जायेंगे |कृषि के वे कानून तो शासन ने वापस ले लिए लेकिन खाद्यान्न का संकट तो आ सकता है |   

भूख एक ऐसा सत्य है जो इंसान के लिए हर मज़हब और स्वार्थ से ऊपर है ,इसलिए भूख मिटाने की व्यवस्था किसी भी शासन की सर्वोच्च वरीयता होनी चाहिए |  

- आर.के. प्रिय