कविता - कर्मो को सम्भालो







क पत्रकार मित्र ने 

उलझते और उलझाते हुए 

उलझनों का पिटारा ,मेरे सिर पर उड़ेला और बोला-

न घर चैन ,न बाहर चैन -कहीं ठिकाना नहीं है 

अरे यार ,सच्चाई का ज़माना ही नहीं है |

मैंने कहा-भारत सरकार तक कहती है-सत्यमेव जयते 

पत्रकार मित्र बोले -वह सिर्फ छायती है,अशोक चिन्ह के नीचे-सत्यमेव जयते 

लेकिन -कहती नहीं है क्यूंकि 

उसे भी पता है -पुलिस थाने में घुसने से पहले ,सच को देनी पड़ती है विदाई ,

करनी पड़ती है-निजी -जेब की भी सफाई 

नहीं तो हो सकती है -पिटाई 

कानून की रुस्वाई के जुर्म में -हो सकते हैं अंदर |

सुनकर उसके ज़ज़्बात -मैं ज़ज़्बाती हो गया लेकिन पराजय न मानने के स्वर में बोला -

पर यार -अदालत में -मजिस्ट्रेट के सिर के पीछे ,महात्मा गाँधी का चित्र लगा होता है ,

और गाँधी जी भी अक्सर थे कहते -सत्यमेव जयते ,

पत्रकार मित्र न घबराया ,न सकुचाया और बिलबिलाया -

अदालत में मजिस्ट्रेट नहीं ,मेंन होता है -वकील ,जो देता है दलील 

झूठ  को बचाने की,सत्य को बरगलाने की ,

और अक्सर सफल होता है-

सत्य तो जेल में चक्की पीसता,और रोता है |

पत्रकार की सुनकर बात - मैं हो गया हतप्रभ लेकिन 

खिसियाने स्वर को मजबूत बनाकर बोला -

मेरे भाई ,तुम चाहे जो भी कहो  - सबसे बड़ी है सच्चाई ,

सत्य यदि समझदार भी हो तो -संयम से बोलता है 

इसलिए उसे जाना नहीं पड़ता कभी थाने 

और जाता भी है तो शान से जाता है ,

नेल्सन मंडेला की तरह ,इज्जत से बाहर आता है ,

रामलीला के मंच पर भी होती है-राम की विजय ,रावण की हार ,

क्या दिखता नहीं है तुमको -युगो पुराना यह सिलसिला 

रावण को क्या मिला -सिला ?

पत्रकार मित्र बोला-यार वो रामलीला है ,दस दिनों का खेल है,संयोगों का मेल है, जीवन नहीं है 

जीवन में तो ,राम कहीं दिखता नहीं ,रावण का ही अखंड साम्राज्य है ,

कोई छह फ़ीट का ,कोई सात फ़ीट का ,

दिखता नहीं कहीं रामराज्य है |

दुकान से लेकर मकान तक झूठ ही झूठ फैला है,

सत्य के दर्पण में हर कोई मैला है,

मोदी जी तक कह रहे हैं-चीन हमारे देश में घुसा ही नहीं,

बीस सैनिकों की शहादत फिर कैसे हो गयी -राम जाने |

मोदी जी तक शहादत की की बात मानते हैं

उसे चुनाव की मंडी में ,कैसे भुनाना है,यह भी अच्छी तरह जानते हैं |

सत्ता हो या जनता -मानवता की पहचान कहाँ है 

सत्य का स्थान कहाँ है ?

अंततः मैंने कहा-मित्र ,सत्य अजर -अमर है ,यह नहीं आज की तजा खबर है 

यह शाश्वत है,नहीं कोई मशीन है,

युग बीतने पर भी सत्य तजा तरीन है |

असल में -

सत्य हारता हुआ लगता तो है ,लेकिन कभी हारता नहीं |

दो प्रकार के जीवन हैं 

एक शरीर के साथ,और दूसरा-शरीर के बिना |

शरीर एक आयु के बाद नष्ट हो जाता है,हर किसी का ,

लेकिन -हम जो कर्म करते हैं ,वे सदैव रहते हैं 

और कर्म यदि सात्विक हों तो 

अच्छी -बुरी कहानी कहते हैं ,

शरीर के मरने के बाद भी ज़िंदा रहते हैं |

इसलिए सत्य की विजय के लिए -जीवन में प्रभु को बसा लो,

कर्मो को सम्भालो,निज कर्मो को सम्भालो |

रामकुमार सेवक