इस देश को क्या भगवान ही चला रहे हैं ?

ह प्रश्न पिछले दिनों एक न्यत्यालय की टिप्पणी में आया जबकि न्यायाधीश महोदय ने सरकारों के कामकाज पर अपनी नाराजगी प्रकट की | 

आज की परिस्थितियां भयावह हैं |कारण अनेक हैं |मुख्य कारण तो प्राकृतिक प्रकोप है जिस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं लेकिन मनुष्य की लापरवाही भी बड़ा कारण है |जनता को अनुमान ही नहीं था कि रोग ने अभी विदाई नहीं ली है और लोग लापरवाह हो गए |इस स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी बढ़ गयी |

प्रजातंत्र की यह एक विडंबना ही है कि मूलतः जो राजनीतिज्ञ है वही शासक भी होता है |शासक को मूलतः देशभक्त होना चाहिए और घोषित तौर पर हर शासक देशभक्त है चूंकि उसे बहुमत का समर्थन हासिल है लेकिन शासक होना और देशभक्त होना दो अलग-अलग तथ्य हैं |        

प्रगतिशील साहित्य मासिक पत्रिका के प्रवेशांक (सितम्बर 2013) अंक का ध्यान आ रहा है चूंकि उस अंक में हमने देशभक्ति और राजनीति के संबंधों को स्पष्ट करने का प्रयास किया था |अंक देशभक्ति के उच्चतम प्रतिमान आचार्य चाणक्य पर केंद्रित था |

वास्तव में देशभक्ति का राजनीति से रत्ती भर भी सम्बन्ध नहीं है चूंकि कोई व्यक्ति जो राजनीति की वर्णमाला से भी परिचित नहीं है,,पूर्ण देशभक्त हो सकता है |उसे हम ईमानदार देशभक्त कह सकते हैं चूंकि वह अपनी देशभक्ति का व्यापार नहीं करता |वह देश के लिए हर त्याग और बलिदान करता है लेकिन उसकी कीमत नहीं वसूलता |वह यही महसूस करता है कि -

देश की शान न जाने पाए,

चाहे जान भले ही जाए |

देश के सैनिक और अर्धसैनिक इसी श्रेणी में आते हैं | अब राजनीतिज्ञों की बात करते हैं |हर राजनीतिज्ञ का मुखौटा देशभक्त का ही होता है |यह मुखौटा प्रायः इतना आकर्षक होता है कि वास्तविक देशभक्त भी पीछे रह जाएँ इसलिए जनता अक्सर उनके झांसे में आ जाती है उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी अपनी पीठ की सवारी करवाती है,चाहे वह जितनी भी कमजोर हो |प्रजातंत्र में राजनीतिज्ञों का एक मात्र लक्ष्य सत्ता हासिल करना ही देखा गया है |

2019 में लोकसभा के लिए चुनाव हुए और उसी राजनीतिक दल को प्रचंड बहुमत मिला जिसने पिछली बार सरकार बनायीं थी |मंत्री भी लगभग वही रहे लेकिन यह सरकार अपने राष्ट्रीय दायित्व के साथ न्याय नहीं कर पा रही है ,देश की वर्तमान परिस्थितियां और न्यायालय की यह तल्ख़ टिप्पणी इसी लापरवाही का परिणाम हैं |

लोग मर रहे हैं चूंकि ऑक्सीजन का संकट है |पिछले वर्ष 24 मार्च को पूरे देश में लॉकडाउन लगाया गया था | लॉकडाउन की अपनी समस्याएं हैं |पेट रोटी मांगता है और परिवार पैसा |पिछली बार दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने निचले पायदान पर रहने वाले लोगों के लिए कम से कम खाने का प्रबंध तो कर ही दिया था ,इस बार तो रोटी की भी समस्या है |हर किसी का काम-धंधा ठप है लेकिन सत्ताधारी दल की व्यवस्था मज़े में चल रही है |वहां कोई मंदी नहीं है जबकि पूरे देश में मंदी है |इसलिए राजनीतिक दलों की देशभक्ति पर विचार जरूर किया जाना चाहिए |   

राजनीति क्यों देशभक्ति नहीं है और देशभक्ति क्यों राजनीति नहीं है इसे स्पष्ट समझना बहुत जरूरी है चूंकि देश की वर्तमान परिस्थितियों में जब कि महामारी का दौर है और श्मशानघाट तक में लोगों को जगह नहीं मिल पा रही है,अस्पतालों की तो क्या कहें |स्थिति बेहद पेचीदा है चूंकि कर्मकांड और दोषारोपण को ही जैसे  देशभक्ति और धर्म मान लिया गया है,इसे राजनीति के वीभत्स रूप के अलावा और क्या कह सकते हैं |  

एकमात्र ईश्वर ही है जिससे आशा है | दिल्ली उच्च न्यायलय की टिप्पणी कि इस देश को भगवान ही चला रहे हैं |सरकारों के काम-काज पर इससे तल्ख़ टिप्पणी हो नहीं सकती इसलिए ईश्वर से ही  पार्थना करनी चाहिए चूंकि नेताओं से कोई आशा नहीं बची है |   

- रामकुमार 'सेवक'