निर्भया को न्याय कौन देगा ?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (08 /03 /2020) पर विशेष- 



2020  में आज का दिन-अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (08 -03 -2020 ) कुछ प्रश्न लेकर आया है |
मेरे दिमाग में निर्भया है,जिसने अन्याय झेला |दूसरी महिला आशा देवी हैं,जो निर्भया की माँ है और अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए निरंतर लड़ रही हैं |
नारी का सम्मान करके हम स्वयं की दृष्टि में ऊपर उठते हैं |हमारे गौरव का ग्राफ  ऊपर उठता है और हम अन्याय को स्वीकार न करके ,न्याय के लिए आवाज़ बुलंद करते हैं |मेरा ध्यान आज निर्भया के साथ हुए और अब तक हो रहे अन्याय की ओर जा रहा है कि निर्भया को न्याय कब मिलेगा ? 


अस्सी के दशक में एक फिल्म आयी थी-इन्साफ का तराजू |फिल्म की नायिका थी-ज़ीनत अमान,जिन्होंने बलात्कार पीड़िता की भूमिका सशक्त ढंग से अदा की थी |
वकील पीड़ित युवती की गरिमा को जिस तरह,न्यायालय में सरेआम ,अपने शब्दों द्वारा दोबारा  धूल में मिलाता है,वह अब निर्भया के मामले में साकार रूप लेता हम देख रहे हैं |
इस स्थिति में न्यायिक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है |फिल्म में पीड़िता को अंततः कानून  हाथ में लेना पड़ता है |
कानून को हाथ में लेना कोई समाधान नहीं है लेकिन जिन अपराधियों ने निर्भया को बेइज्जत किया और फिर उसे ख़त्म कर दिया ,उन्हीं अपराधियों को उनके वकील हीरो बनाये घूम रहे हैं |
 निर्भया की माँ आशा देवी इस अँधेरे तूफ़ान में अपनी आशा की मशाल को प्रज्ज्वलित रखे हुए हैं ,यह उनकी संकल्प शक्ति का प्रमाण है और इसके लिए उनका हौसला बढ़ाया जाना चाहिए लेकिन डेथ वारंट जारी होते हैं और मृत्यु की तारीख आने से पहले ख़त्म हो जाते हैं-इस परिस्थिति में हाई कोर्ट ,सुप्रीम कोर्ट और पीड़ितों का न्याय किस निचले दर्ज़े पर आकर खड़ा हो गया है,यह सोचने की बात है |
2012 के 16  दिसम्बर  की बात है जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रसिद्द भारत की राजधानी दिल्ली के वसंत विहार में एक लड़की को अनाचार का शिकार बनाया गया |वो ऐसी दर्दनाक घटना थी ,जिसने दिल्ली की भयंकर सर्दी में जैसे आग लगा दी |मोमबत्ती लेकर युवतियों -महिलाओं ने इंडिया गेट पर जुलूस निकाला और अपराधियों को भयंकरतम सजा देने की मांग की |
संचार माध्यमों में खूब चर्चा हुई और पूरी दुनिया में देश की बदनामी हुई |
विश्व भर के पर्यटकों ने भारत के प्रति असुरक्षा का एहसास किया |खूब शोर मचा और पीड़िता को नाम दिया गया-निर्भया |
मेरे दिमाग में तब भी यह प्रश्न उठा था कि पीड़िता को निर्भया नाम क्यों दिया गया जबकि वह अपराधियों के जुल्म की शिकार हो गयी | उसकी शारीरिक चोटें भी इतनी भयंकर थीं कि खूब कोशिशों के बावजूद उसका शरीर जीवन से तालमेल बैठा नहीं पाया और उत्तर प्रदेश से शिक्षा प्राप्त करने आयी एक बहादुर लड़की शरीर ,मन और आत्मा पर गहरे ज़ख्मो के साथ इस दुनिया से विदा हो गयी |
उसकी दर्दनाक हत्या हुए सात साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है |लेकिन अपराधियों में  जरा भी पश्चाताप का भाव नहीं है |
अपराधी सिद्ध होने के बावजूद बावजूद उनके हाथ पीड़ितों के न्यायिक अधिकारों  से ज्यादा लम्बे हैं |तीन बार उनके डेथ वारंट निकले और रद्द हुए |
मैंने अच्छी तरह महसूस किया है कि अपराधियों के वकील बेहद शातिर हैं ,इसीलिए वे उच्च न्यायालय के मृत्युदंड सम्बन्धी निर्णय को लगभग अप्रभावी कर चुके हैं |17 फरवरी को ही मैंने लिखा था कि कोई भी गारंटी से नहीं कह सकता कि तीन मार्च को (तीसरे डेथ वारंट के दिन )अपराधियों को फांसी हो ही जायेगी चूंकि इससे पहले भी दो बार  डेथ वारंट जारी हो चुके हैं | संतोष की बात है कि राज्य सभा ने भी पिछले दिनों जनभावनाओं को समझा है |अपराधियों को शीघ्र फांसी देने के निर्णय को शीघ्र व्यवहार में लाने की अपील की है |
अदालत के फैसलों की धज्जियाँ कैसे उड़ाई जाती हैं, अपराधियों के वकील  अच्छी तरह जानते हैं|
 लेकिन कोई भी उन पर यह आरोप खुलकर नहीं लगा सकता चूंकि वे कानून के रक्षक माने  जाते हैं  और अपराधियों को बचाना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है | 
निर्भया के माता-पिता पिछले सात वर्षों से भी ज्यादा समय से अपनी बेटी को खोने के दर्द का बोझ अपने कमजोर कन्धों पर लिये घूम रहे हैं |उसकी माँ ने पत्रकारों को बताया कि किस प्रकार अपराधियों के वकील ने उन्हें खुले आम धमकाया कि वो अपराधियों को फांसी कभी नहीं होने देगा |
2018 में ही दिल्ली उच्च न्यायालय अपराधियों को मृत्यु दंड दे चुका है |उच्चतम न्यायलय भी इसे  स्वीकार कर चुका है इसके बावजूद अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और उनके वकील इस हौसले को बनाये रखने में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं |ऐसे योगदानो का ही प्रताप है कि समाज में लगातार इस प्रकार की दर्दनाक घटनाएं हो रही हैं |
कुछ दिन पहले जब यथासमय डेथ वारंट जारी नहीं हुए तो निर्भया की माँ रो पडी और उन्होंने कहा कि क्या सारे अधिकार अपराधियों के ही हैं ?क्या उनका और उनकी बेटी की पीड़ा का कोई महत्व नहीं है ?
इस आधार पर सोचते हैं तो पाते हैं कि उन दिनों अनेक शहरों में निर्भया के पक्ष में जुलूस निकाले गये |   नारी उत्पीड़न के विरोध में  मोमबत्तियों के इन जुलूसों  की क्या कोई महत्ता नहीं,जिसमें सम्मिलित लोगों ने दिल्ली में इंडिया गेट पर एकत्र होकर पूरे देश का ध्यान इस और खींचा था और मांग की थी कि निर्भया के अपराधियों के साथ कोई रियायत  न हो |उन्हें कठोरतम सजा दी जाए ताकि अपराधियों में डर पैदा हो लेकिन देखा जा रहा है कि निरंकुश वकीलों के कारण न्याय का खुले आम मज़ाक उड़ाया जा रहा है और पीड़ितों को और पीड़ा दी जा रही है |
जो लड़की अपने घर से कुछ सपने लेकर दिल्ली आयी थी उसके सपने और जीवन को खुले आम कुचल दिया गया -उसे न्याय कहाँ मिल सकता है जबकि स्थायी अन्याय उसके साथ हो चुका है |
16  फरवरी की रात अपराधियों के वकील ए.पी .सिंह  पत्रकारों के साथ बात करते हुए पूर्णतः निश्चिन्त नज़र आ रहे थे |वे justice  for all (सबके लिए न्याय) की दलील देकर कह रहे थे कि अपराधियों के पास जब तक कानूनी विकल्प मौजूद हैं तब तक उन्हें फांसी नहीं दी जा सकती |यह कहते हुए वे यह बिलकुल भूल गए कि फाँसी का निर्णय दिल्ली उच्च न्यायालय का है और न्यायालय के निर्णय में रोड़े अटकाकर वे न्याय की नहीं बल्कि अपराधियों की ही सेवा कर रहे हैं |
उच्च न्यायालय ने सब विकल्प इस्तेमाल करने के लिए एक सप्ताह का ही समय दिया था |हफ्ते की समय सीमा बीत चुकी है लेकिन उक्त वकील को इसका कोई भय नहीं | 
वकील को यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए कि अपराधियों की सहायता करके वे न्याय की कोई सेवा नहीं कर रहे बल्कि (अप्रत्यक्ष रूप में वे )समाज में मौजूद ऐसे असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहित भी कर रहे हैं कि कानून के हाथों से डरने की कोई ज़रुरत नहीं |उन जैसे वकीलों के रहते सख्त से सख्त कानून भी अपराधियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता |
पिछले आठ सालों से पीड़िता के माता-पिता लगातार उस पीड़ा के साथ जी रहे हैं ,जो उनकी बेटी ने भोगी ,क्या उनके दर्द को समझने वाला सचमुच कोई है ?उच्चतम न्यायालय के प्रति हम अब भी आशान्वित हैं |