वास्तव में निरंकारी मिशन के सिद्धांत कर्मकांडों की बजाय मानव प्रेम को अधिक महत्व देते हैं |बाबा जी परमात्मा की अनुभूति को आधार बनाकर सहज जीवन जीने के पक्षधर थे और सत्य को सिर्फ विचार मात्र नहीं मानते थे बल्कि उसके व्यवहारिक पक्ष को पूरा महत्व देते थे |यह उनका जीवन दर्शन ही था कि सत्य का व्यवहार संभव है और प्रभु के भक्त सदैव ही से जुड़े रहते हैं |
सत्य परमात्मा रूपी सूर्य और मन रूपी मुख
उन्होंने स्पष्ट कहा कि सत्य रुपी सूर्य की तरफ जब मन रुपी मुख हो जाता है तो तभी हमारा चेहरा चमकता है |मुख उजला हो जाता है |सूर्य की तरफ पीठ करके मुख उजला होने वाला नहीं है |इसीलिए महात्माओं ने इस परम सत्य ईश्वर -प्रभु-निराकार के साथ मन का नाता जोड़ने की बात कही है |यह मौका बार -बार हाथ आने वाला नहीं है |जिस जन्म को पाकर सत्य प्रभु ईश्वर निराकार की प्राप्ति हो सकती थी ,उस जन्म का पूरा समय झूठ में ही ध्यान लगाकर बिता दिया |
मानुष जन्म दुर्लभ है,होत न बारम्बार
मनुष्य का जन्म बार-बार मिलने वाला नहीं है |यह जन्म मिला ही सत्य की,प्रभु की प्राप्ति के लिए इसीलिए दुर्लभ है,अमोलक है |और अगर यह काम नहीं किया तो जैसे कौड़ियों के मोल गंवाया है |
वही बात कि संसार जो क्षण-भंगुर है ,उसको प्रधानता दी तो जीवन का मूल्य कोड़ी रह गया |जन्म तो हीरे जैसा मालिक ने दिया लेकिन हमने ही उसकी कीमत कोड़ी के समान बना ली |
जीवन की कीमत कम करने वाले हम
हीरे जैसे जन्म की कीमत कोड़ी बनाने वाले हम स्वयं हैं |मालिक ने हीरे जैसा जन्म देकर हमें मौका दिया सुनहरी |कोड़ी कीमत हमने डाली जब वो काम नहीं किया जिसके लिए भेजा गया था |मालिक ने जिस अभिप्राय से यहाँ भेजा था और सन्तों -महात्माओं ने जो कहा है -
बड़े भाग्य मानुष तन पावा |सुर दुर्लभ सदग्रंथहि गावा
बड़े भाग्य से मानव तन मिला है लेकिन हम ही हैं जिन्होंने कोड़ी कीमत डाली |कोई और थोड़े ही जिम्मेदार है |वही जिम्मेदार जिन्होंने सत्य को जीवन में प्रधानता कभी दी नहीं |इस प्रभु के साथ नाता जोड़ने के भाव मन में आने नहीं दिये |इस तरफ अपने कदम बढ़ाये नहीं |
संतों का संग किया तो वो भी वही दुनियावी इच्छाएं पूरी हो जाएँ ,वरदान मिल जाएँ इसीलिए केवल |सत्य की प्राप्ति के लिए सन्तों का संग नहीं किया |जो अभिलाषा राजा जनक को होती है |
राजा जनक ने मनुष्य जीवन का लक्ष्य पूरा किया
राजा जनक ने अष्टावक्र जी प्रभु का ज्ञान प्राप्त किया |छोटे से बच्चे प्रह्लाद के मन में भी यह भाव पैदा हुआ |छोटी सी उम्र में ही वह ज्ञान की दौलत से मालामाल हो गया और उसी का पिता हिरण्यकश्यप यह ध्येय पूरा नहीं कर सका और ज्ञान की दृष्टि से कंगाल बना रहा |इतने युग बीतने के बाद भी उसे दुत्कारा जा रहा है |
कहने का तात्पर्य यही है कि सही समय पर यदि यह कर्म कर लिया जाता है,कदम बढ़ा लिये जाते हैं तभी हम लाभ ले पाते हैं |इसलिए समय हाथों से न जाने दें |तुकाराम जी अपने अभंग में यही कह रहे हैं -रात्रि गेली दिवस गेले आयुष्य गेले
जन्मायु उन काये केले |
वे कहते हैं कि रात्रि भी गयी, दिन भी गया |पूरी आयु भी चली गयी लेकिन प्रभु के बोध के लिए तुम जागे ही नहीं | इस जीवन में आकर फिर तूने किया ही क्या ?
यह सब कुछ हाथों से चला गया और अब भी तू इसे कल के लिए छोड़ रहा है |इस काम को तुझे अभी करना है |महात्मा कहते हैं-
काल करंता अभे कर ,अब कर्ता सोइ काल
यह काम अभी करना है क्यूंकि जितनी देर नफरतों में जीते हैं ,जीवन बोझिल होता जाता है |अभी भी आप गीत में कह रहे थे कि-प्यार की दुनिया बसाएं |
सोचने की बात
बाबा जी ने प्रश्न उठाया कि क्या किसी गुरु-पीर -पैगम्बर ने नफरत फैलाने की बात कही है ?
हर गुरु -वली,पीर -पैगम्बर ने प्यार को बढ़ावा देने के लिए ही अपने योगदान दिये कि हृदयों में प्रेम बस जाए |मालिक के और इसके बन्दों के प्रति प्रेम बस जाए |साथ ही ये भी निष्कर्ष दे दिये कि यदि इसके बन्दों से प्रेम हो जाता है तो मालिक से प्रेम मान लिया जाता है |यदि इसके बन्दों से नफरत है तो प्रभु प्रेमी हम हो नहीं सकते |
कर्मकांड प्रभु प्रेमी होने की पहचान नहीं
केवल (तीर्थ )यात्रायें,स्नान .माला फेरना इत्यादि हमारे प्रभु प्रेमी की पहचान नहीं हैं |अगर बन्दों से नफरत करते हैं (जाति के आधार पर नफरत ,धर्म के आधार पर नफरत ,प्रान्त के आधार पर नफरत ,शरीर के रंग के आधार पर नफरत ,पगड़ी नहीं पहनी है तो नफरत,बाल नहीं बढ़ाये हैं तो नफरत ,बाल नहीं मुंडवाए हैं तो नफरत )एक संस्कृति या अंचल /क्षेत्र विशेष से सम्बंधित हैं ,इस मुल्क का नहीं ,किसी अन्य मुल्क का वासी है तो नफरत |
इस प्रकार नफरतों से तो जीते आ रहे हैं लेकिन महापुरुषों -गुरु-पीर -पैगम्बरों ने तो प्रेम का पाठ पढ़ाया है |उन्होंने यही कहा कि इंसानो से ,बन्दों से प्रेम करो |बन्दों से प्रेम करेंगे तो प्रभु प्रेमी हो जायेंगे अन्यथा हम प्रभु प्रेमी नहीं कहलाये जा सकते |
नफरत को तजें और प्रेम में स्थापित हों,जल्द से जल्द |झूठ से उबरें और सत्य में स्थापित हों,जल्द से जल्द | स्वयं की सच्ची पहचान कर लें जल्द से जल्द |
Self realization through God Realization (ब्रह्मानु भूति से आत्मानुभूति )
जान लें कि इंसान का असली स्वरुप क्या है |हमारा असली स्वरुप ,हमारी true entity क्या है |इसे जान लें जल्द से जल्द |
जल्दी करें इसलिए
क्यूंकि कल का पता नहीं है,यह किसी को मालूम नहीं है कि हमारे ये सांस कब तक चलेंगे |इसीलिए ये सन्त -महापुरुष शुरू से जगाते आ रहे हैं,ऐसी प्रेरणाएं देते जा रहे हैं कि इस सत्य का बोध करके आत्मा को सुर्खरू कर लेना चाहिए |आवागमन के बंधन से आत्मा को निजात मिलनी चाहिए |
यह जीवन का सफर,जो हम तय कर रहे हैं ,परिवारों में,समाज में,संसार में |यह सफर भी हम भेदभावों से ऊपर उठकर तय कर लें |वैर-ईर्ष्या-नफरत से ऊपर उठकर,मिलवर्तन की भावना से युक्त होकर तय कर लें |प्रेमपूर्वक तय कर लें |
सन्त-महापुरुष ही संसार को इस रूप में देख पाए |हर किसी के प्रति प्रेम का भाव ही उनके मन में पैदा हो गया |पंजाबी भाषा के सूफी सन्तों की यह पंक्ति पीछे भी दास को ध्यान आयी,खूबसूरत ढंग से उन्होंने कहा -
तू बेली तां हर कोई बेली अनबेली भी बेली ,
सजना बाज़ मोहम्मद बख्शा सूनी पई हवेली |
कहते हैं कि तुझसे अगर प्रेम है ,तुझे अगर वास्तव ने अपना बना लिया तो पूरी दुनिया से प्रेम हो गया ,सारा संसार ही अपना हो गया क्यूंकि तुझे अपना लिया |फिर इंसान कहता है-
सबका भला करो भगवन ,
सबका सब विधि हो कल्याण |
ये प्रार्थनाएं उन्हीं के द्वारा शुरू हुईं जिनकी समदृष्टि बन गयी थी जैसे कहा-अनबेली भी बेली कहते हैं कि जिनको हम बेगानी दृष्टि से देखते थे अथवा जिसके प्रति हमारे मन में शुद्ध भाव नहीं हैं |
बाइबिल में भी हम पढ़ते हैं-ईसा मसीह जी शिक्षाएं कि -
What's so great, if you love somebody who loves you. Greatness lies when you even love those who do not love you.
(जो आपको प्यार करते हैं ,उन्हें प्यार करने में क्या खूबी है ,खूबी तो उन्हें प्यार करने में है,जो आपको प्यार नहीं करते) अगर निरंकार प्रभु जीवन में नहीं आया तो जीवन की हवेली सूनी है \क्योंकि प्रेम नहीं है,सद्भावना नहीं है |ईर्ष्या और नफरत की आग में जलते रहते हैं इसलिए वहां तो सूनापन ही है |
कहने का भाव यही है कि संतों-महापुरुषों के वचन इसी ओर प्रेरित करते आये हैं |यही दर्पण युगों,युगों से हमारे सामने रखते आये हैं |आज भी यही दर्पण सामने रखा जा रहा है कि इंसान अपनी आँखें खोले |दर्पण में खुद को देखे और एहसास करे कि उसके जीवन को कौन सी दिशा मिली हुई है |इंसान समय रहते अपने जीवन की दिशा की ओर जागरूक हो सही दिशा की ओर मुख हो ताकि उसकी दिशा बदले |दिशा नहीं बदलेगी तो दशा बदलने वाली नहीं है |इसलिए अपने मुख की दिशा सत्य की ओर कर लें और अपनी दशा बेहतर बना लें |शैतान की बजाय देवता कहलाना शुरू हो जाये |