दिल्ली का इतिहास दिलेर लोगों से भरा रहा है |इनमें पृथ्वीराज चौहान हैं तो इब्राहिम ज़ौक़ भी हैं,जो दिल्ली के बारे में कहते थे -
कौन जाए ज़ौक़ अब दिल्ली की गलियां छोड़कर
दिल्ली की गलियां छोड़ने का किसी का मन ही नहीं करता था क्यूंकि यह ज़िंदादिली का शहर है |दिल्ली पर आफतें बहुत आईं -चौदहवीं शताब्दी में मात्र पंद्रह दिनों में बर्बाद कर दिया गया , उसके लगभग चार सौ साल बाद नादिरशाह ने दिल्ली को बर्बाद किया |
साम्प्रदायिकता कहती है कि ये दोनों ही मुसलमान थे लेकिन प्रश्न उठता है कि यदि ये हिन्दू रहे होते तो क्या इनका अपराध कम हो जाता ?
आग तो आग है जो जलाते समय हिन्दू-मुसलमान का भेद नहीं करती |
1857 में अंग्रेजों का शासन था ,गुलामी का दौर था |तब भी दिल्ली उजड़ी |
दिल्ली वाले अलग-अलग कालखंड में उजड़े भी तो फिर बसे भी लेकिन 1947 के बाद तो दिल्ली की बर्बादी का दौर खत्म हो जाना चाहिए था चूंकि हम संप्रभु राष्ट्र का रूप ले चुके थे |
लेकिन मूर्खता की कोई सीमा नहीं है |दिल्ली हो या मेरठ,अलीगढ हो या गोधरा या फिर भिवंडी ही क्यों न हो, मूर्खताओं की कोई सीमा नहीं है |
आजकल लोग 1984 को याद कर रहे हैं चूंकि तब साम्प्रदायिकता के आधार पर लोगों की दृष्टि बदल चुकी थी |परिणाम यह हुआ कि आदमी,आदमी को बेरहमी से मार रहा था |पिछले रविवार अर्थात 23 फरवरी की शाम से फिर इतिहास जैसे अपनी कब्र से बाहर निकल आया है | बेरहमी का यह दर्दनाक दौर इंसानियत को शर्मिंदा कर रहा है |
साम्प्रदायिकता चाहे हिन्दू की हो या मुसलमान की,एकसमान खतरनाक है |दंगों में जो मरता है वो यह प्रश्न अपने हत्यारों से पूछना चाहता है कि जितनी आसानी से तुमने मेरा क़त्ल किया क्या तुम उतनी ही आसानी से किसी को जीवन भी दे सकते हो ?
आशा की किरण तो थोड़े से वो लोग हैं ,जो हिन्दुओं में भी हैं ,मुसलमानो और सिखों में भी हैं लेकिन हिन्दू ,सिख और मुसलमान होने से पहले इंसान हैं |
मुझे उस चिड़िया की बात याद आ रही है जिसे यह कहकर मायूस किया गया , कि-तुम्हारी चोंच के पानी से आग बुझने वाली नहीं है लेकिन जिसने हिम्मत से जवाब दिया कि बेशक आग नहीं बुझेगी लेकिन मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं बुझाने वालों में आएगा |
ऐसे लोगों से इंसानियत को ऑक्सीजन मिल रही है और यही वो लोग हैं जो सही अर्थों में धर्म के रक्षक हैं |
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