वही मन मंदिर होता है, जिसमें भगवान का वास हो | - निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी

सुनाम (पंजाब) में एकत्रित हज़ारों श्रद्धालुओं को मानवता व विश्वबंधुत्व का सन्देश देते हुए निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी ने पंजाबी भाषा में किये गए अपने प्रवचनों में परमात्मा को अपने जीवन का आधार बनाने के लिए कहा |बाबा जी का दृष्टिकोण बहुत उदार था |बेशक पंजाबी उनकी मातृभाषा थी परन्तु हर भाषा से उन्हें अपनत्व था |उन्होंने ज्यादा प्रवचन हिंदी में किये लेकिन महाराष्ट्र में मराठी भाषा में कुछ वाक्य वे बोल देते है |आंध्र में तेलगु ,नेपाल में नेपाली ,राजस्थान में राजस्थानी ,हरियाणा में हरियाणवी का निःसंकोच प्रयोग करके बाबा जी जनमानस को यह सन्देश दे देते थे कि हर भाषा इंसान को इंसान से जोड़ने के लिए है |

बाबा जी ने पंजाब के श्रद्धालुओं से संवाद करते हुए वही सन्देश दिया ,जो मानव मात्र के लिए उपयोगी है |बाबा जी ने कहा कि - स्थान -स्थान पर ऐसे सज्जनो के सहयोग मिल रहे हैं,जो पंजाब और देश की सेवा में अपने योगदान दे रहे हैं |ऐसे सज्जन हृदय से मानवता की ज़रुरत महसूस करते हैं कि इसी से मानव मात्र का भला होगा |ऐसे लोग जानते हैं कि जलते हुए संसार को आज इसी की ज़रुरत है क्यूंकि दिन ब दिन दुनिया में मानवता की कमी होती दिखाई दे रही है |इससे मानवता कमजोर होती जा रही है |प्यार की कमी होती जा रही है |

दया भावना लुप्त होती दिखाई दे रही है |दिल निर्दयता वाले बन चुके हैं |ऐसे वातावरण में जो सज्जन प्रवृत्ति वाले हैं,वो सहयोग के ज़ज़्बे रखते हैं |क्यूंकि उनका भी यही मक़सद होता है कि संसार में इंसानियत फैले जिसकी कोशिश मिशन सदा से करता आ रहा है |भारत में जिस जिस स्थान पर जाने का मौका मिलता है इसी उद्देश्य के लिए योगदान दिए जा रहे हैं |

हर नए वर्ष में संकल्प 

जब नया वर्ष शुरू होता है,जनवरी माह चढ़ता है,वहीं से भिन्न भिन्न प्रांतों की यात्रायें शुरू हो जाती हैं |इस वर्ष भी भारत के विभिन्न राज्यों में जाने के मौके मिले और फरवरी में दुनिया के कुछ देशों में जाने के मौके मिले |वहां भी ऐसी ही भावनाओं से युक्त होकर योगदान दिये जा रहे हैं | जून -जुलाई -अगस्त में भी कुछ देशों  की यात्रायें करने के मौके मिले,जहाँ कहा गया कि परमात्मा के साथ एकत्व की ज़रुरत है   |इससे हमारे मनो में अपनत्व पैदा होता है |आपसी एकता मजबूत होती है |मानव एकता के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में हम आगे बढ़ते हैं |

इक ओमकार हम कहते हैं |इक तू ही निरंकार हम कहते हैं ,जिसके बारे में कहा जाता है-

सब आये इस एक से,डाल-पात ,फल-फूल .कबीर पाछे क्या रहा,गह पकड़ा जब मूल | 

आगे भी कहते हैं-इक दी खलकत सारी ए |एक से ही सारा संसार उपजा है |एक पर केंद्रित होने से एकत्व होता है |

एकत्व से अपनत्व 

एकत्व से ही अपनत्व का भाव पैदा होता है |फिर सारे अपने महसूस होते हैं |फिर सही अर्थों में यह भाव उजागर होता है-

न कोई बैरी ,ना ही बेगाना ,सगल संग हमको बनी आयी |

यह हमारी अवस्था,हमारा दृष्टिकोण बन जाता है |और उसी पर आधारित हमारे व्यवहार हो जाते हैं |हमारे व्यवहार अपनत्व वाले इसलिए नहीं बन पाते क्यूंकि एकत्व में हम स्थित नहीं हो पाए हैं |इस एक परमात्मा को एक जाना नहीं है इसलिए मानना तो दूर की बात है | इसीलिए दीवारें और दरारें हैं ,इसीलिए बंधनो में जकड़े हुए हैं |इसीलिए संसार के वातावरण को खिंचाव वाला बनाते जा रहे हैं |सांस ऐसे ले रहे हैं जैसे  दूषित है |प्रदूषण है वैर -ईर्ष्या -नफरत का,लोभ-लालच का ,अहम्-अभिमान का |ऐसी अब -ओ-हवा में हम यह समय बिता रहे हैं |

जो एकत्व के भाव से युक्त हैं--

ऐसे वातावरण में भी जो एकत्व के भाव से युक्त हो जाते हैं,उनके लिए कोई तिफरके नहीं होते |उनके लिए कोई बेगाना नहीं होता |वे सारे संसार के लोगों को अपना जानते और मानते हैं |चाहे टोपी वाला हो या पगड़ी वाला |चाहे काले रंग का हो या गोरे रंग का |चाहे पंजाबी,सिंधी या गुजराती बोलता हो या फ़ारसी या कोई और भाषा  बोलता हो |उसका पहनावा चाहे जैसा हो,किसी भी संस्कृति में जन्मा -पला बढ़ा हो,एक परमात्मा की संतान है |

वसुधैव कुटुंबकम का व्यवहारिक पक्ष 

वसुधैव कुटुंबकम वेदों का उद्घोष हम पढ़ते सुनते आ रहे हैं लेकिन इसको क्रियात्मक स्वरुप कौन देता है |कहना-सुनना आसान है -वसुधैव कुटुंबकम |सारी वसुधा (पृथ्वी )पर बसने वाले एक कुटुंब का हिस्सा हैं,परिवार का हिस्सा हैं |लेकिन मानता कौन है ? कौन मानता है पूरा मानव समाज ईश्वर या खुदा का परिवार है |

जब हम एक परमात्मा को ही एक नहीं मान रहे फिर सबको एक परिवार कैसे मानेंगे ?वहां तो फिर बँटवारे होंगे ही होंगे |ये तिफरके होंगे ही होंगे |

इसीलिए महात्मा सदा एकत्व में स्थित करने के लिए कार्य करते हैं |ये सदा वही पाठ याद करवाते हैं जो वलियों. गुरुओं,पीरों ने हर युग में पढ़ाया |जिन्होंने जीवन को भाईचारे के अंतर्गत जीने की दिशा दी |

सब महापुरुषों का सन्देश एकसमान 

महात्मा चाहे जिस युग में आये,चाहे वे राम जी   या कृष्ण जी थे ,चाहे हज़रत ईसा मसीह हों या मुहम्मद साहब हों ,या श्री गुरु नानक देवजी से लेकर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज तक हों,या कबीर जी,रैदास जी या फिर मीराबाई.तुकाराम जी या नामदेव जी हों ,या बोतन्ना जी ,वेमन्ना जी हों, पंचसखा जी,चैतन्य महाप्रभु या स्वामी विवेकानंद जी हों ,कितने ही नाम हैं जिन्होंने एकत्व की ओर सबको प्रेरित किया है | 

आज भी वही पाठ दोहराया जा रहा है |एक विद्यार्थी जब परीक्षा देने जाता है ,उस समय यदि वह पाठ भूल जाये तो हम सोच सकते हैं कि उसे कितने नंबर मिलेंगे |इसी प्रकार महात्माओं द्वारा पढ़ाया गया पाठ,जो मानव जाति भूल चुकी है ,वैर-ईर्ष्या,लोभ-लालच,दूसरे का हक़ छीनने में लग गयी है |अपने सगे भाई और पिता का भी लिहाज नहीं है ,उसे भी लूटने में लगी है,वैर-वास्तों  में पड़ चुकी है, उसे याद करवाने की कोशिश की जा रही है | इसी प्रकार जाति के आधार पर,मज़हब के आधार पर कितने ही ऐसे कारन खड़े करके इंसान दूरियाँ पैदा करता जा रहा है | वातावरण को दूषित करता जा रहा है |


मिलवर्तन का पाठ याद रखना जरूरी 

आज यहाँ गीत,कविता,व्याख्यान के रूप में जो -जो भी वचन सुनने को मिले  उन सबमें इसी तरफ इशारा किया जा रहा था ,प्रेरित किया जा रहा था कि हमारे जीवन का एक-एक पल हाथ से निकलता जाए रहा है ,जो साँस एक  बार निकल गया,लौटकर वापस नहीं आता जो चला गया वो अतीत बन गया,वो वर्तमान नहीं रहा इसलिए  गुजरते समय को कोई नहीं रोक सका ,चाहे बादशाह हो या हाकिम |चाहे दौलत वाला हो या इल्म वाला |वक़्त की रफ़्तार को कोई रोक नहीं सका |इन साँसों की पूँजी में से एक-एक साँस घटता जा रहा है |

ज़रुरत इस बात की है कि घटते हुए लम्हो की हम संभाल कर लें |हम इन्हें सजा लें,संवार लें |हमारी भावनाओं में शुद्धता हो |हमारी सोच में ऊँचाई हो | हमारे भाव सदभाव में परिवर्तित हों |  हमारे मनो में निर्मलता हो |  हमारे हृदयों में,मनो में जो वैर ईर्ष्या ,नफ़रत -हिरसो-हवस की आग जल रही है ,में प्यार की स्थापना हो जाये |दिलों में प्यार का वास हो जाये |मन में सदभावना स्थापित हो जाये |यह मन मंदिर हो जाये |

मन मंदिर कब बनता है 

मन को मंदिर बनाने के लिए ही हमें विचार करना है |अक्सर हमारी जुबान पर बात होती है कि मन मंदिर |

मंदिर कब बनता है ?एक इमारत मंदिर तब बनती है जब हम कहते हैं कि हमने मूर्ति स्थापित कर दी है |तब हम उसे मंदिर कहते हैं |जब तक मूर्ति की स्थापना नहीं होती हम उसे मंदिर नहीं कहते |वही मन मंदिर होता है,जिसमें भगवान का वास हो | जिस मन में निर्मलता हो,पावनता हो |प्रेम-करुणा का भाव हो |ऐसा मन ही मंदिर कहला सकता है | 

बाबा जी ने पंजाब के श्रद्धालुओं से संवाद करते हुए वही सन्देश दिया ,जो मानव मात्र के लिए उपयोगी है |बाबा जी ने कहा कि - स्थान -स्थान पर ऐसे सज्जनो के सहयोग मिल रहे हैं,जो पंजाब और देश की सेवा में अपने योगदान दे रहे हैं |ऐसे सज्जन हृदय से मानवता की ज़रुरत महसूस करते हैं कि इसी से मानव मात्र का भला होगा |ऐसे लोग जानते हैं कि जलते हुए संसार को आज इसी की ज़रुरत है क्यूंकि दिन ब दिन दुनिया में मानवता की कमी होती दिखाई दे रही है |इससे मानवता कमजोर होती जा रही है |प्यार की कमी होती जा रही है |

दया भावना लुप्त होती दिखाई दे रही है |दिल निर्दयता वाले बन चुके हैं |ऐसे वातावरण में जो सज्जन प्रवृत्ति वाले हैं,वो सहयोग के ज़ज़्बे रखते हैं |क्यूंकि उनका भी यही मक़सद होता है कि संसार में इंसानियत फैले जिसकी कोशिश मिशन सदा से करता आ रहा है |भारत में जिस जिस स्थान पर जाने का मौका मिलता है इसी उद्देश्य के लिए योगदान दिए जा रहे हैं |

हर नए वर्ष में संकल्प 

जब नया वर्ष शुरू होता है,जनवरी माह चढ़ता है,वहीं से भिन्न भिन्न प्रांतों की यात्रायें शुरू हो जाती हैं |इस वर्ष भी भारत के विभिन्न राज्यों में जाने के मौके मिले और फरवरी में दुनिया के कुछ देशों में जाने के मौके मिले |वहां भी ऐसी ही भावनाओं से युक्त होकर योगदान दिये जा रहे हैं | जून -जुलाई -अगस्त में भी कुछ देशों  की यात्रायें करने के मौके मिले,जहाँ कहा गया कि परमात्मा के साथ एकत्व की ज़रुरत है   |इससे हमारे मनो में अपनत्व पैदा होता है |आपसी एकता मजबूत होती है |मानव एकता के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में हम आगे बढ़ते हैं |

इक ओमकार हम कहते हैं |इक तू ही निरंकार हम कहते हैं ,जिसके बारे में कहा जाता है-

सब आये इस एक से,डाल-पात ,फल-फूल .कबीर पाछे क्या रहा,गह पकड़ा जब मूल | 

आगे भी कहते हैं-इक दी खलकत सारी ए |एक से ही सारा संसार उपजा है |एक पर केंद्रित होने से एकत्व होता है |

एकत्व से अपनत्व 

एकत्व से ही अपनत्व का भाव पैदा होता है |फिर सारे अपने महसूस होते हैं |फिर सही अर्थों में यह भाव उजागर होता है-

न कोई बैरी ,ना ही बेगाना ,सगल संग हमको बनी आयी |

यह हमारी अवस्था,हमारा दृष्टिकोण बन जाता है |और उसी पर आधारित हमारे व्यवहार हो जाते हैं |हमारे व्यवहार अपनत्व वाले इसलिए नहीं बन पाते क्यूंकि एकत्व में हम स्थित नहीं हो पाए हैं |इस एक परमात्मा को एक जाना नहीं है इसलिए मानना तो दूर की बात है | इसीलिए दीवारें और दरारें हैं ,इसीलिए बंधनो में जकड़े हुए हैं |इसीलिए संसार के वातावरण को खिंचाव वाला बनाते जा रहे हैं |सांस ऐसे ले रहे हैं जैसे  दूषित है |प्रदूषण है वैर -ईर्ष्या -नफरत का,लोभ-लालच का ,अहम्-अभिमान का |ऐसी अब -ओ-हवा में हम यह समय बिता रहे हैं |

जो एकत्व के भाव से युक्त हैं--

ऐसे वातावरण में भी जो एकत्व के भाव से युक्त हो जाते हैं,उनके लिए कोई तिफरके नहीं होते |उनके लिए कोई बेगाना नहीं होता |वे सारे संसार के लोगों को अपना जानते और मानते हैं |चाहे टोपी वाला हो या पगड़ी वाला |चाहे काले रंग का हो या गोरे रंग का |चाहे पंजाबी,सिंधी या गुजराती बोलता हो या फ़ारसी या कोई और भाषा  बोलता हो |उसका पहनावा चाहे जैसा हो,किसी भी संस्कृति में जन्मा -पला बढ़ा हो,एक परमात्मा की संतान है |

वसुधैव कुटुंबकम का व्यवहारिक पक्ष 

वसुधैव कुटुंबकम वेदों का उद्घोष हम पढ़ते सुनते आ रहे हैं लेकिन इसको क्रियात्मक स्वरुप कौन देता है |कहना-सुनना आसान है -वसुधैव कुटुंबकम |सारी वसुधा (पृथ्वी )पर बसने वाले एक कुटुंब का हिस्सा हैं,परिवार का हिस्सा हैं |लेकिन मानता कौन है ? कौन मानता है पूरा मानव समाज ईश्वर या खुदा का परिवार है |

जब हम एक परमात्मा को ही एक नहीं मान रहे फिर सबको एक परिवार कैसे मानेंगे ?वहां तो फिर बँटवारे होंगे ही होंगे |ये तिफरके होंगे ही होंगे |

इसीलिए महात्मा सदा एकत्व में स्थित करने के लिए कार्य करते हैं |ये सदा वही पाठ याद करवाते हैं जो वलियों. गुरुओं,पीरों ने हर युग में पढ़ाया |जिन्होंने जीवन को भाईचारे के अंतर्गत जीने की दिशा दी |

सब महापुरुषों का सन्देश एकसमान 

महात्मा चाहे जिस युग में आये,चाहे वे राम जी   या कृष्ण जी थे ,चाहे हज़रत ईसा मसीह हों या मुहम्मद साहब हों ,या श्री गुरु नानक देवजी से लेकर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज तक हों,या कबीर जी,रैदास जी या फिर मीराबाई.तुकाराम जी या नामदेव जी हों ,या बोतन्ना जी ,वेमन्ना जी हों, पंचसखा जी,चैतन्य महाप्रभु या स्वामी विवेकानंद जी हों ,कितने ही नाम हैं जिन्होंने एकत्व की ओर सबको प्रेरित किया है | 

आज भी वही पाठ दोहराया जा रहा है |एक विद्यार्थी जब परीक्षा देने जाता है ,उस समय यदि वह पाठ भूल जाये तो हम सोच सकते हैं कि उसे कितने नंबर मिलेंगे |इसी प्रकार महात्माओं द्वारा पढ़ाया गया पाठ,जो मानव जाति भूल चुकी है ,वैर-ईर्ष्या,लोभ-लालच,दूसरे का हक़ छीनने में लग गयी है |अपने सगे भाई और पिता का भी लिहाज नहीं है ,उसे भी लूटने में लगी है,वैर-वास्तों  में पड़ चुकी है, उसे याद करवाने की कोशिश की जा रही है | इसी प्रकार जाति के आधार पर,मज़हब के आधार पर कितने ही ऐसे कारन खड़े करके इंसान दूरियाँ पैदा करता जा रहा है | वातावरण को दूषित करता जा रहा है |

मिलवर्तन का पाठ याद रखना जरूरी 

आज यहाँ गीत,कविता,व्याख्यान के रूप में जो -जो भी वचन सुनने को मिले  उन सबमें इसी तरफ इशारा किया जा रहा था ,प्रेरित किया जा रहा था कि हमारे जीवन का एक-एक पल हाथ से निकलता जाए रहा है ,जो साँस एक  बार निकल गया,लौटकर वापस नहीं आता जो चला गया वो अतीत बन गया,वो वर्तमान नहीं रहा इसलिए  गुजरते समय को कोई नहीं रोक सका ,चाहे बादशाह हो या हाकिम |चाहे दौलत वाला हो या इल्म वाला |वक़्त की रफ़्तार को कोई रोक नहीं सका |इन साँसों की पूँजी में से एक-एक साँस घटता जा रहा है |

ज़रुरत इस बात की है कि घटते हुए लम्हो की हम संभाल कर लें |हम इन्हें सजा लें,संवार लें |हमारी भावनाओं में शुद्धता हो |हमारी सोच में ऊँचाई हो | हमारे भाव सदभाव में परिवर्तित हों |  हमारे मनो में निर्मलता हो |  हमारे हृदयों में,मनो में जो वैर ईर्ष्या ,नफ़रत -हिरसो-हवस की आग जल रही है ,में प्यार की स्थापना हो जाये |दिलों में प्यार का वास हो जाये |मन में सदभावना स्थापित हो जाये |यह मन मंदिर हो जाये |

मन मंदिर कब बनता है 

मन को मंदिर बनाने के लिए ही हमें विचार करना है |अक्सर हमारी जुबान पर बात होती है कि मन मंदिर |

मंदिर कब बनता है ?एक इमारत मंदिर तब बनती है जब हम कहते हैं कि हमने मूर्ति स्थापित कर दी है |तब हम उसे मंदिर कहते हैं |जब तक मूर्ति की स्थापना नहीं होती हम उसे मंदिर नहीं कहते |वही मन मंदिर होता है,जिसमें भगवान का वास हो | जिस मन में निर्मलता हो,पावनता हो |प्रेम-करुणा का भाव हो |ऐसा मन ही मंदिर कहला सकता है | (यह कार्यक्रम सभवतः वर्ष 2015  में सम्पन्न हुआ था )