स्वर के सतरंगी इंद्रधनुष की गरिमामयी साम्राज्ञी थीं - लता मंगेशकर

आज सुबह अख़बार में लिखा है - अलविदा लता मंगेशकर..साथ ही यह भी लिखा है कि उन्होंने 36 भाषाओँ में तीस हजार से ज्यादा गाने गाये |

इन गानो में विभिन्न रंग हैं |इनमें अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम जैसे भजन हैं तो आएगा आने वाला...जैसे रहस्य में लिपटे गीत भी है |

सुन साहेबा सुन,प्यार की धुन है तो यह क्रान्तिकारी स्वर भी है -

मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी |

प्रेम रोग फिल्म का गीत भँवरे ने खिलाया फूल ,फूल को ले गया राजकुंवर ---इस गीत में हंसी के फूल बिखरे हैं और यह हंसी की आवाज़ गाये हुए गीत से जरा भी कम नहीं लगती क्यूंकि यह हंसी लता जी की सतरंगी आवाज़ में है |    

27  जनवरी 1963 का दिन कौन भूल सकता है |भारतीय जवानो की शहादत को अक़ीदत के फूल चढ़ाते हुए , शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गीतकार प्रदीप जी ने जो गीत लिखा -इसे पहली बार सुमधुर गायिका लता मंगेशकर जी ने पडित जवाहरलाल नेहरू के समक्ष दिल्ली में प्रस्तुत किया |गीतकार ने ह्रदय का भाव  लिखकर शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की |

सी .रामचंद्र ,जिन्हें चितलकर के  नाम से भी जाना जाता था ,ने गीत को संगीत दिया |स्वर साम्राज्ञी लता जी ने गीत गाया और समारोह में उपस्थित पंडित जवाहर लाल नेहरू भावुक हो गए ,इस प्रकार गीतकार ,संगीतकार और गायिका की मेहनत सफल हुई |

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि-हर कार्यक्रम में वे यह गीत गाती आयी हैं क्यूंकि अगर यदि यह गीत उनके गाने से रह जाए तो लोग मांग करते हैं कि - दीदी - ऐ मेरे वतन के लोगो ---गाइये |    

कम ही पाठक जानते होंगे कि रामचंद्र चितलकर लता को एकतरफा प्रेम करते थे | 

मन ,वचन और कर्म के संतुलन का सुन्दर परिणाम इस गीत में देखने को मिला |गीतकार के मन ने सोचा और लिखा ,संगीतकार ने धुन बनायीं और गायिका ने गाया |

प्रधानमंत्री की गरिमामय उपस्थिति से  लता जी की प्रतिभा की लोकप्रियता राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हुई |

नेहरू जी ने लता जी को याद किया तो महबूब साहब उन्हें उनके पास ले गए और परिचय कराते हुए बोले-यह है हमारी लता |पंडित जी ने लता को गले लगाते हुए कहा कि-इस लड़की ने इतना अच्छा गाया कि मुझे भावुक कर दिया | 

आज सुबह अख़बार देख रहा था जिसमें लता मंगेशकर ही छायी हुई थीं क्यूंकि कल ही उन्होंने शरीर छोड़ा |देश भर के शोक को अखबार प्रकट कर रहा था |

इसी अख़बार में अमेरिका और ब्रिटेन के  दूतावासों ने भी अपने लोगों की ओर से संवेदना प्रकट की थी |पाकिस्तान,बांग्लादेश और श्रीलंका के लोगों ने भी अपने सम्मान व श्रद्धा को अभिव्यक्त करते हुए कहा किया कि उपमहाद्वीप ने एक महान गायिका को खो दिया |इस दृष्टि से देखें तो उनका भारतरत्न सम्मान विश्वरत्न के रूप में विस्तृत हो गया और सिद्ध हो गया कि कला की कोई सीमा रेखा नहीं होती |  

मैने लता जी के गायन की विविधता को हिंदी गीतों में गहराई से महसूस किया है |इन गीतों में ऐ मालिक तेरे बन्दे हम जैसे अनेक मर्मस्पर्शी भजन भी हैं और मेरे ख्वाबों में जो आये ,आके मुझे छेड़ जाये जैसे रोमांटिक गीत भी |

मन रे तू काहे न धीर धरे --गीत ऐसा भजन है जिसे लता जी भी बहुत पसंद करती थीं |

लता के नाम के साथ पहले मंगेशकर के स्थान पर हर्दिकर लिखा जाता था |मंगेशकर शब्द की पृष्ठभूमि बताते हुए अख़बार कहता है कि-मास्टर दीनानाथ मंगेशकर (लता जी के पिताजी )का पैतृक गाँव मंगेशी (गोवा) में था |

इस प्रकार लता और उनकी तीन  बहनो (आशा ,उषा ,मीना )तथा एक भाई हृदयनाथ के नामो के साथ मंगेशकर उपनाम जोड़ा गया | 

लता मंगेशकर की पहचान थी उनकी आवाज़ और वो हमेशा रहेगी| फिल्म किनारा के इस गीत में उन्होंने आवाज़ को अपनी पहचान बताया और यह सच्चाई बयान की -

नाम गुम जायेगा,चेहरा भी बदल जायेगा ,

मेरी आवाज़ ही पहचान है ....गर याद रहे |

उनकी यह पहचान किसी भी समयावधि में सीमित नहीं है |

लता जी का जन्म इंदौर में 1929 में हुआ था |हम आपके हैं कौन जब सिनेमाघरों में आयी तो लता जी उम्र के 60 वर्ष पूरे कर चुकी थी इसके बावजूद पूरी ठसक से गाया -दीदी तेरा देवर दीवाना -साठ पार की उम्र में भी सोलह की खनक -यह थी उनकी उपलब्धि |

मैं अक्सर यह भजन सुना करता हूँ-तुम्हीं हो माता,पिता तुम्हीं हो ,तुम्हीं हो बंधु सखा तुम्हीं हो |यह एक प्रार्थना है ,जो बच्चों पर फिल्माई गयी है लेकिन इस प्रार्थना को लता मंगेशकर ने इस खूबी से गाया है कि उनकी आवाज़ बच्चों पर जैसे चिपक गयी है |इस प्रकार लता जी किसी भी उम्र वालों के लिए सफलता से गा देती थीं |  

राजसिंह डूंगरपुर क्रिकेट के महान खिलाडी थे |वे लता के भाई हृदयनाथ मंगेशकर के दोस्त थे इसीलिए लता से उनका लगाव था लेकिन वे राजपरिवार से थे और परंपराओ  के अनुसार राजपरिवार में ही विवाह कर सकते थे |

लता जी को अपनी बहनो और भाई को संरक्षण देना था इसलिए यह प्रेम भी किसी सुखद परिणीति तक नहीं पहुँच सका |

और यह सत्य दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि -

दीदी रहेगी तो उनके दीवाने देवर भी रहेंगे |

जेठानी कहेगी - अपने देवर की बारात लेके लो चली मैं |  

ये अवसर अब कुछ कम हो रहे हैं चूंकि एकल परिवारों में इन सब रिश्तों के इंद्रधनुष की कोई गुंजाईश नज़र नहीं आती लेकिन भारतीय पारिवारिक परंपरा की जड़ें बहुत गहरी हैं |

एकल परिवारों का चलन कोई सिर्फ अब ही तो शुरू नहीं हुआ है |मैं जब छोटा बच्चा था तब लोगों से यह गीत सुनता था कि-अपनी अपनी बीवी पे सबको गुरूर है ,जैसी भी हो बीवी ,शोहर के लिए हूर है |यह गीत फिल्म दो रास्ते का है ,जो वर्ष 1970 के आस -पास आयी थी | उसमें संयुक्त परिवार के  विघटित होने की समस्या को दिखाया गया था |

इसके बावजूद थोड़ी मात्रा में संयुक्त परिवार बचे रहे हैं और पारिवारिक फिल्में भी आती रहीं हैं | नब्बे के दशक में जो फिल्म आयी-हम आपके हैं कौन |इसमें शहर के वातावरण में पारिवारिक प्रेम की प्रतिष्ठा की गयी थी |कहानी में पुराने रिश्तों के गौरव की प्रतिष्ठा ने लोगों को प्रभावित किया |इसके गीतों ने भी लोगों के दिलों को छुआ और  सिनेमाघरों में पुरानी रौनक लौट आयी |

उन्होंने लगभग तिरानवे वर्ष की आयु पायी |इस अंतराल में जिन गीतों को उन्होंने स्वर दिया ,वे गीत उन्हें कभी मरने नहीं देंगे |उन्होंने बहुत खूबी और गायन कला के प्रति समर्पण भाव से बच्चे से लेकर सत्तर वर्ष के बुजुर्ग तक के दिलों में अपने लिए जो स्थान बनाया ,वह उन्हें सदैव अमर रखेगा |

- रामकुमार 'सेवक'