भारतीय गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर प्रगतिशील पाठक मंच के तत्वावधान में ऑनलाइन कवि सम्मेलन पर पढ़ी गयी कविता (पहली)

बहुत हुए नारे और भाषण अब बात अमल में लानी होगी 

जब किरदार को बदलेंगे हम,तब पैदा नयी कहानी होगी 

धन्य बनेगा तभी तजुर्बा ,धन्य तभी जवानी होगी 

कोई बात तुम्हारी तब मानेगा,जब हमने किसी की मानी होगी 

कोई न आएगा मरहम लेकर खुद ही पीड़ उठानी होगी 

यदि गणतंत्र बचाना है तो मानवता अपनानी होगी 


भारतवर्ष को बाँट दिया है छोटी -बड़ी लकीरों में 

मानवता को बांध दिया है,नफरत की ज़ंजीरों में 

क्यों धर्म-जात और उपजातों में क्यों बाँट दिया जग सारा है 

हैं भारत माँ की सब संताने इक परिवार हमारा है 

हम केवल भारतवासी हैं ये बात खुद को समझानी होगी 

यदि गणतंत्र बचाना है तो मानवता अपनानी होगी 


न मुस्कानो की जात कोई न प्रान्त अश्क़ के धारों का

और न कोई धर्म है दोषी,बढ़ते नरसंहारों का 

इन अमानुष व्यवहारों का ,इन आतंकी किरदारों का 

केवल छोटी सोच है कारण,देशविरोधी नारों का 

बिन मानवता राष्ट्र निर्माण की सोच तो कुल बेमानी होगी 

यदि गणतंत्र बचाना है तो मानवता अपनानी होगी  

- दीनदयाल उदय (नोएडा)