गोविन्द अनुज की गज़लें -

चमचे लोग 

कार्यवाही से छूट रहे हैं ,चुगलखोर और चमचे लोग 

तुमको -हमको लूट रहे हैं -चुगलखोर और चमचे लोग 


साहब आँखें बंद किये हैं और कान के कच्चे हैं,

सबकी मिटटी कूट रहे हैं ,चुगलखोर और चमचे लोग 


सत्य पराजित कब होता है बदली में छिपता भर है,

क्रमशः क्रमशः टूट रहे हैं,चुगलखोर और चमचे लोग 


अच्छे लोग करेला जैसे कड़वे लगते साहब को,

गंगाजल का घूँट रहे हैं,चुगलखोर और चमचे लोग 


साहब को जब जाना होता ,कहीं काम के दौरे पर 

मौजे ,टाई ,सूट रहे है,चुगलखोर और चमचे लोग 

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दरोगा जी 

अब जब जैसा हुकुम आपने दिया दरोगा जी |

बिना ना नुकर हमने वह सब किया दरोगा जी |


आप शौक़ से रंगरलियों में डूबें इतरायें,

हमने तो अब अपना मुँह सी लिया दरोगा जी |


सच कितना दुश्वार कर दिया दुनिया ने जीना 

कदम कदम पर कुंठा का विष पिया दरोगा जी 


आप रात भर जिसके क्वारे अंगों से खेले ,

सुबह खा लिया उसने घर संखिया दरोगा जी | 

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आशा है 

चारों ओर निराशा है ,

सिर्फ तुम्हीं से आशा है |


कहीं खो गया है इंसान, 

हमने खूब तलाशा है |


पीड़ाएँ हैं कई गुनी ,

पर सुख यार ज़रा सा है |


मेहनतकश को बात न पूछ ,

तन भूखा और प्यासा है |


दौड़ रहे रोटी के पीछे, 

कैसा यार तमाशा है |


तुमको सुन्दर गीत लगा ये ,

हमने दर्द तलाशा है |


फैले हाथ मांगने को,

मन लेकिन दुर्वासा है  | 


- गीत गोविन्द

सिद्धेश्वर कॉलोनी, शिवपुरी (म.प्र.) 473551