1978 अथवा 1979 की बात है जब बाबा गुरबचन सिंह जी से किसी पत्रकार ने पूछा-कि बाबा जी,जीत सच की होती है या झूठ की ?
उन वर्षों में जो सज्जन निरंकारी मिशन से जुड़े रहे होंगे वे जरा याद करने की कोशिश करें कि वह दौर कितना कठिन था |पूरी पंजाब सरकार मानवता के विपक्ष में थी चूंकि उसे वो लोग चला रहे थे,जिनके उस समय के हित मानवता से टकराव चाहते थे जबकि बाबा जी सर्व धर्म समभाव, अमन व शांति के पैरोकार थे |
कुछ शहरों में सन्त निरंकारी सत्संग भवनों पर उस समय जैसे पुलिस का कब्ज़ा हो गया था ,सत्संग नहीं हो पा रहा था |ऐसा लगता था जैसे सत्य बच नहीं सकेगा |
इस प्रकार पत्रकार द्वारा पूछे गए प्रश्न का विशेष अर्थ था |बाबा जी ने पत्रकार से कहा -दोनों की |
पत्रकार ने पूछा कि-दोनों की कैसे ?जीत तो एक की ही होनी चाहिए |
सत्गुरु की बात के अपने रहस्य होते हैं |अपनी बात को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने कहा कि -शुरू में ऐसा लगता है कि झूठ जीत रहा है लेकिन अंततः जीत सत्य की ही होती है |
तीन दिन पहले अर्थात 21 अप्रैल की रात को ,मुझे एक कार्यक्रम में बाबा गुरबचन सिंह जी पर बोलने का मौका मिला तो मुझे यह प्रसंग याद आया |
सत्य की बात चली तो मुझे एक प्रसंग बाबा हरदेव सिंह जी के कार्यकाल का भी ,याद आ गया |हुआ यह कि-मैं और मेरे एक वकील रविवार के साप्ताहिक सत्संग में दिल्ली के ग्राउंड न.8 में गए |वक़्त दोपहर का था |मंच पर बाबा जी,निरंकारी राजमाता जी और पूज्य माता सविंदर जी आसीन थे |हम नमस्कार की पंक्ति में थे और कार्यक्रम मंच पर हमारे एक गीतकार मित्र अपना गीत गा रहे थे |उनके गीत के बोल थे-
निर्मलता दो,शीतलता दो,पावनता दो,उज्ज्वलता दो |
ये चारों गुण भक्तों की शोभा हैं इसलिए मित्र की मांग जायज़ थी |भारतीय संस्कृति में गुरु को परमेश्वर के तुल्य माना जाता है इसलिए सत्गुरु से ऐसी प्रार्थना करने में कुछ भी अनुचित नहीं है लेकिन मेरा ध्यान इसी गीत के पूर्व प्रस्तुतीकरण की ओर चला गया |
लगभग एक वर्ष पहले भी मैं यह गीत सुन चुका था |मैंने वकील साहब से कहा कि-यार इस मित्र ने एक वर्ष पहले भी इन गुणों की मांग की थी |
वकील साहब बोले-एक गीत को अनेक बार गाया जा सकता है ,इसमें क्या बुराई है ? मैंने कहा-गीत गाने में कोई बुराई नहीं लेकिन अगर गीतकार महात्मा ने सत्गुरु से निर्मलता,शीतलता ,उज्ज्वलता आदि गुणों के लिए प्रार्थना की थी तो मेरे ख्याल से उन्हें ये गुण अब तक प्राप्त हो जाने चाहिए थे |
सुनकर वकील साहब गंभीर हो गए और मेरी बात की तह तक पहुँचने का प्रयास करने लगे |उन्होंने कहा-आपकी बात ठीक है |
मैंने कहा-फिर ,क्या यह महात्मा झूठ बोल रहा है ?
वो बोले-यह लगता नहीं |भक्त की प्रार्थना झूठ नहीं हो सकती |
मैंने कहा-प्रार्थना अब तक पूर्ण नहीं हुई ,इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जिनसे इन्होने प्रार्थना की,उनके पास ये गुण हों ही नहीं |मेडिकल स्टोर से आटा और दाल तो नहीं मिल सकते |
वकील साहब बोले-आप इतने बड़े संपादक हैं,आपसे यह बात सुनने की आशा नहीं थी |
मैंने कहा-बुरा मत मानिये लेकिन यह भी तो हो सकता है ?वकील साहब ने सहमति जताई लेकिन यह भी कहा कि बाबा जी के पास ये गुण हैं,आप मुझसे बेहतर जानते हैं |
मैंने कहा कि -इसका मतलब है कि बाबा जी के पास ये गुण हैं तो लेकिन बाबा जी इन्हें देना नहीं चाहते |
वकील साहब को मेरी बात पसंद नहीं आयी लेकिन उनके पास इसे काटने कोई मजबूत तर्क नहीं था |उन्होंने मेरी ओर देखा - यह भी एक कारण हो सकता है कि ये दिव्य गुण बाबा जी के पास हों तो लेकिन वे उन्हें हमारे इस मित्र को देना न चाहते हों |
तर्क के तौर पर आपकी यह बात ठीक है लेकिन ऐसा नहीं है क्यूंकि बाबा जी अपने हर प्रवचन में इन्हीं गुणों की प्रेरणा देते हैं |
बिलकुल सही,लेकिन सोचने की बात है कि इन्हें ये गुणअब तक प्राप्त न हो पाने का और क्या कारण हो सकता है ?मैंने कहा |
आप ही बताइये , वकील साहब बोले |
अब मुझे निरंकारी मिशन के द्वितीय सत्गुरु बाबा बाबा अवतार सिंह जी का एक प्रसंग याद आ गया ,जो अवतार उपदेश के किसी एक भाग में दिया गया है |बाबा अवतार सिंह जी ब्रह्मतत्व की तुलना शेरनी के दूध से करते हुए कहा करते थे कि -शेरनी का दूध मिलना आसान नहीं है लेकिन अगर मिल भी जाये तो सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि उसे रखने के लिए शुद्ध सोने का बर्तन चाहिए |मिलावटी बर्तन में वह टिकेगा नहीं |बाबा जी कहा करते थे कि ब्रह्मज्ञान के लिए भी शुद्ध मन,शुद्ध भावना ,जिज्ञासा अथवा समर्पित मन चाहिए |
मुझे लगता है कि हम लोग बातें तो बड़ी-बड़ी कर लेते हैं लेकिन शुद्ध भावना अथवा भाव की शुद्धता उस ऊँचाई का नहीं है,कम है बल्कि कहना चाहिए बिलकुल ही नहीं है अन्यथा निर्मलता,शीतलता,पावनता और उज्ज्वलता को अब तक हम प्राप्त कर चुके होते |
वकील साहब और मैं दोनों ही इस कारण को स्वीकार करने को विवश थे |
21 अप्रैल के कार्यक्रम में मैंने कहने की कोशिश की कि बाबा हरदेव सिंह जी ने बाबा गुरबचन सिंह जी के मिशन को बहुत बेहतर ढंग से संभाला था लेकिन उन्हें वैसे शिष्य नहीं मिल सके जैसे चाहिए थे इसलिए 2014 में हमने उन्हें भावुक होते हुए भी देखा |
बाबा गुरबचन सिंह जी अपने प्रिय पुत्र और परमप्रिय शिष्य का दर्द अवश्य महसूस करते इसलिए हमें स्वयं को सत्यनिष्ठा से युक्त कर लेना चाहिए चूंकि झूठ निरंकार को पसंद नहीं आता |भक्ति में आडम्बर की रत्ती भर भी गुंजाईश नहीं है |
