बचपन में हमारे गांव की अनेक दुकानों में मैंने ऐसे कैलेंडर लटके हुए देखे हैं ,जिनके बारे में हमारे माता-पिता बताते थे कि यह कैलेंडर जैसी करनी वैसी भरनी का है |ये कैलेंडर देखकर हमारे मासूम मन भय से काँप जाते थे |
मासूम के लिए वह कैलेंडर ही काफी है लेकिन शातिरों के लिए तो अगर वैसी कोई फिल्म भी बन जाये तो भी फर्क नहीं पड़ेगा क्यूंकि ज्यादातर लोग मानते हैं कि परमात्मा कहीं है ही नहीं |
यह दूसरी बात है कि जब कोई ऐसी समस्या पड़ती है जिसका समाधान नहीं सूझ रहा हो तो वो शनि देव से लेकर हनुमान जी के मंदिर तक में दौड़ लगा आता है |यही वो समय होता है जब उससे कुछ भी कराया जा सकता है |पण्डे-पुरोहित और तांत्रिक ऐसे समय में उसे आराम से उल्लू बना लेते हैं और अपना व्यवसायिक विकास कर लेते हैं |
परमात्मा के प्रति यदि आस्था ईमानदारी से हो तो वह डरता है कि प्रभु मुझे देख रहा है|वह अपराध से भी यह सोचकर दूर रहता है कि यहाँ के न्यायालय से यदि मैं छूट भी गया तो भी प्रभु के न्यायालय से मेरा बचना असंभव है|इस भय से वह बुरे काम और पाप करने से बचता है| इससे पुलिस की समस्या भी कुछ कम होती है|
लेकिन आज प्रभु का नाम सिर्फ जुबान तक सीमित है जिस कारण मन में प्रभु का भय रह नहीं गया है|जब उसे थोडा-बहुत भय लगता है तो थोड़ी देर के लिए पावन ग्रंथो का पाठ कर लेता है या किसी धर्मस्थल पर जाकर माथा टेक आता है|भय थोड़ा ज्यादा हुआ तो तीर्थ करने निकल पड़ता है|
दो-चार दिन घूम-फिरकर यह एहसास लेकर आता है कि अब निश्चय ही प्रभु मुझसे खुश हो गए होंगे इसलिए अब बे-ईमानी करने में क्या संकोच करना है|घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या इसलिए पाप से भय कैसा?
यह एक बड़ा कारण है पाप और अपराध बढ़ने का |पुलिस और क़ानून इसे रोक नहीं पायेंगे|इस अवस्था में एक ही अंतिम समाधान दिखाई देता है कि हर इंसान ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके परमात्मा को सर्वव्यापक समझे |इस अवस्था में इंसान कुछ भी बुरा कर नहीं पायेगा |
दूसरी चीज़ है -मानव का मानव के प्रति प्रेम |यह भी अब ख़त्म हो चला है क्यूंकि जो खुलेआम हिंसा करने के नारे लगाते थे आजकल विशिष्ट व्यक्तियों में शुमार हैं |
लेकिन सत्य यह है कि हम सिर्फ अपनी ज़रूरतों से प्रेम करते हैं|ज़रूरतों को पूरी करने में जो सहायक होते हैं वो हमारे सबसे बड़े प्रेमी हैं |
हमारी ज़रूरतों में सबसे बड़ा स्थान पदार्थों का है मनुष्यों का नहीं |घड़ी उतारने के लिए आदमी कलाई ही काट देता है|सोने के कुंडल के लिए उन्हें पकड़कर खींचता है और कान कट जाता है |ऐसा करते हुए उसे बिलकुल भी भय नहीं लगता |इससे साफ़ है कि प्रेम के मामले में भी आदमी फेल है|
दोनों नहीं तो कम से कम एक तो रहा होता तो भी बचने की गुंजाइश थी लेकिन आज जब कि दोनों ही नहीं हैं - न प्रभु का भय और न ही मानव से प्रेम तो आदमी को कहर की आग में जलने से कौन बचायेगा?
जहां तक सत्गुरु अथवा मार्गदर्शक का प्रश्न है -सत्गुरु सही मार्ग दिखाता है-लेकिन चलने का काम तो शिष्य जेठवा मानव को स्वयं यानी कि हमें ही करना होगा |इसका कोई विकल्प नहीं है |आपका क्या ख्याल है,कृपया लिखें ?धन्यवाद
- रामकुमार सेवक


