ऐ बशर क्यों ज़िंदगी तू जी रहा शैतान की
धर्म को बदनाम मत कर क़द्र कर इंसान की
सतगुरु ने कर दिया जिनको ख़ुशी से मालामाल
उन फ़क़ीरों ने गुज़ारी ज़िंदगी सुलतान की
ज्ञान रूपी रौशनी ले जाएगी मंज़िल तलक
ऐ मुसाफ़िर कर हिफ़ाज़त कीमती सामान की
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई दूर होते जाएँगे
गर महज़ बातें करेंगे धर्म और ईमान की
देखकर मेहमाँ - नवाज़ी इस सराय में 'सुरेश'
रोज़ बढ़ती जा रही है आरज़ू मेहमान की
फ़कीर - सन्त , महात्मा
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हाथ अपनों से गर छुड़ाते सभी
तो किनारों में डूब जाते सभी
हम सभी चाँद पर अगर रहते
पंछी धरती पे चहचहाते सभी
आग पर हक़ जता के दिखलाएँ
जैसे पानी पे हक़ जताते सभी
गर न होते जहान में पत्थर
बाग़ फूलों के मुस्कुराते सभी
फिर यहाँ कौन बचता ज़िंदा 'सुरेश'
विष को अमृत अगर बताते सभी
- सुरेश मेहरा