खत लिख दे सांवरिया के नाम बाबू...
लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद...
पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ...
न जाने कितने गीत खत और चिट्ठी के बारे में लिखे गए हैं।
क्या आप जानते है कि जब भारत मे डाक सेवा शुरू हुई थी तो शिक्षित लोग कम हुआ करते थे। इसलिए डाकखाने में एक व्यक्ति अलग से बैठता था जो पढ़ा लिखा हुआ करता था । लोग उसको बोल- बोल कर यानी अपनी बात बोल कर खत लिखवाते थे ।और वो दस-बीस पैसे में ये काम किया करता था |
आज संचार के अनेको साधन है जैसे - ई मेल , व्हाट्स एप्प , ट्विटर इंस्टाग्राम और इससे बड़ी चीज ये कि आज कॉन्फ्रेंसिंग माध्यम से आमने-सामने वीडियो कॉल भी कर सकते हैं।
आज की वर्तमान पीढ़ी ने 1955 से 1970 का समय नही देखा होगा । जहां गाँव मे डाक बांटने वाला कर्मचारी गाँव का खास आदमी हुआ करता था । क्योंकि वो चिट्ठी पढ़ कर हाल -चाल बताता था आज विश्व डाक दिवस पर हम उनके योगदान की भी प्रशंसा करते है ।
चिट्ठी हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं। चाहे फिल्म हो, उपन्यास हो, कहानी हो - जहां चिट्ठी की बात आती है वहाँ कोई ना कोई शुभ या अशुभ घटना हो ही जाती थी। फिल्म में अक्सर यह सीन भी होता था कि सुपुत्र या पति विदेश में धन कमाने गये हैं और बाद में उनका कोई अता – पता नहीं होता।
बहुत समय के बाद अगर कोई चिट्ठी आती थी तो सिचुएशन के हिसाब से गाना बन जाता था - चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है बड़े दिनों के बाद... ऐसा कुछ गीत होता था। शहर ही नहीं चिट्ठी गांव को भी प्रभावित करती रही है।
सत्तर के दशक में फिल्म आयी थी - दुल्हन। फिल्म में गाना था – आएगी जरूर चिट्ठी नेरे नाम की... सब देखना। हेमा मालिनी पूरी फिल्म में इंतजार ही करती रहती है कि - उसके नाम की भी कोई चिट्ठी उसके पति की ओर से आएगी।
कथानक ऐसा है कि याद करके आज तक आँखें गीली हो जाती हैं क्यूंकि विवाह की रात को ही वह विधवा हो जाती है और उसे पता नहीं है। वह जमाना ही ऐसा था कि फिल्में भी वास्तविक लगती थीं और उनके गाने भी |
राजेश खन्ना, हेमा मालिनी अभिनीत एक फिल्म (पलकों की छाँव में) मैं शूट हुआ गीत -
डाकिया डाक लाया, डाकिया डाक लाया,
खुशी का पयाम कहीं, कहीं दर्दनाम लाया ।

ये गीत इतना मशहूर हुआ कि बरसो तक चला | गीत की एक एक लाइन कहानी बन कर फिल्म की सिचुएशन पर ऐसी जुड़ी हुई थी कि गीत को देख कर ( सुन कर भी ) दर्शकों की आंखों से आंसू रुके नही । उसमे सगाई और शादी की खुशी, बच्चे के जन्म पीर-फकीर से आशीर्वाद लेने जाने के अवसर पर का दृश्य भी गीतकार ने बहुत खूबसूरती से अंकित किया था, पंक्तियाँ देखें-
किसी की दिवाली,
किसी की दीवाला
निम्मो की गोद भरी,
खैरू का प्याला |
पूरे गाने में डाकिया की इंतजार का जो आलम दिखाया है, वह उस जमाने में सचमुच होता था | विरहणी नायिका अरुणा ईरानी का थूक से लिफाफा चिपकाना बेकरारी तो दिखाता ही है लेकिन सीधे -साधे लोगों की असलियत भी मौजूद है | दादा की बीमारी, दादी का गुजर जाना,सब कुछ कथानक का हिस्सा बन गई -कहने को वो चिट्ठी की ही बात थी |

(गुलजार साहब द्वारा लिखा गाया और किशोर दा द्वारा गाया गया गाना जब राजेश खन्ना की साइकिल के साथ शुरू होता है,तो बच्चे पंक्ति में खड़े दीखते हैं | उनकी चपलता देखकर हमारा बचपन जैसे आज भी साकार हो जाता है |
मेरे जो पहले शिक्षक थे, वही हमारे गांव के डाक बाबू भी थे | अद्भुत बात यह थी कि मेरे पिताजी को भी उन्होंने ही पढ़ाया था।
बाल के लगभग बिना उनका सिर, सफेद मूछे उनकी सर्वोच्चता स्थापित करती थी | उनके घर में ही पोस्ट ऑफिस भी थाशाम को वे चिट्ठियां बाँटने आते तो हम उनके नए चेले जोश से आगे – पीछे, उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। सब उन्हें कहते थे – पंडित जी राम - राम।
वे मुझे गोद में उठा लेते थे और पहाड़े सुनने लगते थे। मुझे भी मजा आता था और अब लगता है कि इस तरह उनके स्कूल का प्रचार हो जाता था - संपादक )
कहीं – कहीं पर चिट्ठी – पत्री आपस की नाराजगी का अंदेशा भी बयां करती है जैसे राजकपूर साहब की फिल्म संगम में गीत है -
यह मेरा प्रेम प्न पढ़कर, के तुम नाराज ना होना,
कि तुम मेरी जिंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो |
और फिल्म के साथ – साथ यह गीत भी फिल्म का एक विशेष आकर्षण बन गया था। इन सब बातों पर ध्यान देते समय यह तो कहा नहीं जा सकता कि चिट्ठी फिल्मों का हिस्सा नहीं रही हैजैसे मन के भाव को हम किसी न किसी रूप में व्यक्त कर देते है, तो चिट्ठी भी हमारी दूरियों के मध्य एक सशक्त सेतु का रूप बन गई। भारतीय डाक विभाग की महत्वपूर्ण सेवाओ के प्रति आज विश्व डाक दिवस पर हम अपनी सद्भावनाएँ व्यक्त करते हैं |
- अशोक मेहरा