इस प्रकार की क्रांति के मसीहा थे - बाबा गुरबचन सिंह जी


तब मैं छठी कक्षा में था जब मुझे उनके दर्शन हुए, दिल्ली के रामलीला मैदान में | 26वें वार्षिक सन्त समागम में 13 अक्टूबर 1973 को | उस समय सबकी नमस्कार चरणों में ही होती थी | उस क्षण को मैं भूल नहीं सकता जब उन्होंने मेरे सिर पर दो बार हाथ रखा |मैं अपने पिता(श्री चिरंजी लाल )जी के साथ मुराद नगर से आया था | 

उनके प्रति एक बालसुलभ श्रद्धा थी जो आकर्षित करती थी | बाद में उनके बारे में पर्याप्त गहराई से जानने का मौका मिला |

क्रान्तिकारी के नाम से लोग अक्सर घबराते हैं क्यूंकि गरीबों और अमीरों का फासला कम करने के लिए अक्सर अहिंसा को बलि चढ़ा दिया जाता है |


बाबा गुरबचन सिंह जी ने जीने का वह ढंग दिया जिससे गरीबी - अमीरी में कोई फासला नहीं रहा |बाबा जी ने भक्ति के साथ-साथ सादगी और ईमानदारी की शिक्षा दी जिससे, जो कभी गरीब होते थे वही अमीर हो गए |इस प्रकार उन्होंने आध्यात्मिक क्रांति की |   


बाबा गुरबचन सिंह जी-गरीबों के ऐसे  मसीहा थे, जिन्होंने उनके जीवन में चहुमुखी क्रांति ला दी |


बाबा गुरबचन सिंह जी के व्यक्तित्व में सबसे बड़ी चीज जो मुझे नज़र आती है,वह है उनकी संकल्प शक्ति |एक बार उन्हें पता चल जाए कि वे सही रास्ते पर हैं तो उस रास्ते वे रत्ती भर भी हिलते नहीं थे |तभी मैंने (एक बार , मानव एकता समागम में,बाबा हरदेव सिंह जी की हुजूरी में ) मूल कविता से पहले ये चार पंक्तियाँ पढ़ीं थी-


फौलादी संकल्पों का था नाम -बाबा गुरबचन |

एकता और प्रेम का था काम -बाबा गुरबचन |

प्रेम से ही वे जिये ,जब तक रहे संसार में 

ज़िंदा है हर इक सांस में पैग़ाम -बाबा गुरबचन |


इन पंक्तियों में मुझे कुछ विशेषता नहीं लगती क्यूंकि किताब या साहित्य तो छाया मात्र है वास्तविकता तो वह जीवन है ,जिसे देखकर ये शब्द लिखे गए |


आजकल बाबा गुरबचन सिंह जी की बहुत चर्चा हो रही है क्यूंकि उन का बलिदान दिवस करीब ही है |लेकिन मेरा लेखन इस कारण से नहीं है क्यूंकि एक प्रेरक व्यक्तित्व को जब हम किसी खास दिन से जोड़ देते हैं तो वह मात्र एक परंपरा अथवा कर्मकांड हो जाता है |


सिर्फ इसलिए उनके जीवन की चर्चा की जाए कि उनका बलिदान दिवस आने वाला है ,कर्मकांड के सिवा कुछ भी नहीं |


हाँ इसका एक सकारात्मक पक्ष यह हो सकता है कि कम से कम इसी बहाने उनके जीवन की चर्चा हो जाए लेकिन यह युग उन सिद्धांतों के अनुकरण का नहीं है क्यूंकि बाबा गुरबचन सिंह जी आम और गरीब आदमी की तकलीफ जानते थे और उन्हें समर्थ बनाना भी |लाखों का काम वे सैकड़ों में कर लेते थे चूंकि आधार से जुड़े थे और समस्या की जड़ को ही ख़त्म करते थे |अब तो भव्यता का दौर है,सादगी तो बीत चुका इतिहास हो चुकी है लेकिन यह तो ज़माने की रफ़्तार है जिसे मोड़ने की क्षमता शायद ही किसी में हो |  

बाबा गुरबचन सिंह जी के पिता और सतगुरु, बाबा अवतार सिंह जी किसी भी कर्मकांड से दूर थे इसलिए लाखों लोगों को अपने पीछे चला पाए |

युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी निरंकारी (पुस्तक) में लेखक पूर्ण प्रकाश साक़ी जी ने लिखा है कि 17  सितम्बर 1969  को जब बाबा अवतार सिंह जी ने शरीर छोड़ा तो कुछ परिजनों और अनुयाइयों का यह अप्रत्यक्ष ध्यान था कि बाबा अवतार सिंह जी के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए चन्दन की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाए |यह सब उन की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता था क्योंकि बाबा अवतार सिंह जी अपने आपको किसी धर्म-सम्प्रदाय के बंधन में बांधने की बजाय एक ऐसी क्रिया का अनुकरण करना चाहते थे जो विशाल सोच को प्रदर्शित करे और उन्हें सबका अपना सिद्ध करे |


बाबा गुरबचन सिंह जी ने बाबा जी की इस इच्छा को पूर्ण करते हुए निर्णय किया कि बाबा अवतार सिंह जी का अंतिम संस्कार विद्युत् शव दाह गृह में किया जाए ताकि किसी धर्म के बंधन से बंधने की बजाय युगपुरुष का जीवन सबके सांझे गुरु-पीर-पैगम्बर का प्रतिनिधि-प्रतीक बन सके | 


बाबा गुरबचन सिंह जी अंदर-बाहर से प्रगतिशील थे इसीलिए एक ऐसा विज़न दे पाए जो गुरु वाला विज़न था |


13 अप्रैल 1978 को अमृतसर के रेलवे स्टेडियम के मैदान में हुए मानव एकता सम्मेलन (समागम) में हिंसा हो चुकी थी |कुछ लोग हमारे पक्ष के ख़त्म हो गए और कुछ विरोधी पक्ष के |जैसे कि आमतौर से पूछा जाता है कि आपके कितने मरे और विरोधी कितने ?


बाबा गुरबचन सिंह जी ने उत्तर में यह नहीं कहा कि उनके इतने थे और हमारे इतने बल्कि जो जवाब दिया वह एक इतिहास रच गया, उन्होंने कहा - वे सब मेरे ही थे |


यह एक दृष्टिकोण है जो जोड़ने की क्षमता रखता है और अपने ऐसे दृष्टिकोण के कारण ही वे युगप्रवर्तक बन पाए |


चूंकि उनका जीवन हमारे दिलों में अंकित है इसलिए वे हमें सदैव याद आते रहेंगे |उनके जीवन के अन्य पक्ष भी मेरी स्मृतियों में घूम रहे हैं, मालिक कृपा करे कि यथसमय उन्हें भी लिख सकूं -धन निरंकार जी | 

रामकुमार 'सेवक'