भारत माता को बचाने के लिए धरतीमाता को बचाना होगा


पिछले कितने ही वर्षों से बिगड़ते पर्यावरण को लेकर चिंता प्रकट की जा रही है चूंकि कार्बन के बढ़ते उत्सर्जन ने धरती के पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है |ओज़ोन की परत में सुराख़ हो गया है जिसके कारण हानिकारक पराबैंगनी किरणे हमारी पृथ्वी तक पहुँचने में सफल हो जाती हैं |


ओज़ोन परत हमें इस खतरे से बचाती है लेकिन विश्व भर की अधिकांश सरकारों के लिए पर्यावरण कोई मुद्दा ही नहीं है |
मैं सोच रहा हूँ कि हम जितनी रूचि अपने त्योहारों के प्रति दिखाते हैं ,धार्मिक परम्पराओं के प्रति दिखाते हैं कम से कम उतनी रूचि तो पर्यावरण को बचाने के लिए दिखानी ही चाहिए |


इस जनचेतना के लिए 22 अप्रैल 1970 से पृथ्वी दिवस मनाने की शुरूआत हुई |


भारत में तो इस वर्ष 22 मार्च को पहली बार कोरोना के खतरे को देखते हुए जनता कर्फ्यू लगाया गया |तब से लेकर पूरा भारत लॉकडाउन  में है |इसके कारण भारत में पर्यावरण की स्थिति में सुधार हुआ है |भारत में सबसे बड़ी हमारी दिक्कत यह है कि यहाँ की जलवायु में प्रायः राजनीतिक ज़हर  घुला रहता है जिसके कारण मानवीय मुद्दे दब जाते हैं अथवा इतना ध्यान नहीं खींच पाते जितना कि खींचना चाहिए |भौतिक वासनाओं ने हमारी प्राथमिकताएं बदल दी हैं |


इस कविता में मैं अपने एक दोस्त को देख रहा हूँ,जो मौसम और पक्षियों की खूबसूरती से बेखबर अपने ही मोबाइल पर गिट-पिट कर रहा है |पिछले एक महीने पशु-पक्षियों में जो उत्साहजनक परिवर्तन देखने को मिले हैं वे किसी को भी को प्रभावित करने में सक्षम हैं|इस सार्थक परिवर्तन पर यह कविता प्रस्तुत है-




प्रकृति के करीब आओ 

अरे,तुम अब भी


मोबाइल फोन के की -पेड  पर -कर रहे हो-आँखों से गिट- पिट


अरे नादान, जात के इंसान


ज़रा आँखें खोलो   ,मशीन के नहीं ,कोयल के स्वर में बोलो


देखो ,वह पक्षी ,जो लुप्त प्रजाति का हो चला था,


कितना अपना था ,कितना भला था ,देखो


घूम रहा है सामने-  बेखटके


है ना यह नज़ारा-कुछ हटके


देखो ,इसके पड़ोस में ,जो चिड़िया -दाने चुग रही है,


उसे मैंने बचपन में देखा था -अपने पिताजी की उंगली पकड़कर


इसका कुछ नाम उन्होंने बताया था -जो इसके जितना अपना नहीं हो पाया था


नहीं तो इसकी तरह -रहता याद ,मन में गहरे अपनत्व का स्वाद


पिताजी ने तब इसका नाम बताया था -


जब हम जंगल से होकर -गाँव की तरफ जा रहे थे ,


पक्षी अपने परिवार के साथ -चहचहा रहे थे -बच्चे इतरा रहे थे ,


इस समूह में -उसकी पत्नी भी रही होगी ,लेकिन


वह आदमियों की औरतों की तरह आँखें नहीं दिखा रही थी ,


इसलिए मैं उसे पहचान नहीं पाया लेकिन मन को बहुत भाया


गांव के जंगल का वह भरा-पूरा  परिवार ,


और आज -इस महानगर के मोहल्ले की सड़क पर ,पक्षियों का यह वसुधैव कुटुंबकम 
घूम रहा है साथ-साथ, लगातार  |


मुझे अपना बचपन याद आ रहा है-जबकि कोरोना -पूरी दुनिया का डरा रहा है,


यह पर्यावरण संरक्षण -दिल को ,बहुत भा रहा है |


गाड़ियों के दमघोटूं धुंए से -मिल गयी है -निजात


फेफड़ों में -खूब अच्छी तरह से-आ जा रही है-साँस


यह कितना सुन्दर उपहार है-जो रोज नहीं मिलता ,


कोरोना के डर से हुआ -लॉक डाउन,देशबंदी


बंदी होना कभी भी -अच्छा नहीं होता ,


काश,मानव अपने मूल्य नहीं खोता


अन्य जीवों को भी-धरा पर -बेखटके जीने देता


मानवता  के  ज़ख्मो  को ,प्यार  से  सीने  देता


खुद भी चैन की साँस लेता -तो ये पक्षी लुप्त नहीं होते -अपना अस्तित्व नहीं खोते


हमारे परिजनों-दोस्तों की तरह ,हमारे साथ रहते


लेकिन-जीभ के स्वाद ने कर दिया खत्म-सह-अस्तित्ववाद


खो गया-मानववाद ,समाजवाद, धन्यवाद् ,आशीर्वाद


बच गया सिर्फ-पूंजीवाद -इसीलिए परमात्मा ने प्रकृति के माध्यम से


प्रलय का मात्र ट्रेलर दिखाया है -कोरोना के रूप में


आदमी को एकांत का क़ैदी बनाया है ,


अब सबक दोहराना होगा-वही पुराना-बचना और बचाना


सहअस्तित्व का परचम लहराना


पशु- पक्षी भी रहें,हम भी जियें साथ-साथ


कोई भी बचपन,हो ना अनाथ


बच्चे-भले ही,पशु-पक्षियों के भी क्यों न हों,


आज़ादी के साथ जियें -धरती पर रहें या आकाश में उड़ें


दोस्त,मोबाइल की गिट-पिट से नज़र तो हटाओ जरा


प्रकृति के करीब -आओ तो ज़रा


प्रकृति के करीब -आओ तो ज़रा      


 



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