ईद-उल-फ़ितर (25 मई पर विशेष) क्या सन्देश देती है ईद

आज ईद है ,मुस्लिम भाइयों का सबसे प्रसिद्द और लोकप्रिय त्यौहार |मुझे यह इसलिए पसंद है चूंकि इससे पहले रमजान का पवित्र महीना आता है |हिज़री कैलेंडर के अन्य महीनो की तरह सव्वाल का महीना भी चाँद देखकर ही शुरू होता है |रमजान को पवित्र महीना इसलिए कह रहा हूँ,चूंकि जिस मौसम में इन दिनों हम हैं उसमें काफी गर्मी है |इस चिलचलाती गर्मी में रोजा रखना किसी तप से कम नहीं है | रोज़ा रखना इस्लाम के पांच धार्मिक सिद्धांतों अथवा फ़र्ज़ों में से एक है |



पूरे दिन में कुछ भी न खाना -पीना मनुष्य को धैर्य और संयम की ओर ले जाता है |इस प्रकार रमजान संयम से शुरू होकर मेल-मिलाप के पर्व ईद के साथ संपन्न होता है | रमजान की शुरूआत वर्ष 624ईस्वी से शुरू बताई जाती है |इस प्रकार ईद का पहला त्यौहार वर्ष 624  में मनाया गया |कहीं -कहीं यह तारीख वर्ष  1624 ईस्वी भी बताई गयी है| विशाल दृष्टि बल्कि मानवता की दृष्टि से देखें तो इतिहास में आंकड़ों की हेर-फेर इतनी महत्वपूर्ण नहीं है ,प्रेम तथा मिलवर्तन ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है | इस्लामिक सूत्रों के अनुसार ईद का पहला त्यौहार बद्र की लड़ाई के बाद मनाया गया था |


हर वर्ष हिज़री वर्ष के दसवें महीने के पहले दिन ईद मनाई जाती है | रमजान का मुक़द्दस महीना तीस दिन चलता है ,इस प्रकार संयम का अभ्यास भी लगातार तीस दिन तक चलता है |रमजान के अंतिम दिन का चाँद डूबने के बाद नया चाँद देखकर ईद के त्यौहार की चहल-पहल शुरू होती है |सुबह उठकर नमाज अदा की जाती है और खुदा का शुक्र किया जाता है कि इस परवरदिगार ने हमें रोज़े रखने की तौफ़ीक़ दी |


ख़ुशी की भावना प्रबल होने के कारण नए कपडे लिये जाते है तथा अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को तोहफे दिये जाते हैं | पुराने झगड़ों और मतभेदों को खत्म करके मिलवर्तन की नयी शुरूआत की जाती है |मस्जिद जाकर दुआ की जाती है |इस्लाम में मुसलमान का फ़र्ज़ है कि वह अपनी हैसियत के अनुसार ज़रूरतमंदों को ज़कात दे |इसे ज़कात उल फ़ितर भी कहा जाता है |ज़कात वास्तव में एक प्रकार का दान है | रमजान के तीस दिन बाद,त्याग-तपस्या के बाद ईद आती है |मैंने इसे तप -त्याग का महीना इसलिए भी कहा है कि इस महीने की पवित्रता बनाये रखने की दृष्टि से इस अवधि में जहाँ लड़ाई-झगडे से दूर रहने की हिदायत है वहीं स्त्री अथवा सम्भोग से भी दूर रहने को भी कहा गया है |


इस प्रकार की कठिन हिदायतों के पालन करने के बाद अल्लाह अपने बन्दों को ईद का तोहफा देता है | इस प्रकार ईद के दिन को इनाम का दिन भी कहा जाता है |तीस दिनों तक संयम का यह अभ्यास किसी भी मनुष्य के जीवन को सार्थकता से भरेगा, तय है |


ईद दो प्रकार से मनाई जाती है,आज जो त्यौहार है, भारत में हम इसे मीठी ईद भी कहते हैं |इसका वास्तविक नाम ईद-उल-फ़ितर है|ईद की नमाज से पहले फ़ितरा पढ़े जाने का नियम है |फ़ितरा पढ़े बिना ईद मनाने को अधूरा माना जाता है |दूसरी ईद को बकरीद या ईद-उल-जुहा भी कहते हैं |इसकी विशेषताओं पर फिर कभी बात करेंगे |


आज तो हम संयम की सार्थकता और सकारात्मकता का एहसास कर रहे हैं | ईद का इतिहास वर्ष 624 से शुरू होता है, जब एक जंग में विजय मिली |कोई भी जंग ऐसी नहीं होती जिसमें हिंसा न होती हो |यह कितना संतोषजनक है कि युद्ध के बाद मिलवर्तन के इस त्यौहार की शुरूआत हुई |रमजान के महीने में लड़ाई करना तो वर्जित है ही,लड़ाई देखना भी वर्जित है |


मैं चूंकि इस्लाम के बारे में गहरी जानकारी नहीं रखता इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों के उल्लेख में भूल कर सकता हूँ लेकिन मेल-मिलाप का यह त्यौहार मुझे मनुष्य के स्तर पर अपनत्व से भर देता है ,इसमें कोई भूल नहीं है | 


चाँद और सूरज दोनों ही हमारे जीवन को सुखद बनाते हैं |अपनी-अपनी रूचि के अनुसार हर इंसान चीजों का चयन करता है |मुस्लिम भाइयों ने अपने त्यौहार का आधार चाँद को बनाया है,इससे किसी भी मनुष्य  को ऐतराज नहीं होना चाहिए |


थोड़ी देर पहले मैं एक वीडियो देख रहा था,जिसमें एक नमाजी ने जो तहमद बांधा हुआ था  ,वह नारंगी रंग का था ,जब कि निकट स्थित मस्जिद में हरा रंग ही प्रधान था |


रंग भी जीवन जीने में ,हमारी रुचियों को प्रकट करने में हमारी मदद करते हैं |नारंगी,हरा या सफ़ेद जो भी रंग हैं ,वे जब एक तरतीब के अनुसार आयोजित किये जाते हैं तो वे एक प्रकार की खूबसूरती को प्रकट कर रहे होते हैं |हर्ष की बात है कि इन रंगों को देखकर हमें अपने राष्ट्रीय ध्वज का एहसास होता है |


मानवता के परिपेक्ष्य   में देखें तो मिलवर्तन और प्यार किसी सीमा में नहीं बांधे जा सकते |इस प्रकार ईद का त्यौहार हमें विशाल, समृद्ध और गौरवशाली बनाता है |