एक पत्रकार मित्र ने
उलझते और उलझाते हुए
उलझनों का पिटारा ,मेरे सिर पर उड़ेला और बोला-
न घर चैन ,न बाहर चैन -कहीं ठिकाना नहीं है
अरे यार ,सच्चाई का ज़माना ही नहीं है |
मैंने कहा-भारत सरकार तक कहती है-सत्यमेव जयते
पत्रकार मित्र बोले -वह सिर्फ छायती है,अशोक चिन्ह के नीचे-सत्यमेव जयते
लेकिन -कहती नहीं है क्यूंकि
उसे भी पता है -पुलिस थाने में घुसने से पहले ,सच को देनी पड़ती है विदाई ,
करनी पड़ती है-निजी -जेब की भी सफाई
नहीं तो हो सकती है -पिटाई
कानून की रुस्वाई के जुर्म में -हो सकते हैं अंदर |
सुनकर उसके ज़ज़्बात -मैं ज़ज़्बाती हो गया लेकिन पराजय न मानने के स्वर में बोला -
पर यार -अदालत में -मजिस्ट्रेट के सिर के पीछे ,महात्मा गाँधी का चित्र लगा होता है ,
और गाँधी जी भी अक्सर थे कहते -सत्यमेव जयते ,
पत्रकार मित्र न घबराया ,न सकुचाया और बिलबिलाया -
अदालत में मजिस्ट्रेट नहीं ,मेंन होता है -वकील ,जो देता है दलील
झूठ को बचाने की,सत्य को बरगलाने की ,
और अक्सर सफल होता है-
सत्य तो जेल में चक्की पीसता,और रोता है |
पत्रकार की सुनकर बात - मैं हो गया हतप्रभ लेकिन
खिसियाने स्वर को मजबूत बनाकर बोला -
मेरे भाई ,तुम चाहे जो भी कहो - सबसे बड़ी है सच्चाई ,
सत्य यदि समझदार भी हो तो -संयम से बोलता है
इसलिए उसे जाना नहीं पड़ता कभी थाने
और जाता भी है तो शान से जाता है ,
नेल्सन मंडेला की तरह ,इज्जत से बाहर आता है ,
रामलीला के मंच पर भी होती है-राम की विजय ,रावण की हार ,
क्या दिखता नहीं है तुमको -युगो पुराना यह सिलसिला
रावण को क्या मिला -सिला ?
पत्रकार मित्र बोला-यार वो रामलीला है ,दस दिनों का खेल है,संयोगों का मेल है, जीवन नहीं है
जीवन में तो ,राम कहीं दिखता नहीं ,रावण का ही अखंड साम्राज्य है ,
कोई छह फ़ीट का ,कोई सात फ़ीट का ,
दिखता नहीं कहीं रामराज्य है |
दुकान से लेकर मकान तक झूठ ही झूठ फैला है,
सत्य के दर्पण में हर कोई मैला है,
मोदी जी तक कह रहे हैं-चीन हमारे देश में घुसा ही नहीं,
बीस सैनिकों की शहादत फिर कैसे हो गयी -राम जाने |
मोदी जी तक शहादत की की बात मानते हैं
उसे चुनाव की मंडी में ,कैसे भुनाना है,यह भी अच्छी तरह जानते हैं |
सत्ता हो या जनता -मानवता की पहचान कहाँ है
सत्य का स्थान कहाँ है ?
अंततः मैंने कहा-मित्र ,सत्य अजर -अमर है ,यह नहीं आज की तजा खबर है
यह शाश्वत है,नहीं कोई मशीन है,
युग बीतने पर भी सत्य तजा तरीन है |
असल में -
सत्य हारता हुआ लगता तो है ,लेकिन कभी हारता नहीं |
दो प्रकार के जीवन हैं
एक शरीर के साथ,और दूसरा-शरीर के बिना |
शरीर एक आयु के बाद नष्ट हो जाता है,हर किसी का ,
लेकिन -हम जो कर्म करते हैं ,वे सदैव रहते हैं
और कर्म यदि सात्विक हों तो
अच्छी -बुरी कहानी कहते हैं ,
शरीर के मरने के बाद भी ज़िंदा रहते हैं |
इसलिए सत्य की विजय के लिए -जीवन में प्रभु को बसा लो,
कर्मो को सम्भालो,निज कर्मो को सम्भालो |
- रामकुमार सेवक
