पी.वी.नरसिंहराव के जी नाम के साथ परिपक्वता की ऐसी ऊंचाई जुडी है जो उन्हें स्थितप्रज्ञता के आस-पास पहुंचा देती है, जबकि वे पूर्णतः राजनीतिज्ञ थे |उनका जन्म 28 /06 /1921 को हुआ था |यदि आज वे होते तो 99 वर्ष के हो चुके होते |इस प्रकार आज से उनका जन्म शताब्दी वर्ष शुरू हो रहा है |
वे भारत के दसवे प्रधानमंत्री थे |वे एक साहित्यकार भी थे तथा हिंदी,अंग्रेजी,तेलुगु आदि अनेक भाषाएँ जानते थे |
वे आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे |वे अनेकों राष्ट्रीय पदों पर रहे |वर्ष 1991 में लोकसभा के लिए चुनावप्रचार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष श्री राजीव गाँधी जब हिंसा के कारण नृशंस अंत को प्राप्त हुए तो उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाया गया |
लोकसभा में उनकी पार्टी का स्पष्ट बहुमत नहीं था और देश की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी ,अर्थ-व्यवस्था को उबारने की ज़रुरत थी इसलिए राव जी ने डॉ.मनमोहन सिंह को भारत का वित्त मंत्री बनाकर अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवन दिया |इस दौरान उनके कार्यों ने देश को नया आर्थिक कार्यक्रम दिया |'लाइसेंस राज' की समाप्ति और भारतीय अर्थनीति में खुलापन उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही आरम्भ हुआ।
पी वी नरसिंहराव बहुत कम बोलते थे इसलिए विरोधी उन्हें व्यंग्य से मोनी बाबा भी कहते थे |लक्खूभाई पाठक नाम के एक अनिवासी भारतीय ने उन पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था |उन पर रिश्वत का केवल एक ही आरोप हो ,ऐसा नहीं था |
सूटकेस भरकर पैसा लेने के आरोप भी उन पर लगे लेकिन वे विचलित नहीं हुए |राव ने चुपचाप उन सब मामलों का सामना किया |
भिन्न भिन्न के प्रकार के आरोप झेलते हुए भी उन्होंने पूरे पांच वर्ष तक अपनी अल्पमत की सरकार को सफलतापूर्वक चलाया |पूरी स्थितियां विपरीत थीं लेकिन उन्होंने देश को एक स्थिर और काम करने वाली सरकार दी |उन्होंने इसराइल के साथ सम्बन्ध शुरू किये और परमाणु परीक्षण की दिशा में भी प्रयास जारी रखे |
अटल बिहारी वाजपेयी जी की किताब मेरी इक्यावन कवितायेँ का लोकार्पण उन्होंने ही किया था |जहाँ तक मुझे स्मरण है यह कार्यक्रम पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री विजय गोयल ने आयोजित किया था |अख़बारों में लिखा गया कि- मेरी इक्यावन कविताएँ कवि व राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी का बहुचर्चित काव्य-संग्रह है जिसका लोकार्पण 13 अक्टूबर 1995 को नई दिल्ली में भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री पी० वी० नरसिंहराव ने सुप्रसिद्ध कवि शिवमंगल सिंह 'सुमन' की उपस्थिति में किया ।पुस्तक के नाम के अनुसार इसमें अटलजी की इक्यावन कविताएँ संकलित हैं ,जिनमें उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं |
मेरी स्मृति के अनुसार समारोह में नरसिंहराव जी ने जो कहा,वह एक ऐतिहासिक सच है-उन्होंने कहा कि अपनी आहट पर खुद दरवाजा खोलना ,आप ऐसी कवितायेँ क्यों लिखते हैं,जिन्हें पढ़कर बूढ़ों की आँखों में भी आंसू आ जाएँ |
उन्होंने कहा कि जीवन में कोई ऐसा नहीं मिला,जिसे गुरु बना पाता,अब सोच रहा हूँ कि आपको गुरु बना लूँ|वाजपेयी जी ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में कहा-अब गुरु की नहीं गुरुघंटालों की ज़रुरत है |
वाजपेयी और राव के बहुत अजीब रिश्ते थे |संघी पृष्ठभूमि के वाजपेयी और गांधीवादी पृष्ठभूमि के पी वी नरसिंहराव न जाने कैसे मिलकर काम कर लेते थे |1998में जब वाजपेयी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो कहा जाता है पूर्ववर्ती नरसिंराव ने उन्हें संकेत दे दिया था कि सामग्री तैयार है |कहने का आशय यह था कि स्वयं राव तो परमाणु परीक्षण नहीं कर पाए लेकिन तैयारी पूरी है |सत्ता सँभालने के कुछ ही दिन बाद 11 मई 1998 को वाजपेयी ने तीन परमाणु परीक्षण राजस्थान के पोखरण में किये |
राव ने वाजपेयी को भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए संयुक्त राष्ट्र भी भेजा था जबकि विपक्षी दल के शीर्ष नेता थे |हुआ यह 27 फरवरी 1994 को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के जरिए प्रस्ताव रखा। उसने कश्मीर में हो रहे कथित मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर भारत की निंदा की। संकट यह था कि अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता तो भारत को UNSC के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता।
उस समय केंद्र में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार थी। कई तरफ से चुनौतियों का सामना कर रहे पी वी नरसिंहराव ने इस मसले को खुद अपने हाथों में लिया और जिनेवा में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए सावधानीपूर्वक एक टीम बनाई। इस प्रतिनिधिमंडल में तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, ई. अहमद, नैशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला और हामिद अंसारी तो थे ही, इनके साथ अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे। वाजपेयी उस समय विपक्ष के नेता थे और उन्हें इस टीम में शामिल करना मामूली बात नहीं थी। यही वह समय था जब देश के बचाव में सभी पार्टियों और धर्म के नेता एकसाथ खड़े हो गए थे।
यह एक ऐसा तत्व है जो न सिर्फ उदारता का सन्देश देता है बल्कि भारतीय राजनीति में समन्वय के तत्व भी जोड़ता है |इस दृष्टि से देखते हैं तो अटल बिहारी वाजपेयी और पी वी नरसिंहराव एक-दूसरे के सहयोगी नज़र आते हैं |
अयोध्या में बाबरी ढांचा उन्हीं के शासनकाल में टूटा इसलिए धर्मनिरपेक्ष पक्ष राव की सराहना नहीं कर सकता लेकिन विवाद का एक केंद्र तो उनके शासनकाल में ही ख़त्म हुआ |इसके लिए उन्हें कभी माफ़ नहीं किया गया जबकि उत्तर प्रदेश में चुनी हुई सरकार थी ,जिसने खुले तौर पर इसकी जिम्मेदारी ली |इसीलिए राव ने अपनी मृत्यु से पहले कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं से पूछा था कि मुझे ऐसे काम की सजा दी जा रही है,जो मैंने किया ही नहीं |
मुझे लगता है कि यह उनकी कार्यशैली थी कि जो बोलता है बोलता रहे लेकिन अपने लक्ष्य को अपनी आँखों से ओझल न करो |
उन्होंने अपनी आत्मकथा INSIDER के नाम से अंग्रेजी उपन्यास के रूप में लिखी |हिंदी में अंतर्गाथा नाम से यह छपी |मैंने उसे असामान्य धैर्य से पढ़ा चूंकि यह काफी मोटी किताब थी लेकिन रोचक थी इसलिए पढ़ा |राव ने इसे अपनी आत्मकथा का नाम नहीं दिया लेकिन एक लेखक के तौर पर उनके अनुभवों ने मुझे प्रभावित किया |
यह एक ऐसे लेखक का उपन्यास है जो पूरी ईमानदारी से राजनीतिज्ञ था | जिसने इस वास्तविकता पर मसीहा का पर्दा डालने की कोशिश नहीं की |इस दृष्टि से मैं उन्हें यथार्थवादी मानता हूँ |23 /12 /2004 को उनका देहावसान हुआ |उनकी पार्टी ने बेशक उनका सम्मान नहीं किया लेकिन उनके कार्यकाल को भुलाया नहीं जा सकता | आज उनकी जन्म शताब्दी के प्रारम्भ पर उन्हें प्रणाम करता हूँ |