धर्म और कर्म का संघर्ष क्या सचमुच है ?

दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई,


तूने काहे को दुनिया बनाई |


यह एक पुराना सवाल है लेकिन इसका सर्वमान्य उत्तर किसी के भी पास नहीं है | हर एक की अपनी -अपनी कल्पना है |बाइबिल में कहा गया है कि प्रभु ने जब सृष्टि बनायी तो कुछ दिन सब ठीक-ठाक रहा |सब काम पूरा हो गया तो प्रभु को लगा कि एक मनुष्य की रचना की जाए ,इस प्रकार व्यस्त रहने का एक कारण बना रहेगा |अपनी सृष्टि का आनंद लेने और अपने मनोरंजन के लिए प्रभु ने दुनिया बनाई|


प्रभु और मानव के बीच जो सम्बन्ध है,उस पर चिंतन करते हैं तो धर्म अस्तित्व में आता है |मनुष्य योनि कर्म योनि है बाकी सब योनियों को ज्ञानीजन भोगयोनि मानते हैं |कर्मयोनि होने के नाते मनुष्य का कर्म से अटूट सम्बन्ध है |


मानव जीवन के परिपेक्ष्य में अब दो शब्द मुख्यतः अस्तित्व में आते हैं-धर्म और कर्म |


इन दोनों में क्या कोई संघर्ष या प्रतिद्वंद्विता है ?



यह प्रश्न आज सुबह मेरे लिए तब अस्तित्व में आया जब मैंने यह सूक्ति पढ़ी कि-धर्म से कर्म श्रेष्ठ है चूंकि धर्म के बाद प्रभु से माँगना पड़ता है जबकि कर्म करने के बाद प्रभु को अपने आप देना पड़ता है |   


गहराई से देखें तो कर्म का अस्तित्व पहले आया चूंकि जन्म लेते ही हमने हाथ-पैर चलाने शुरू कर दिए थे |माँ के साथ संवाद का यह बिलकुल मौलिक तरीका था |हमारे परिवार के लिए धर्म तब भी था चूंकि उन्होंने कुछ कर्मकांड तभी शुरू कर दिये थे लेकिन मेरे लिए अर्थात एक नवजात शिशु के लिए इन कर्मकांडों का कोई अर्थ न था |धर्म मेरे लिए तब अस्तित्व में आया जब मैंने अपनी माँ से पूछा कि हमें किसने बनाया है ?


उसने जवाब दिया -भगवान ने |यह मुझे माँ ने बताया इसलिए माँ मेरी पहली गुरु थी |महात्माओं ने कहा-त्वमेव माता च पिता त्वमेव  अर्थात माता भी तुम हो और पिता भी तुम हो अर्थात हे अनंत प्रभु -जब मेरे माता-पिता अपना शरीर छोड़ देंगे अथवा जब वे मेरे साथ नहीं होंगे ,तब भी तुम मेरे पास होंगे |शाश्वत सत्ता परमेश्वर पर यह अटल भरोसा ही धर्म है |महात्मा कहते हैं -


क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मं कुरू अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में धर्म का पालन करो |


वास्तव में धर्म सात्विक कर्तव्यों के परिपालन का नाम है |जिसे कुछ संस्कारों अथवा दायित्वों के नाम से अभिव्यक्त किया गया |
धर्म की परिभाषाएं विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न शब्दों में प्रकट की हैं |इन परिभाषाओं में से मुझे इस परिभाषा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है-


धर्म वह प्रक्रिया है, जिससे मनुष्य, मनुष्य बनता है - निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी


इस प्रकार मैं धर्म को पूर्णतः आंतरिक अवस्था मानता हूँ |इस परिपेक्ष्य में जरा उस सूक्ति को देखें-कहा गया है धर्म कर्म से श्रेष्ठ है |पूरा लेख पढ़कर कोई भी इस बात को महसूस कर सकता है कि धर्म सूक्ष्म है ,जो कि विचारों के रूप में हमारे कर्मो पर प्रभाव डालता है | धर्म चूंकि भीतरी अवस्था है इस प्रकार वह हमें बोझिल नहीं करती अपितु हमारे कर्मो को मर्यादित करती है |गीता के अनुसार श्रीकृष्ण कहते हैं कर्म करने के लिए इंसान स्वतंत्र है लेकिन उनके फलों पर उसका कोई अधिकार नहीं |इंसान जैसे कर्म करता है प्रभु उन्हीं के अनुरूप फल प्रदान करता है इस दृष्टि से मांगने या न मांगने का कोई औचित्य ही नहीं है |धर्म का अपना स्वतंत्र अस्तित्व हैऔर कर्म का अपना -इस दृष्टि से कर्म और धर्म दोनों एक -दुसरे के सहयोगी हैं |हमें मानव रूप में हरदम प्रभु का आभारी होना चाहिए चूंकि प्रभु ने हमें धर्म को समझने योग्य बनाया ताकि हम कर्म को धर्ममय बना सकें |