हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर प्रगतिशील साहित्य मंच (दिल्ली) द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में पढ़ी गयी कवितायेँ (तीन)
मां


 

बिना तख्त -ओ - ताज के बादशाह बनाती है 

मेरी मां मुझे जब भी  राजा  बेटा बुलाती है 

 

मैं  सदियों  की थकन पल में भूल जाता हूं

वो आज भी थपकियां देके जब सुलाती है

 

बलाएँ  दुनिया की  अपने  सर ले  लेती है 

नजर   उतार के जब  वो टीका  लगाती है

 

हकीमों  को भी कर देती  है  पानी - पानी

चोट पर  फूंक का  जब  मरहम लगाती है

 

मोहम्मद की अम्मी और कन्हैया की मईया

दोनों को ही  एक जैसी लोरियां सुनाती है 

 

----------------------------------------------------------

(2)

 


होश वालों को आजकल ख़ुमारी हो रही है

ये ज़माने को जाने  कैसी बीमारी हो रही है 

 

जिनमें रिश्ता  था आग और मोम की तरह 

सुना है उनमें भी अब  रिश्तेदारी हो रही है 

 

मोहब्बत में अना की कोई जगह नहीं रहती 

महबूब के आगे फिर क्यूं पर्दादारी हो रही है

 

अपने हथियार चलेंगे अब अपनों के ख़िलाफ़

ख़ुदा जाने  ये कौन सी समझदारी हो रही है 

 

सबकी आंखों में उतर आया है लहू का रंग

लगता है एक और ज़ंग की तैयारी हो रही है 

 

मेरी निकली सांसें लौट आती है फिर मुझ तक

कोई तो है जिसकी मुझसे वफ़ादारी हो रही है