उत्तर प्रदेश का राजनीतिक इतिहास और राष्ट्रीय एकीकरण नीति

ज सुबह मुझे एक शानदार इतिहास ज्ञात हुआ जिसके पीछे राम मनोहर लोहिया साहब की यह नीति थी कि उत्तर प्रदेश से तमिलनाडु का आदमी चुनाव लड़े और उत्तर प्रदेश का आदमी तमिलनाडु या केरल से चुनाव लड़े |इसे वे राष्ट्रीय एकीकरण नीति कहते थे | राष्ट्रीय एकीकरण की यह नीति थी बहुत रोचक |

यह एक रोचक विचार था और कहते हैं कि नेहरू जी के दिमाग की उपज था |यद्यपि राम मनोहर लोहिया जी नेहरू के विरोधी और ग़ैरकांग्रेसस्वाद के प्रवर्तक थे लेकिन उस समय राजनीतिज्ञों की सभ्यता और संस्कृति गर्व करने लायक थी |

अभी तो राजनीतिक विरोध को भी शत्रुता की श्रेणी में रखा जाने लगा है लेकिन उस समय विरोध को मौलिक अधिकार माना जाता था और विरोधी से भी सद्भावनापूर्ण व्यवहार करने की गौरवशाली परंपरा थी |

यह आकर्षक कल्पना इसलिए पैदा हुई क्यूंकि नेहरू जी का प्रभाव पूरे भारत में था |वे ऐसा कर भी सकते थे |यह बहुत पुरानी बात नहीं है जबकि श्रीमती इंदिरा गाँधी ने चिकमंगलूर से चुनाव लड़ा था लेकिन वे सामान्य परिस्थितियां नहीं थी क्यूंकि देश में जनता पार्टी की सरकार थी और यह सरकार इंदिरा जी को अनेक कारणों से दण्डित करना चाहती थी |इसी प्रकार उन्होंने एक समय में आंध्र प्रदेश के मेडक से भी चुनाव लड़ा था लेकिन इसके पीछे राष्ट्रीय एकीकरण का कोई विचार नहीं था |

 आज सुबह मैं उत्तर प्रदेश के राजीतिक इतिहास पर वरिष्ठ पत्रकार श्री शम्भुनाथ दुबे का लेख पढ़ रहा था ,जिसमें ये तथ्य पढ़ने को मिले कि केरल के पालघाट जिले की दो बहने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हुईं और इस प्रकार डॉ.राममनोहर लोहिया की राष्ट्रीय एकीकरण नीति की व्यवहारिकता सिद्ध की |जबकि नेहरू जी इस विचार की उपयोगिता को महसूस करते हुए अपने एक सहारनपुर जिले के समर्थक  को कर्णाटक के  तुमकुर लोकसभा सीट से चुनाव जितवा चुके थे |

पंडित जवाहरलाल नेहरू को आज के वक़्त में खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है ताकि कांग्रेस को ख़त्म किया जा सके |यह तब है जबकि उनकी प्रतिष्ठा विश्व स्तर पर थी |उन्होंने  मिस्र के राष्ट्रपति नासिर और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो के साथ मिलकर गट निरपेक्ष आंदोलन को स्थापित किया |

दुनिया जब अमेरिका और रूस के दो गुटों में बँटी हुई थी तब उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को खड़ा किया और अनावश्यक खेमेबाजी से बचे |खैर लोग चाहे उन्हें कुछ भी कहें लेकिन राष्ट्र्रीय एकीकरण का यह विचार निश्चय ही हमें प्रभावित करता है |

यह आज कल्पना ही की जा सकती है कि केरल के पालघाट की दो बहने सरस्वती अम्माल अपनी बहन अलमेलु अम्माल के साथ   1958-59 के आस पास उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हों और मंत्री भी बने |जबकि केरल और उत्तर प्रदेश में सिर्फ भाषाओँ की ही भिन्नता नहीं है बल्कि धर्म.जाति और संस्कृति की भी पर्याप्त भिन्नता है | 

यद्यपि वर्तमान दौर में हेमा मालिनी ,जया बच्चन और जया प्रदा भी उत्तर प्रदेश में ही सक्रिय रही हैं लेकिन इन तीनो का फ़िल्मी इतिहास उनकी मदद करता है |इस प्रकार इन तीनो की उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के पीछे राष्ट्रीय एकीकरण का कोई सिद्धांत नहीं है जबकि सरस्वती अम्माल और उनकी बहन की राजनीतिक सक्रियता असामान्य है |वह दौर भी सभ्यता और सिद्धांतों का था | आज की राजनीति के सन्दर्भ में सोचते हैं तो ज्ञात होता है कि उत्तर प्रदेश में आज जिस तरह की जातिवादी राजनीति चलने लगी है ,उसमें क्या कोई यह कल्पना कर सकता है  कि कोई ऐसा व्यक्ति यहाँ की राजनीति में जम पायेगा ,जिसकी जाति,धर्म और समुदाय अज्ञात हो |जिसे यहाँ की भाषा तक न आती हो लेकिन वह दौर ऐसा था जिसमें राजनीति में भी मानवीय मूल्य हावी थे |

उस समय राजनीति का अर्थ जनसेवा हुआ करता था |सेवा तो कोई भी कर सकता है |आज राजनीति का अर्थ धन ,लाभ और भाई-भतीजावाद हो गया है |सिद्धांत और नैतिकता का प्रतिनिधित्व करता हुआ कोई झंडा नज़र नहीं आता |                          

राजनीति सत्ता प्राप्ति की लड़ाई है जो इस ज़माने में खुलकर लड़ी जा रही है |उत्तर प्रदेश राजनीतिक दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है |इस दृष्टि से यहाँ के चुनावों का सबसे ज्यादा महत्व है | 

इसका एक राजनीतिक इतिहास भी है |स्वतंत्र भारत के अधिकांश प्रधानमंत्री यहीं से निर्वाचित होते रहे हैं |इस दृष्टि से यहाँ के चुनावों का अत्यधिक महत्व है |शायद इसी महत्व को स्वीकार करते हुए श्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के होते हुए भी यहाँ के वाराणसी क्षेत्र की लोकसभा सीट को चुना और दो बार यहीं से सदस्य निर्वाचित हुए हैं |

यहाँ मुझे उड़ीसा के प्रसिद्द नेता बीजू पटनायक याद आ रहे हैं,जिन्होंने कभी कहा था कि यदि मैं उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ होता तो देश का प्रधानमंत्री बन सकता था |

यह पढ़कर मुझे ख़ुशी नहीं हो रही है जबकि मैं भी उत्तर प्रदेश का ही रहने वाला हूँ |

इसका मूल कारण तो यह है कि भारत में किसी भी राज्य की किसी भी लोकसभा सीट का महत्व कम या ज्यादा नहीं है क्यूंकि भारतीय संविधान सभी राज्यों अथवा व्यक्तियों को एकसमान मानता है |किसी स्थान विशेष में पैदा होने के कारण किसी व्यक्ति के अधिकारों में कमी या बढ़ोतरी नहीं हो सकती |मोरारजी देसाई देश के पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जबकि वे गुजरात से थे |

पी वी नरसिंह राव् भी देश के महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री रहे,जिन्होंने देश को आर्थिक मजबूती देने के लिए विशेष भूमिका निभाई  और देश के लिए उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभायी |वे आंध्र प्रदेश के थे |

उत्तर प्रदेश राज्य की विधान सभा के लिए चुनावों की गतिविधियां शरू हो गयी हैं |उत्तर प्रदेश के सत्तारूढ़ दल के अनेक मंत्री और विधायक पाला बदलकर अन्य राजनीतिक दलों में सम्मिलित हो रहे हैं |इसमें कुछ भी आश्चर्य करने वाली बात नहीं है चूंकि राजनीति का लक्ष्य यदि सत्ताप्राप्ति ही रह जाये तो दलबदल अवश्यम्भावी है |

लेकिन इसी उत्तर प्रदेश ने राजनीति का वह दौर भी देखा है जब दक्षिण के राज्यों के लोगों ने यहाँ की मिट्टी को अपना जाना और माना और राजनीति के नए -नए मुकाम हासिल किये |   यह भाव राष्ट्रीय एकता को आज भी दृढ  करता है |                      

- आर.के.प्रिय