निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी
वे सबके अपने थे और सब उनके...
निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी की भाव-भंगिमा (Body Language) ही ऐसी थी कि हर किसी को अपने लगते थे। उसका कारण यह था कि उनका दिल बहुत बड़ा था और माफ करने के लिए वे यह इंतजार नहीं करते थे कि कोई उनसे माफी मांगे बल्कि अपनी तरफ से उसके प्रति कोई नकारात्मक भाव नहीं रखते थे। वे कहा करते थे -
जिंदगी को हमने इस तरह जिया,
किसी से माफी मांग ली,
किसी को माफ कर दिया।
वर्ष 1986 में मुझे एक सज्जन मिले और बोले कि बाबा जी के साथ मैं कही यात्रा पर गयाउस समय में सिगरेट पीने की सोच भी नहीं सकता था हालांकि मुझे यह आदत थी। एक जगह जब कोई और साथ ना था तो बाबा जी ने कहा कि बाहर जाकर सिगरेट पीकर आ सकता हूँ। मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि बाबा जी को मेरी इस लत का पता था और तब भी वे निभा रहे थे। उनका यह विशाल भाव उनके व्यक्तित्व से झलकता भी था।
वर्ष 2000 के आस-पास की बात है, उन दिनों उनके प्रवचन हर शनिवार को आस्था टी.वी. पर प्रसारित होते थे। उन दिनों एक बुजुर्ग माता से बाबा जी के एक अनुयाई ने पूछा कि-माता जी, आपको तो पंजाबी के अलावा कोई और भाषा आती नहीं तो आपको बाबा जी के प्रवचन में इतनी रुचि क्यों है कि प्रवचन शुरू होने से पहले ही आप टी.वी. सेट के सामने आकर बैठ जाती हो, जबकि बाबा जी तो हिन्दी में बोलते हैं ?"
माता बोली-"तुम्हारा बाबा इतना सुंदर लगता है कि मैं तो उसे देखती ही रहती हूँ। उसी से मुझे आनंद आ जाता है।
भाव-भंगिमा का अपना असर होता है। उसमें वाणी का प्रभाव बहुत कम और व्यक्तित्व का प्रभाव ज्यादा होता हैव्यक्तित्व में भीतरी भावनाएं काफी असरदार होती हैं। बाबा जी के भीतर थी विराट दृष्टि जिसमें सबके प्रति अपनत्व था।
जिन दिनो मैं संत निरंकारी (हिन्दी मासिक पत्रिका) का संपादक था उन दिनों हमने बाबा जी का एक बुजुर्ग के साथ फोटो छापा था। जो सज्जन उस यात्रा में बाबा जी के साथ गए थे ,उन्होने बताया कि ये बुजुर्ग निरंकारी नहीं थे बल्कि किसी ऐसे देश के वासी थे जहाँ हिन्दी भी नहीं चलती और अंग्रेजी भी नहीं इस प्रकार बाबा जी से संवाद का कोई भाषाई आधार नहीं था। इसके बावजूद प्रेम स्पष्ट दिख रहा था बल्कि उस बुजुर्ग ने बाबा जी के चरण स्पर्श भी किये, यह उनका प्रेम भाव ही था। जिसने अपरिचित को भी परिचित बना दिया।
उनकी दृष्टि इतनी विशाल थी कि कोई उनकी दृष्टि से बच नहीं पाता था। गरीब से गरीब भी और अमीर से अमीर भीश्री वरिंदर पाहवा जो उनकी काफी प्रचार यात्राओं में उनके साथ रहे हैं, ने एक बार रविवार के साप्ताहिक सत्संग में माइक पर बताया कि राजस्थान के टूर में किसी साथी की तबीयत खराब हो गयी। बाबा जी ने किसी स्थानीय डॉक्टर से उपचार लेने को कहा, जो कि उस समय सत्संग में मौजूद थे लेकिन इतनी भीड़ में किसी व्यक्ति विशेष को खोजना आसान ना था और उनका नाम बाबा जी ने बताया नहीं था और हमें भी याद नहीं आ रहा था। हमने निश्चित होने के लिए पूछ लिया कि वे डॉक्टर,जो कुछ-कुछ गंजे हैं। बाबा जी ने मेरे वाक्य में तुरंत संशोधन किया हाँ, जिनके सिर पर थोड़े कम बाल हैं। बाबा जी ने यह भी बता दिया कि वे सत्संग में मौजूद हैं। हमने उन्हें ढूंढने का प्रयास किया और वे दिख भी गए। फिर उनकी सेवाएँ भी ली गईं लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि वे निजी सम्बोधन में भी स्तरहीनता सहन नहीं कर पाते थे जबकि अपनी कितनी ही अवमाननाओ को वे अनदेखा कर देते थे। जो भी उनके सामने से गुजरता था वे जैसे उसका फोटो खींच लेते थे।
मेरा पैतृक निवास उत्तर प्रदेश के मुरादनगर में है। हमारी बस्ती बहुत उन्नत बस्ती नहीं थी। साथ ही सफाई कर्मचारियों का भी मुहल्ला साथ लगा हुआ था जिससे सफाई की स्थिति भी दयनीय थीइसके बावजूद बाबा जी ने कृपापूर्वक वहाँ दर्शन भी दिये और भोजन भी किया जबकि उस समय हमारे घर में साइकिल तक नहीं थी कार की तो कौन कहे।
2003 की फरवरी की बात है। बिहार और झारखंड का प्रादेशिक संत समागम गया में हो रहा था। सत्संग का समय शायद 1 से तीन बजे का था, लेकिन जहाँ तक मुझे याद है, उस समय 6 बज चुके थे, जब बाबा जी ने अपना मंच छोडा। उस यात्रा में मैं भी बाबा जी के काफिले में था। मुझे बाबा जी के सुरक्षाकर्मी लेंका जी ने बताया कि बाबा जी जब अपने मंच से नीचे उतरे तो एक स्थानीय महिला बाबा जी को रोककर बोली – बाबा जी, हम गरीब लोग हैं। हमारे ये पाँच रुपए रख लीजिये और रास्ते में चाय पी लीजियेअगर सांसारिक रूप से देखें तो उन पाँच रुपयों की बाबा जी के लिए कोई महत्ता नहीं थी लेकिन बाबा जी ने वे पाँच रुपए सहज भाव से स्वीकार किए और उस महिला को आशीर्वाद दिया। उन्होंने उस महिला को यह एहसास करवा दिया कि उसके पाँच रुपए मामूली नहीं हैं। वे महत्वपूर्ण हैं।
उनके व्यक्तित्व और विजन के संबंध में जब मैं सोचता हूँ तो मुझे ओशो का एक संस्मरण ध्यान में आता है जो कि उन्होने नब्बे के दशक में धर्मयुग मासिक पत्रिका में लिखा था। ओशो ने लिखा -
मैं उन दिनों जबलपुर में पढ़ता था। पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। मैं जब कालेज जा रहा था तो मैंने देखा कि शहर में कुछ ज्यादा ही सफाई हो रही है। पता चला कि पंडित नेहरू जबलपुर आ रहे हैं।
शहर के बीच-ओ-बीच एक नाला हुआ करता था जिसमें बेहद गंदगी थीमैंने देखा कि उस पुल के दोनों तरफ नगरपालिका के कर्मचारी फूल लगा रहे हैं। मुझे लगा कि पंडित नेहरू से सच्चाई छिपाने का प्रयास हो रहा है लेकिन मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा बल्कि उनके काम में हाथ बंटाने लगा।
जब पं. नेहरू की गाड़ी पुल पर से गुजरने लगी तो मैंने हाथ हिलाकर उन्हें रुकने का इशारा किया और वे रुक भी गये। वह जमाना सहजता का था। जनता और नेताओं के बीच सीधा संवाद थाओशो लिखते हैं कि मैंने कहा कि क्या आपने किसी पुल के दोनों तरफ इतने फूल लगे देखे हैं ?वे बोले-"नहीं।" मैंने कहा-यह इस शहर की सच्चाई नहीं है। आप जरा गाडी से नीचे उतरिए। वे नीचे उतरे। मैं उन्हें पुल के उस किनारे तक लेकर गया और उन्हें नीचे का नजारा दिखाया। वे बोले – जवान, अगर तुम ना होते तो मैं इस शहर की सच्चाई से अंजान रह जाता।
इस प्रसंग से मुझे ध्यान आता था कि बाबा जी ने निरंकारी मिशन को एक पवित्रता प्रदान कर रखी थीउनके बीच से हटते ही मिशन के सामने अपनी पवित्रता को बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है।
बाबा जी के व्यक्तित्व को व्यवहार का अंग बनाये बिना इस चुनौती से बाहर निकल पाना संभव नहीं है।