भक्ति में भय का स्थान क्यों नहीं है ?

भय बिनु भक्ति नहीं होइ ,वर्षों से सुनते आये हैं |मेरे ख्याल से यह संवाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम जी से उस परिस्थिति में कहलवाया है जबकि सीता जी रावण की कैद में थीं और राम जी समुद्र पार करके लंका पहुंचना चाहते थे |समुद्र मार्ग दे नहीं रहा था तब उन्होंने समुद्र को अपना विराट रूप दिखाया कि अगर तुम मुझे मार्ग नहीं देते हो तो मैं तुम्हें सुखा डालूँगा |


इस पर समुद्र भयभीत हो गया और रामजी की शरण में आ गया |


यह क्रोध का रचनात्मक प्रयोग था जो रामजी ने समुद्र पर पुल बनाने के लिए किया लेकिन भय रचनात्मक नहीं  है |


भय एक नकारात्मक भाव है इसलिए भक्ति का जन्मदाता नहीं हो सकता |


भक्ति चूंकि पूर्णतः सकारात्मक (positive) भाव है और भय नकारात्मक भाव है इसलिए मैं भय के विरुद्ध हूँ |


भय के प्रति मेरे विरुद्ध होने का एक कारण यह भी है कि मैं वर्षों पहले अपनी एक कविता में कह चुका हूँ-न किसी को डरा और न किसी से डर अर्थात यह मेरी स्वाभाविक प्रतिबद्धता है कि किसी से डरना नहीं और किसी को डराना भी नहीं |


भक्ति का आधार भय है, यह सुनना मेरे लिए वैसा ही है जैसे कि कोई कहे कि ममता का आधार क्रोध है |


मेरे एक गीतकार मित्र ने एक बार अपने गीत में लिखा-ख़ौफ़े खुदा तो है मगर ज़िक्रे खुदा नहीं |


मैंने उस पर आपत्ति करते हुए कहा था कि-क्या परमात्मा खौफनाक है ?


यह बात सुनकर वे मित्र भी अपनी बात की कमजोरी महसूस कर रहे थे लेकिन भय बिनु भक्ति न होइ का भाव इतनी बार और इतने पूजनीय व्यक्तियों द्वारा व्यक्त किया गया है कि भय को भक्ति से अलग करने की हिम्मत नहीं होती  |


वास्तविकता यह है कि कोई भी भयभीत होना नहीं चाहता |पशु-पक्षी भी शिकारी को देखकर अपना रास्ता बदल लेते हैं ,उससे दूर  भागते हैं |इसी प्रकार मनुष्य भी उन्हीं से मिलना चाहता है जिनसे उसे भय नहीं लगता |


अपने विद्यार्थी जीवन में कुछ अध्यापक हमें बहुत प्रिय रहे होंगे लेकिन उनमें से कोई भी ऐसा नहीं होगा जो हमें बेहिसाब अथवा मनमर्जी से पीटता रहा होगा जबकि पुराने वक़्त में छात्रों को शिक्षक द्वारा पीटना बिलकुल सामान्य बात थी |अभिभावक भी ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें यह छूट देते थे |


परसों मैं एक विचारगोष्ठी में शामिल हुआ ,जिसमें एक वक्ता ने कहा कि भय के बिना भक्ति तो हो ही नहीं सकती ,प्रेम भी नहीं हो सकता |


यह विचार मेरे लिए असहनीय था इसलिए जब मुझे अवसर मिला तो कहा कि-कोई इंसान यदि अपनी पत्नी को पीटता हो और साथ ही यह उम्मीद करता हो कि वह उससे प्रेम करेगी तो वह गलती कर रहा है |गृहस्थी की मर्यादा के कारण अथवा अपनी सन्तानो के प्रति दायित्वबोध के कारण वह पिटाई को सहन तो कर सकती है लेकिन उस इंसान से वास्तविक प्रेम नहीं कर सकती |   


मेरे एक मित्र,जो कि पेशे से शिक्षक थे इस विषय पर कहते थे कि डंडा अथवा भय पैदा करना  तो आख़िरी विकल्प है |अगर डंडे का इस्तेमाल करके भी आप छात्र को नहीं पढ़ा पाए तो फिर क्या करेंगे ?बेहतर है इस विकल्प को सिर्फ रहने दिया जाए ,अन्य विकल्पों को ही अपनाया जाए |


इस पूरे मंथन के बाद मुझे लगता है कि विद्यार्थी यदि बच्चा है,वो तो कच्ची मिट्टी के समान है |योग्य शिक्षक उसे देवता बना सकता है और अयोग्य उसे राक्षस |


हम तो परिपक्व लोग है |अपनी धार्मिक पृष्ठभूमि अथवा झुकाव के कारण हम सत्गुरु की शरण में आये |सत्गुरु ने कृपा करके हमें ब्रह्मज्ञान प्रदान कर दिया और हममें महापुरुष,सन्त अथवा महात्मा होने की संभावना पैदा कर दी तो क्या हमें अब भी डंडे अथवा भय की ज़रुरत है ?एक योग्य शिक्षक डंडे के इस्तेमाल से बचता है और सत्गुरु तो डंडे को रखता ही नहीं |


निष्कर्षतः यही कहना उचित प्रतीत होता है कि भक्ति  का आधार  तो प्रेम भाव है |एक भक्त,जो परमेश्वर को सामने देखता है वह इतना सावधान रहता है कि उससे कोई गलती होती ही नहीं चूंकि उसे परमेश्वर का एहसास और परमेश्वर से प्रेम है |इस दृष्टि से प्रेमभक्ति में मर्यादा तो होती है लेकिन भय की गुंजाईश किंचित भी नहीं है |